कच्चे तेल की महंगाई से बढ़ेगी आम आदमी की मुश्किलें, अगले 3-4 महीनों में फिर महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल!
NTN REPORT// नई दिल्ली। देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में हुई 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद अब ईंधन की कीमतों को लेकर एक और बड़ी चेतावनी सामने आई है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले 3 से 4 महीनों में पेट्रोल और डीजल के दाम में और बढ़ोतरी हो सकती है।
दरअसल, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें लगातार तेजी पर हैं। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड करीब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जिससे भारत सहित कई तेल आयातक देशों पर दबाव बढ़ गया है।
भारत में 15 मई को करीब चार वर्षों बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की गई। सरकार और तेल विपणन कंपनियों पर लंबे समय से बढ़ती लागत का दबाव बना हुआ था। विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया बढ़ोतरी से सरकारी तेल कंपनियों को कुछ राहत जरूर मिलेगी, लेकिन इससे उनके घाटे की पूरी भरपाई नहीं हो पाएगी।
मास्टर पोर्टफोलियो सर्विसेज लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर गुरमीत सिंह चावला ने कहा कि ईंधन कीमतों में संशोधन पहले से ही अनुमानित था, क्योंकि तेल विपणन कंपनियां लंबे समय से बढ़ती ऊर्जा लागत का बोझ उठा रही थीं। उन्होंने कहा कि यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल के दाम में और बढ़ोतरी संभव है।
ऊर्जा विश्लेषक धवल पोपट ने भी माना कि मौजूदा 3 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि से सरकारी तेल कंपनियों को केवल आंशिक राहत मिली है। उनके मुताबिक, ईंधन की कीमतों में प्रति लीटर 1 रुपये की बढ़ोतरी से सरकारी तेल कंपनियों के सालाना EBITDA में लगभग 15 से 16 हजार करोड़ रुपये तक का सुधार हो सकता है। इस हिसाब से हालिया बढ़ोतरी से कंपनियों को सालाना 45 से 48 हजार करोड़ रुपये तक की राहत मिलने का अनुमान है।
हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है, तो तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई के लिए कुल मिलाकर करीब 10 रुपये प्रति लीटर तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती आशंकाओं ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी प्रकार की बाधा से वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है।
महंगाई और घरेलू बजट पर बढ़ेगा असर
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों सहित रोजमर्रा की वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं। इससे आम लोगों के घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ने की आशंका है।
हालांकि विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि सरकार टैक्स में राहत या अन्य हस्तक्षेप करती है, तो भविष्य में ईंधन कीमतों में संभावित बढ़ोतरी को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
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