उद्धव ठाकरे के सामने अस्तित्व का संकट, आदित्य के लिए सीट कुर्बान करने वाला नेता भी बगावत की राह पर!
मातोश्री की सियासत में बढ़ी हलचल, शिवसेना (यूबीटी) में लगातार टूट से ठाकरे परिवार की राजनीतिक विरासत पर उठे सवाल
NTN REPORT// महाराष्ट्र की राजनीति में कभी मातोश्री का आदेश अंतिम माना जाता था, लेकिन अब वही मातोश्री अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजर रही है। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे के सामने पार्टी को बचाने के साथ-साथ अपने राजनीतिक अस्तित्व को बनाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

पिछले कुछ वर्षों में शिवसेना की राजनीति में लगातार हो रही टूट ने ठाकरे परिवार की पकड़ को कमजोर किया है। 2022 में सत्ता और पार्टी पर नियंत्रण गंवाने के बाद अब एक बार फिर संगठन के भीतर असंतोष सामने आने लगा है। लोकसभा चुनाव के बाद उद्धव गुट के कई सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट के साथ जाने से शुरू हुई सियासी हलचल अब विधायकों तक पहुंचती दिखाई दे रही है।
आदित्य ठाकरे के लिए सीट छोड़ने वाला नेता भी खड़ा हुआ सवालों के घेरे में
ठाकरे परिवार के लिए सबसे बड़ा झटका उस नेता की नाराजगी से माना जा रहा है, जिसने 2019 में आदित्य ठाकरे के राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाने के लिए अपनी मजबूत पकड़ वाली वर्ली विधानसभा सीट छोड़ दी थी।
सुनील शिंदे ने उस समय बिना किसी विरोध के अपनी जीती हुई सीट आदित्य ठाकरे के लिए छोड़ दी थी। इसे ठाकरे परिवार के प्रति उनकी निष्ठा और शिवसेना की परंपरा का उदाहरण माना गया था।
लेकिन अब वही सुनील शिंदे उद्धव ठाकरे की महत्वपूर्ण बैठक से दूर रहे, जिसके बाद उनके भी बागी गुट में जाने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
उद्धव की बैठक से नेताओं की दूरी ने बढ़ाई चिंता
उद्धव ठाकरे ने विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों की बैठक बुलाई थी। इस बैठक में तीन विधायक और एक एमएलसी शामिल नहीं हुए।
हालांकि गैरहाजिर नेताओं ने पार्टी को अपनी अनुपस्थिति के कारण पहले से बताए थे, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इसे लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है।
सवाल उठने लगा है कि क्या लोकसभा सांसदों के बाद अब शिवसेना (यूबीटी) के विधायक भी शिंदे गुट की ओर रुख कर सकते हैं?
शिवसेना की जड़ों में पहुंची बगावत?
शिवसेना की ताकत हमेशा मुंबई, ठाणे और कोंकण क्षेत्र में रही है। लेकिन पिछले कुछ समय में इन इलाकों के कई पुराने नेता, स्थानीय कार्यकर्ता और संगठन से जुड़े चेहरे शिंदे गुट के साथ जा चुके हैं।
विरोधी गुट लगातार आरोप लगाता रहा है कि उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे तक आम कार्यकर्ताओं की पहुंच पहले जैसी नहीं रही।
कभी शिवसैनिकों के लिए खुले रहने वाले मातोश्री के दरवाजों को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं।
क्या आदित्य ठाकरे का राजनीतिक भविष्य मुश्किल में?
आदित्य ठाकरे को शिवसेना के भविष्य के चेहरे के रूप में पेश किया गया था। 2019 में उन्होंने पहली बार चुनाव लड़कर वर्ली सीट से जीत हासिल की और 2024 में भी विधायक बने।
लेकिन लगातार हो रही टूट ने उनके नेतृत्व और संगठन क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिस वर्ली सीट को कभी आदित्य ठाकरे के लिए सुरक्षित माना गया था, वही क्षेत्र अब उनके लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
असली लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, विरासत की
महाराष्ट्र में अब शिवसेना की लड़ाई केवल सत्ता की नहीं रह गई है, बल्कि बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत पर अधिकार की लड़ाई बन चुकी है।
एकनाथ शिंदे गुट खुद को असली शिवसेना साबित करने की कोशिश में जुटा है, वहीं उद्धव ठाकरे अपने बचे हुए संगठन और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं।
उद्धव के सामने वापसी की सबसे बड़ी चुनौती
उद्धव ठाकरे के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर भरोसा कायम करना और संगठन को दोबारा मजबूत करना है।
राजनीति में केवल सहानुभूति के सहारे लंबे समय तक टिकना आसान नहीं होता। ठाकरे परिवार को फिर से जमीन पर उतरकर संगठन खड़ा करना होगा।
अगर उद्धव और आदित्य ठाकरे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ रखने में सफल नहीं होते, तो शिवसेना (यूबीटी) के लिए यह दौर उसके सबसे कठिन राजनीतिक संघर्षों में बदल सकता है।