अल-नीनो का खतरा: कमजोर मॉनसून से भारत में सूखा, महंगाई और जल संकट की बढ़ सकती है चुनौती!
NTN REPORT// नई दिल्ली। भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 2026 की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं रही है। जून की शुरुआत में केरल पहुंचने के बाद भी कई इलाकों में बारिश सामान्य से कम दर्ज की गई है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अभी अल-नीनो का पूरा असर सामने नहीं आया है, लेकिन जुलाई से नवंबर तक का समय देश के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस साल पूरे मॉनसून सीजन में औसत से कम बारिश का अनुमान जताया है। अनुमान के मुताबिक बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) के करीब 90-92 प्रतिशत तक रह सकती है। इसका सीधा असर खेती, जल संसाधन, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है।
अल-नीनो क्या है और क्यों बढ़ रही चिंता?
अल-नीनो एक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। सामान्य स्थिति में पूर्वी प्रशांत क्षेत्र अपेक्षाकृत ठंडा रहता है और ट्रेड विंड्स पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं।
लेकिन अल-नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या अपना रुख बदल लेती हैं। इसका असर भारत तक पहुंचने वाली नमी वाली हवाओं पर पड़ता है, जिससे दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर हो सकता है।
भारत में मॉनसून देश की सालाना बारिश का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा लेकर आता है। ऐसे में मॉनसून कमजोर होने पर कृषि, पेयजल व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।
जुलाई-अगस्त में दिख सकता है अल-नीनो का असली असर
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जून में अल-नीनो का प्रभाव कमजोर रह सकता है, लेकिन जुलाई-अगस्त के दौरान इसके मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। सितंबर तक इसके प्रभाव बढ़ने का अनुमान है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि मॉनसून के सबसे महत्वपूर्ण दौर जुलाई से सितंबर के बीच अल-नीनो मजबूत हुआ तो बारिश में और कमी आ सकती है।
पिछले रिकॉर्ड बताते हैं कि कई अल-नीनो वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश हुई है।
- 2009 में कमजोर अल-नीनो के बावजूद बारिश करीब 78 प्रतिशत तक सीमित रही थी।
- 2015-16 के मजबूत अल-नीनो के दौरान देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनी थी।
हालांकि कुछ वर्षों में सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD) ने अल-नीनो के प्रभाव को कम किया है, लेकिन 2026 में अभी IOD न्यूट्रल स्थिति में है।
मॉनसून की कमजोर शुरुआत ने बढ़ाई किसानों की चिंता
जून 2026 के शुरुआती दो हफ्तों में कई राज्यों में बारिश सामान्य से काफी कम रही है। महाराष्ट्र सहित कई इलाकों में बारिश में भारी कमी दर्ज की गई है। मध्य भारत और उत्तरी क्षेत्रों के कुछ हिस्से भी प्रभावित हैं।
मॉनसून की धीमी शुरुआत से खरीफ फसलों की बुवाई पर असर पड़ रहा है। किसान धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलों के लिए बारिश पर निर्भर रहते हैं।
अगर आने वाले महीनों में बारिश कम रही तो खेती की लागत बढ़ सकती है और उत्पादन घट सकता है।
कृषि उत्पादन घटा तो खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका
भारत की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। कम बारिश का असर सीधे किसानों की आय पर पड़ सकता है।
कम उत्पादन की स्थिति में:
- अनाज और दालों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
- सब्जियों की कीमतों में तेजी आ सकती है।
- खाद्य महंगाई बढ़ सकती है।
- सरकार को आयात बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर बारिश 90 प्रतिशत या उससे नीचे रही तो कुछ फसलों के उत्पादन में 10-15 प्रतिशत तक गिरावट की आशंका बन सकती है।
मध्य भारत और सूखा प्रभावित क्षेत्रों पर ज्यादा असर
बारिश आधारित खेती वाले राज्यों पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ सकता है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
छोटे किसान, जिनके पास सिंचाई की सुविधा सीमित है, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
इसके अलावा पशुपालन क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है क्योंकि कम बारिश से चारे की उपलब्धता घट सकती है।
जल संकट और बिजली उत्पादन पर भी पड़ेगा असर
कम मॉनसून का सीधा असर जल स्रोतों पर पड़ेगा। जलाशयों में पानी की कमी, भूजल स्तर में गिरावट और नदियों में कम प्रवाह जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
कई शहरों और गांवों में पहले से मौजूद पानी की समस्या गंभीर हो सकती है।
हाइड्रो पावर प्लांट भी प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि बिजली उत्पादन के लिए पर्याप्त जल स्तर जरूरी होता है।
बढ़ सकती हैं गर्मी और लू की स्थिति
अल-नीनो का असर तापमान पर भी पड़ सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे गर्मी बढ़ सकती है और लू की अवधि लंबी हो सकती है।
इसका सबसे ज्यादा असर:
- बुजुर्गों,
- बच्चों,
- खुले में काम करने वाले मजदूरों
पर पड़ सकता है।
सरकार ने शुरू की तैयारियां
संभावित संकट को देखते हुए सरकार की ओर से तैयारी शुरू कर दी गई है। सूखा प्रभावित इलाकों के लिए आकस्मिक योजनाएं बनाई जा रही हैं।
फसल बीमा योजना को मजबूत करने और किसानों को मौसम आधारित सलाह देने पर भी जोर दिया जा रहा है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सरकारी योजनाओं से नहीं बल्कि जल संरक्षण, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और सूखा सहने वाली फसलों को बढ़ावा देकर लंबे समय की चुनौती का सामना किया जा सकता है।
इतिहास से सीख: हर अल-नीनो साल एक जैसा नहीं होता
1950 के बाद कई बार अल-नीनो की स्थिति बनी है। 1997-98 का सुपर अल-नीनो दुनिया की सबसे मजबूत घटनाओं में शामिल था, लेकिन हर बार भारत में एक जैसा असर नहीं देखा गया।
मौसम पर अल-नीनो के साथ-साथ IOD, हिमालयी परिस्थितियां और स्थानीय मौसम प्रणाली भी प्रभाव डालती हैं।
अगर 2026 में सकारात्मक IOD विकसित होता है तो यह अल-नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है।
अगले पांच महीने भारत के लिए अहम
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अभी अल-नीनो का पूरा असर सामने नहीं आया है। आने वाले जुलाई से सितंबर तक मॉनसून की स्थिति देश की दिशा तय करेगी।
अगर बारिश सामान्य से कम रही तो कृषि, जल संकट, महंगाई और आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि बेहतर मौसम पूर्वानुमान, तकनीक, जल संरक्षण और समय पर तैयारी के जरिए नुकसान को कम किया जा सकता है।
यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।