
घर सिर्फ आरोपी का नहीं… बुलडोजर एक्शन पर गरजे चीफ जस्टिस गवई , बोले- कार्यपालिका जज नहीं बन सकती
चीफ जस्टिस बीआर गवई ने बुलडोजर एक्शन पर एक बार फिर प्रहार किया. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कार्यपालिका न्यायपालिका की जगह नहीं ले सकती. आरोपी के जिस घर तो तोड़ा जाता है वो केवल उसका अकेला का नहीं होता, बल्कि उसपर उसके परिवार का भी हक होता है।
NTN NEWS REPORT// पणजी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई ने बुलडोजर कार्रवाई को लेकर अपने ऐतिहासिक फैसले पर खुलकर बात की. उन्होंने साफ कहा कि किसी आरोपी को अदालत में दोषी साबित किए बिना उसके घर को गिराना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है. सीजेआई गवई ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पिछले साल ‘बुलडोजर जस्टिस’ पर सख्त रुख अपनाया था और देशभर के लिए गाइडलाइंस जारी की थीं. उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल इमारतें बचाने का नहीं, बल्कि संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा का प्रतीक था।

‘घर केवल आरोपी का नहीं होता…’ CJI गवई ने कहा, “हम खुश हैं कि संविधान के संरक्षक के तौर पर हम उन लोगों के अधिकारों की रक्षा कर सके, जिनके घर बिना प्रक्रिया का पालन किए गिरा दिए गए थे.” सीजेआई ने जोर देकर कहा कि घर केवल आरोपी का नहीं होता, बल्कि उसमें उसके परिवार के लोग भी रहते हैं. ऐसे में बिना सुनवाई और बिना कोर्ट के आदेश पूरा परिवार सजा भुगतता है जबकि उनकी कोई गलती नहीं होती. उन्होंने कहा कि “यहां तक कि अगर कोई दोषी भी ठहराया जाता है तो भी वह कानून के शासन का हकदार है.”
‘अगर कार्यपालिका को ही जज बनने दें…’
गवई ने अपने संबोधन में संविधान की मूल आत्मा यानी ‘सेपरेशन ऑफ पावर्स’ का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि अगर कार्यपालिका (Executive) को ही जज बनने दिया जाए तो यह शक्ति विभाजन की मूल अवधारणा पर सीधा हमला होगा. “हमने यह सुनिश्चित किया कि कार्यपालिका जज की भूमिका न निभा सके. कानून का राज सर्वोपरि है और यही लोकतंत्र की असली ताकत है.”
‘मुझे अपने ही समाज से आलोचना झेलनी पड़ी’
कार्यक्रम में उन्होंने अपने एक और चर्चित फैसले आरक्षण में क्रीमी लेयर और उप-वर्गीकरण का भी जिक्र किया. गवई ने कहा कि उन्हें अपने ही समाज से आलोचना झेलनी पड़ी, लेकिन उनका मानना है कि न्यायाधीश को निर्णय लेते समय समाज की इच्छाओं से नहीं बल्कि कानून और अंतरात्मा की आवाज से मार्गदर्शन लेना चाहिए।
गांव और शहर का बच्चा बराबर : उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मुंबई-दिल्ली जैसे बड़े शहरों के उच्च शिक्षा पाए बच्चों को उसी पैमाने पर रखा जा सकता है, जिस पर एक किसान या मजदूर का बच्चा ग्रामीण स्कूल में पढ़ता है? उन्होंने कहा कि “आर्टिकल 14 का मतलब है असमानों को समान बनाने के लिए असमान व्यवहार करना. तभी असली समानता संभव है.” सीजेआई गवई का यह बयान एक बार फिर याद दिलाता है कि भारत में कानून का राज सर्वोपरि है और बिना न्यायिक प्रक्रिया के किसी को सजा देना संविधान की आत्मा के खिलाफ है।