
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला विवाद: “क्या गैर-भक्त दे सकते हैं परंपराओं को चुनौती?” नौ जजों की बेंच ने उठाए अहम सवाल
NTN NEWS REPORT// नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मंदिर प्रवेश विवाद को लेकर सुनवाई के दूसरे दिन धर्म और कानून की सीमाओं पर गहन बहस हुई। नौ जजों की संविधान पीठ ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी धार्मिक संप्रदाय से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के जरिए उस संप्रदाय की परंपराओं को चुनौती दे सकता है।
नागरत्ना का सीधा सवाल: “वे भक्त नहीं हैं”
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा,
“आपकी दलील से यह स्पष्ट होता है कि मूल याचिकाकर्ता भगवान अयप्पा के भक्त नहीं थे। किसी भी भक्त ने इस प्रथा को चुनौती नहीं दी। फिर ये याचिकाकर्ता कौन हैं? क्या कोई गैर-भक्त, जो इस मंदिर से जुड़ा नहीं है, ऐसी रिट याचिका दाखिल कर सकता है और क्या अदालत उसे स्वीकार कर सकती है?”

मेहता ने जवाब में कहा कि मूल याचिकाकर्ता इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन नामक वकीलों का संगठन था।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने आगे स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत अदालत पहले यह देखती है कि याचिका में पर्याप्त कारण है या नहीं। यदि कारण नहीं है, तो याचिका खारिज की जा सकती है।
“इनविजिबल विक्टिम” बनाम “मौन बहुमत”
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे मामलों में उन्होंने अक्सर “ज्यूडिशरी सिस्टम के इनविजिबल विक्टिम” शब्द का प्रयोग किया है।
इस पर तुषार मेहता ने इसे “मौन बहुमत और मुखर अल्पसंख्यक के बीच की लड़ाई” करार दिया।
मेहता ने दलील दी कि PIL की शुरुआत Bandhua Mukti Morcha v. Union of India जैसे मामलों से हुई थी, जब आम लोगों के पास अदालत तक पहुंचने के संसाधन नहीं थे। आज ई-फाइलिंग जैसी सुविधाओं के कारण कोई भी सीधे अदालत पहुंच सकता है, लेकिन कई PIL अब “मोटिवेटेड” भी होती हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालतें अब PIL स्वीकार करने में अधिक सतर्क हो गई हैं और मानदंड तय किए गए हैं। उन्होंने बताया कि 2006 से 2026 के बीच स्थिति में काफी बदलाव आया है और अब हर याचिका की गंभीरता से जांच की जाती है।
नौ जजों की संविधान पीठ में कौन-कौन शामिल?
इस मामले की सुनवाई कर रही नौ सदस्यीय पीठ में शामिल हैं:
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत
- न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना
- न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश
- न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह
- न्यायमूर्ति अरविंद कुमार
- न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
- न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले
- न्यायमूर्ति आर. महादेवन
- न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची
पीठ ने धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार से जुड़े सात प्रमुख सवाल तय किए हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या बाहरी व्यक्ति किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है।
2018 और 2019 के फैसलों का संदर्भ
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित किया था।

इसके बाद 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 3:2 के बहुमत से इस मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेज दिया। अदालत ने विभिन्न धर्मों में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवालों को पुनर्विचार के लिए चिन्हित किया।
मूल सवाल: धर्म की स्वायत्तता या संवैधानिक समानता?
सुनवाई के दौरान यह बहस केंद्र में रही कि:
- क्या धार्मिक संप्रदाय अपनी परंपराओं को स्वयं निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र हैं?
- क्या समानता का अधिकार धार्मिक आस्थाओं से ऊपर है?
- क्या गैर-भक्तों द्वारा दायर PIL को अदालत में स्वीकार किया जाना चाहिए?
अब नौ जजों की संविधान पीठ इन संवैधानिक प्रश्नों पर व्यापक निर्णय देने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिसका प्रभाव केवल सबरीमला ही नहीं, बल्कि देश के अन्य धार्मिक मामलों पर भी पड़ सकता है।
(मामले की अगली सुनवाई में केंद्र सरकार से इन सवालों पर विस्तृत जवाब देने को कहा गया है।)