सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला केस: धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और न्यायिक सीमा पर 9 जजों की बेंच में गहन बहस
NTN NEWS REPORT// नई दिल्ली। सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने धार्मिक प्रथाओं, महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमा पर व्यापक बहस की। केंद्र सरकार की ओर से पेश दलीलों में कहा गया कि धार्मिक प्रथाओं का मूल्यांकन समुदाय के भीतर होना चाहिए और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा सीमित रहनी चाहिए।

केंद्र का पक्ष: आस्था और परंपराओं में बाहरी हस्तक्षेप नहीं
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने दलील दी कि भारत जैसे बहुलतावादी समाज में “Essential Religious Practice” (आवश्यक धार्मिक प्रथा) तय करना व्यावहारिक नहीं है। उनके अनुसार, धार्मिक प्रथाओं, देवता की प्रकृति और आस्था की परिभाषा तय करने का अधिकार संबंधित धार्मिक समुदाय का होना चाहिए।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में प्रसाद के रूप में शराब भी दी जाती है। इसी तरह कई मंदिरों में केवल शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर मांसाहारी भोजन की मांग करे, तो वह किसी संप्रदाय पर अपनी पसंद थोप नहीं सकता।
नटराज ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 को एक साथ (harmonise करके) समझना जरूरी है। अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है, वहीं राज्य को उसे नियंत्रित करने की शक्ति भी प्रदान करता है।
“सम्प्रदाय” की व्याख्या पर बहस
एएसजी ने कहा कि “डिनॉमिनेशन” को पश्चिमी अर्थों में नहीं, बल्कि भारतीय संदर्भ में “धार्मिक सम्प्रदाय” के रूप में समझा जाना चाहिए। उनके अनुसार, सम्प्रदाय का अर्थ किसी औपचारिक संगठन से नहीं, बल्कि समान आस्था और विश्वास रखने वाले लोगों के समूह से है।
इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सवाल किया कि क्या यह केवल धार्मिक विश्वास का मामला है? जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या नए सम्प्रदाय भी बन सकते हैं? एएसजी ने जवाब दिया कि यदि किसी समूह की आस्था समान है, तो वह औपचारिक ढांचे के बिना भी सम्प्रदाय माना जा सकता है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सम्प्रदाय प्राचीन काल से अस्तित्व में होते हैं, जबकि जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी की कि विभिन्न मार्गों से आस्था प्राप्त हो सकती है और यह बात सभी धर्मों पर लागू होती है।
नास्तिक बनाम आस्तिक अधिकारों पर सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने प्रश्न उठाया कि क्या कोई नास्तिक व्यक्ति धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है? एएसजी ने कहा कि नास्तिक को असहमति का अधिकार है, लेकिन वह सम्प्रदाय के धार्मिक आचरण पर सवाल नहीं उठा सकता।
इस पर अदालत ने पूछा कि क्या आस्तिकों के सामूहिक अधिकार, नास्तिक के अधिकारों से ऊपर हैं? इस प्रश्न ने धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन की संवैधानिक बहस को और गहरा किया।
पूर्व फैसले पर केंद्र की आपत्ति
इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलें समाप्त करते हुए कहा कि सबरीमाला पर दिया गया पूर्व फैसला इस धारणा पर आधारित था कि पुरुषों को श्रेष्ठ और महिलाओं को निम्न माना जाता है। उन्होंने कहा कि यह धारणा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।
उन्होंने तर्क दिया कि देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां केवल महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है, कहीं अविवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है, और एक मंदिर में विवाहित पुरुषों को महिलाओं के वेश में प्रवेश करना पड़ता है। उनके अनुसार, यह मामला “पुरुष-प्रधान पूजा” का नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत फिलहाल सात कानूनी प्रश्नों पर विचार कर रही है।
राज्य की भूमिका और संवैधानिक सीमाएं
एएसजी ने कहा कि जब तक कोई धार्मिक प्रथा किसी पर थोपी नहीं जाती, तब तक न्यायालय या राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। हालांकि अनुच्छेद 25(2) और 26(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और सामाजिक सुधार के आधार पर राज्य हस्तक्षेप कर सकता है, जिसकी अंतिम वैधता पर निर्णय न्यायालय करता है।
केंद्र ने यह भी कहा कि देवता के अधिकार, भक्तों के अधिकारों का अभिन्न हिस्सा हैं और अनुच्छेद 25(1) तथा 26 परस्पर जुड़े हुए हैं।
बहुलता बनाम समानता की संवैधानिक कसौटी
सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या होगी।
संविधान पीठ की आगामी सुनवाई में इन संवैधानिक प्रश्नों पर और विस्तार से विचार होने की संभावना है।