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जांजगीर में करोड़ों के निर्माण कार्य पर सवाल: डीएमएफ से जारी करोड़ो रुपये का हिसाब कौन देगा? CGMSC और सिविल सर्जन के जवाब में उलझी कार्य की वास्तविक स्थिति!

NTN REPORT// जांजगीर-चांपा। जिले में इन दिनों करोड़ों रुपये की लागत से विभिन्न निर्माण कार्य संचालित हैं। सेंट्रल लाइब्रेरी, खेल मैदान, बैडमिंटन हॉल और जिला अस्पताल परिसर में प्रस्तावित क्रिटिकल केयर सेंटर जैसे महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों के बीच अब एक और निर्माण कार्य को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। मामला जिला अस्पताल जांजगीर और मेडिकल कॉलेज से संबंधित निर्माण एवं उन्नयन कार्यों का है, जिसके लिए जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) मद से करोड़ों रुपये की राशि स्वीकृत किए जाने की जानकारी सामने आई है। निर्माण एजेंसी के रूप में छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CGMSC) को जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि कार्य की वर्तमान स्थिति, राशि के उपयोग और निर्माण के वास्तविक स्वरूप को लेकर संबंधित अधिकारियों के जवाबों में स्पष्टता नजर नहीं आ रही है।

प्रतीकात्मक एआई तस्वीर

करोड़ों की राशि जारी, फिर निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति क्या है?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला अस्पताल के रखरखाव, मरम्मत एवं उन्नयन संबंधी कार्यों के लिए जिला खनिज न्यास मद से करोड़ों रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई है। बताया जा रहा है कि लगभग दो से तीन महीने पहले ही संबंधित प्रक्रिया पूरी कर राशि जारी की जा चुकी है। वहीं, जानकारी यह भी सामने आई है कि 44 लाख रुपये की राशि CGMSC के खाते में हस्तांतरित की गई है और इसके लिए चेक जारी किया गया है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निर्माण एजेंसी को राशि उपलब्ध करा दी गई है, तो अब तक कार्य की वास्तविक प्रगति क्या है? यदि काम शुरू हो चुका है तो किस स्थान पर, कितनी लागत से और किस स्वीकृत कार्य के तहत किया जा रहा है? वहीं यदि कार्य प्रारंभ नहीं हुआ है तो राशि हस्तांतरित होने के बावजूद देरी की वजह क्या है?

सिविल सर्जन ने कहा- काम शुरू हो गया है, लेकिन कहां हो रहा है, इस पर स्पष्ट जवाब नहीं

इस पूरे मामले में जिला अस्पताल के सिविल सर्जन, जो संबंधित कार्य के नोडल अधिकारी बताए जा रहे हैं, से जब निर्माण कार्य की स्थिति जानने का प्रयास किया गया तो उनके द्वारा कार्य प्रारंभ होने की बात कही गई। लेकिन कार्य वास्तव में किस स्थान पर संचालित है और अब तक कितनी प्रगति हुई है, इस संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी।

यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। जिले में मेडिकल कॉलेज के निर्माण एवं उन्नयन से संबंधित अलग-अलग कार्य भी चल रहे हैं। ऐसे में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि वर्तमान में जिस कार्य के शुरू होने की बात कही जा रही है, वह मेडिकल कॉलेज के लिए स्वीकृत राशि से कराया जा रहा है अथवा जिला अस्पताल के लिए डीएमएफ मद से जारी राशि के अंतर्गत हो रहा है?

दोनों कार्यों की स्वीकृतियां, मद और वित्तीय प्रावधान अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए प्रत्येक कार्य की पहचान, स्वीकृत राशि और व्यय का स्पष्ट विवरण सार्वजनिक होना आवश्यक है।

CGMSC के उप अभियंता ने भी नोडल अधिकारी पर छोड़ी जिम्मेदारी

मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए CGMSC के उप अभियंता अमन राजपूत से भी संपर्क किया गया। उनके द्वारा कार्य प्रारंभ होने की जानकारी दी गई, लेकिन जब यह जानना चाहा गया कि कार्य किस स्वीकृत मद से कराया जा रहा है और जिला अस्पताल के लिए डीएमएफ मद से जारी राशि का इसमें उपयोग हो रहा है या नहीं, तो उन्होंने इस संबंध में जानकारी देने के बजाय सिविल सर्जन को नोडल अधिकारी बताते हुए उन्हीं से जानकारी लेने की बात कही।

इसके बाद संबंधित एसडीओ से भी संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनकी ओर से कोई स्पष्ट जवाब प्राप्त नहीं हो सका।

अब सवाल यह है कि जब निर्माण एजेंसी CGMSC है, उसके खाते में राशि हस्तांतरित होने की जानकारी है और विभागीय स्तर पर कार्य प्रारंभ होने का दावा किया जा रहा है, तो फिर कार्य की स्वीकृति, वित्तीय मद, प्रगति और व्यय की जानकारी देने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

क्या निर्माण एजेंसी को यह जानकारी नहीं होनी चाहिए कि वह किस कार्यादेश और किस मद के तहत निर्माण करा रही है? क्या नोडल अधिकारी को कार्य की भौतिक एवं वित्तीय प्रगति की जानकारी नहीं होनी चाहिए? और यदि संबंधित अधिकारियों के पास ही इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं है, तो फिर कार्यों की निगरानी किस स्तर पर की जा रही है?

CGMSC की कार्यप्रणाली पर पहले भी उठते रहे हैं सवाल

छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CGMSC) प्रदेश में स्वास्थ्य अधोसंरचना से जुड़े अनेक निर्माण एवं विकास कार्यों की जिम्मेदारी निभाता है। लेकिन निगम की कार्यप्रणाली और इससे जुड़े विवाद समय-समय पर प्रदेश स्तर पर चर्चा में रहे हैं।

ऐसे में जांजगीर-चांपा जिले में भी करोड़ों रुपये के निर्माण कार्यों को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। विशेषकर तब, जब निर्माण कार्यों के लिए डीएमएफ जैसी महत्वपूर्ण निधि का उपयोग किया जा रहा हो और संबंधित अधिकारियों के बीच ही कार्य की स्थिति को लेकर स्पष्टता दिखाई नहीं दे रही हो।

डीएमएफ की राशि जनता के हित के लिए, जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी

जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) की राशि का उपयोग खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और निर्धारित प्राथमिकता वाले सार्वजनिक हित के कार्यों के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, पर्यावरण, आधारभूत सुविधाओं और अन्य स्वीकृत विकास कार्यों को गति देना है।

ऐसे में डीएमएफ से स्वीकृत प्रत्येक निर्माण कार्य का समय पर क्रियान्वयन, निर्धारित मद में राशि का उपयोग, गुणवत्ता परीक्षण और नियमित निगरानी सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों एवं कार्यकारी एजेंसी की जिम्मेदारी है।

जनता के धन से होने वाले निर्माण कार्यों में केवल राशि स्वीकृत कर देना या निर्माण एजेंसी को हस्तांतरित कर देना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि स्वीकृत कार्य धरातल पर दिखाई दे, उसकी गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप हो और खर्च की गई राशि का पूरा हिसाब उपलब्ध हो।

कलेक्टर के संज्ञान में आने के बाद इन सवालों का मिलना चाहिए स्पष्ट जवाब

इस पूरे मामले में जिला प्रशासन, विशेषकर कलेक्टर से अपेक्षा है कि संबंधित विभागों से कार्य की वर्तमान स्थिति की तथ्यात्मक जानकारी लेकर आवश्यक समीक्षा करें। साथ ही यह भी स्पष्ट कराया जाए कि डीएमएफ मद से स्वीकृत राशि का कितना हिस्सा अब तक खर्च हुआ है, कितना शेष है और निर्माण कार्य निर्धारित समय-सीमा के अनुसार आगे बढ़ रहा है या नहीं।

अब जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने कुछ सीधे सवाल हैं:

  1. जिला अस्पताल के उन्नयन एवं रखरखाव के लिए डीएमएफ मद से कुल कितनी राशि स्वीकृत की गई है और कितनी राशि वास्तव में CGMSC को हस्तांतरित की गई है?
  2. क्या 44 लाख रुपये की राशि इसी डीएमएफ स्वीकृति के अंतर्गत हस्तांतरित की गई है? यदि हां, तो इस राशि के विरुद्ध कौन-कौन से कार्य स्वीकृत हैं?
  3. निर्माण कार्य का विधिवत कार्यादेश कब जारी हुआ और कार्य प्रारंभ करने की निर्धारित समय-सीमा क्या है?
  4. सिविल सर्जन द्वारा कार्य प्रारंभ होने की बात कही जा रही है, तो कार्यस्थल, वर्तमान भौतिक प्रगति और अब तक हुए व्यय का विवरण क्या है?
  5. क्या वर्तमान में कराया जा रहा कार्य जिला अस्पताल के डीएमएफ मद से संबंधित है अथवा मेडिकल कॉलेज के लिए स्वीकृत किसी अन्य मद से?
  6. निर्माण कार्य का तकनीकी निरीक्षण किस अधिकारी द्वारा किया जा रहा है? अब तक कितनी बार निरीक्षण किया गया और उसकी रिपोर्ट कहां उपलब्ध है?
  7. यदि राशि हस्तांतरित होने के बावजूद कार्य निर्धारित गति से नहीं हो रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी?

इन सवालों के जवाब केवल मौखिक दावों से नहीं, बल्कि स्वीकृति आदेश, कार्यादेश, तकनीकी स्वीकृति, माप पुस्तिका, भुगतान विवरण, निरीक्षण प्रतिवेदन और कार्य की भौतिक प्रगति जैसे अभिलेखों से सामने आने चाहिए।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि 44 लाख रुपये की राशि हस्तांतरित होने के बाद भी कार्य की वास्तविक स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं मिल पा रही है? आखिर निर्माण कार्य किस मद से हो रहा है, किसकी निगरानी में हो रहा है और अब तक कितना काम पूरा हुआ है?

स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत से जुड़े निर्माण कार्यों में इस तरह की अस्पष्टता को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जरूरत है कि संबंधित अधिकारी और निर्माण एजेंसी सामने आकर स्थिति स्पष्ट करें, ताकि जनता के धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप हो और महत्वपूर्ण स्वास्थ्य परियोजनाओं में अनावश्यक विलंब न हो।

अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और संबंधित विभाग जनता के सामने इन सवालों का दस्तावेजी जवाब कब तक रखते हैं।

यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। संबंधित विभागों एवं अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में उचित स्थान दिया जाएगा।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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