NTN REPORT// नई दिल्ली। संसद के 20 जुलाई से शुरू होने वाले मॉनसून सत्र से पहले प्रस्तावित परिसीमन विधेयक (131वां संविधान संशोधन विधेयक) को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। एक ओर केंद्र सरकार इस विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का गणित साधने में जुटी है, वहीं कांग्रेस ने इसके खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है। दूसरी ओर शिवसेना (यूबीटी) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) ने संशोधनों की शर्त पर विधेयक का समर्थन करने के संकेत देकर राजनीतिक समीकरणों को और दिलचस्प बना दिया है।

इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन और सरकार के संशोधित प्रस्तावों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग दोहराई है। बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच संसद के आगामी सत्र में यह विधेयक सबसे चर्चित मुद्दों में शामिल रहने की संभावना है।
लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचने की कोशिश
लोकसभा में फिलहाल एनडीए के पास 293 सांसदों का समर्थन है। अप्रैल में परिसीमन विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े थे। यदि उसी आधार को माना जाए तो हाल के राजनीतिक बदलाव सरकार के पक्ष में जाते दिखाई दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार यदि तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसद, उद्धव ठाकरे गुट से शिंदे गुट में शामिल हुए 6 सांसद तथा एनसीपी (शरद पवार गुट) के 8 सांसद सरकार का समर्थन करते हैं तो एनडीए की संख्या और मजबूत हो सकती है। इसके अतिरिक्त यदि डीएमके के 22 सांसद भी समर्थन देते हैं तो सरकार दो-तिहाई बहुमत के लिए आवश्यक 360 के आंकड़े से केवल छह सांसद पीछे रह जाएगी।
ऐसी स्थिति में यदि कुछ छोटे दल मतदान से अनुपस्थित रहते हैं या मतदान में हिस्सा नहीं लेते हैं तो प्रभावी बहुमत का आंकड़ा घट सकता है, जिससे सरकार के लिए विधेयक पारित कराना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
राज्यसभा में भी सरकार की नजर सहयोगी समर्थन पर
राज्यसभा में कुल 245 सदस्य हैं, जहां दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 सांसदों का समर्थन आवश्यक है। वर्तमान में एनडीए के पास 153 सांसदों का समर्थन है, जिसमें 7 मनोनीत और 3 निर्दलीय सदस्य भी शामिल हैं।
अप्रैल में वाईएसआर कांग्रेस के चार सांसद परिसीमन विधेयक के पक्ष में मतदान कर चुके थे। ऐसे में सरकार को प्रभावी रूप से लगभग सात और सांसदों के समर्थन की आवश्यकता मानी जा रही है।
सरकार की नजर विशेष रूप से डीएमके, बीजू जनता दल (बीजेडी), भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) और एनसीपी (शरद पवार गुट) के सांसदों पर टिकी हुई है। यदि इन दलों का समर्थन मिलता है तो राज्यसभा में भी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा हासिल करना सरकार के लिए आसान हो सकता है।
तीन महीनों में पूरी तरह बदल गए राजनीतिक समीकरण
करीब तीन महीने पहले तक संसद में विपक्षी दलों की एकजुटता सरकार के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही थी। लेकिन हाल के महीनों में विपक्षी खेमे में आए राजनीतिक बदलावों ने तस्वीर बदल दी है।
तृणमूल कांग्रेस में टूट, आम आदमी पार्टी में बगावत और शिवसेना (यूबीटी) में बिखराव जैसे घटनाक्रमों के बाद सरकार पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। वहीं डीएमके और कांग्रेस के बीच भी राजनीतिक दूरी बढ़ने की चर्चाएं तेज हैं, जिससे विपक्ष की एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार) ने दिए समर्थन के संकेत
महाराष्ट्र से सरकार के लिए सकारात्मक संकेत मिलते दिखाई दे रहे हैं।
शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा है कि यदि सरकार विपक्ष के सुझावों के अनुरूप आवश्यक संशोधन करती है तो उनकी पार्टी विधेयक का समर्थन करने पर विचार कर सकती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय विधेयक संसद में आने और विपक्षी दलों के साथ चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।
वहीं एनसीपी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि यदि सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या समान रूप से 50 प्रतिशत बढ़ाने का प्रावधान किया जाता है तो उनकी पार्टी को विधेयक का विरोध करने का कोई विशेष कारण नजर नहीं आता।
कांग्रेस ने किया पुरजोर विरोध का ऐलान
कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह परिसीमन विधेयक का संसद में जोरदार विरोध करेगी।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार विपक्षी दलों में टूट पैदा कर दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस नेतृत्व सहयोगी दलों के लगातार संपर्क में है और सरकार की इस रणनीति को सफल नहीं होने देगा।
कांग्रेस ने यह भी संकेत दिए हैं कि मॉनसून सत्र के दौरान वह राम मंदिर चंदा, कथित ई-20 घोटाला, खाद्य सुरक्षा कानून में संशोधन, चीन-अमेरिका संबंध, पश्चिम एशिया की स्थिति सहित कई अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर भी सरकार को घेरने की तैयारी में है।
मॉनसून सत्र में सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा
20 जुलाई से शुरू होने वाला संसद का मॉनसून सत्र केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सरकार और विपक्ष दोनों के लिए राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच भी बनने जा रहा है।
यदि सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो परिसीमन विधेयक संसद में पारित होने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा सकता है। वहीं यदि विपक्ष अपनी एकजुटता बनाए रखने में सफल रहता है तो सरकार के लिए यह चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
संसद का आगामी सत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें केवल परिसीमन विधेयक ही नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों की वास्तविक तस्वीर भी सामने आएगी।
अस्वीकरण: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।