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भारतसुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट

आपसी विश्वास और साथ पर आधारित विवाह, जब ये तत्व गायब होते हैं तो वैवाहिक बंधन मात्र कानूनी औपचारिकता बन जाता है : सुप्रीम कोर्ट

देश, सर्वोच्च न्यायालय 21 दिसम्बर 2024 // सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक अलग रहना और सुलह न कर पाना वैवाहिक विवादों को सुलझाने में एक महत्वपूर्ण कारक हो सकता है, जब विवाह आपसी विश्वास और साथ के बिना मात्र कानूनी औपचारिकता बन जाता है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की खंडपीठ ने कहा: “विवाह आपसी विश्वास, साथ और साझा अनुभवों पर आधारित एक रिश्ता है। जब ये आवश्यक तत्व लंबे समय तक गायब रहते हैं तो वैवाहिक बंधन मात्र कानूनी औपचारिकता बन जाता है, जिसमें कोई सार नहीं रह जाता। इस न्यायालय ने लगातार माना है कि लंबे समय तक अलग रहना और सुलह न कर पाना वैवाहिक विवादों को सुलझाने में एक महत्वपूर्ण कारक है।” न्यायालय ने मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक का आदेश देने वाले हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली महिला द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं।

न्यायालय ने कहा : “प्रतिवादी ने यह दिखाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं कि अपीलकर्ता ऐसे व्यवहार में लिप्त था, जिससे उसे मानसिक और भावनात्मक रूप से बहुत अधिक परेशानी हुई। इसमें प्रतिवादी और उसके परिवार के खिलाफ झूठी और निराधार आपराधिक शिकायतें दर्ज करना शामिल था, जिससे न केवल उनके रिश्ते में तनाव आया, बल्कि उसकी प्रतिष्ठा और मानसिक शांति को भी काफी नुकसान पहुंचा।”

न्यायालय ने कहा कि यह तथ्य कि दोनों पक्ष दो दशकों से अलग-अलग रह रहे हैं, इस निष्कर्ष को और पुष्ट करता है कि विवाह अब व्यवहार्य नहीं है। यद्यपि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह का अपूरणीय रूप से टूटना तलाक के लिए वैधानिक आधार नहीं है। उचित मामलों में भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करके राहत प्रदान की जा सकती है, जहां विवाह सुधार से परे हो।

न्यायालय ने कहा कि वर्तमान मामले में साक्ष्य स्पष्ट रूप से विवाह के अपूरणीय रूप से टूटने की ओर इशारा करते हैं, क्योंकि पक्षों के बीच कानूनी विवाद और उनका लंबे समय से अलगाव चल रहा है। अशोक हुर्रा बनाम रूपा बिपिन जावेरी और शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन के मामले का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा : “एक मृत विवाह को आगे बढ़ाने से कोई लाभ नहीं होता है। इससे केवल संबंधित पक्षों की पीड़ा बढ़ती है।”

न्यायालय ने कहा : “जब विवाह दुख और संघर्ष का स्रोत बन गया हो तो उसे जारी रखने के लिए मजबूर करना विवाह संस्था के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। वर्तमान मामले में दोनों पक्षों के हितों की पूर्ति तभी होगी, जब दोनों पक्षों को स्वतंत्र रूप से अपने जीवन को आगे बढ़ाने की अनुमति दी जाए।” केस टाइटल: अमुथा बनाम एआर सुब्रमण्यन

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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