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भारतसुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट

दीवानी प्रकृति आपराधिक मामले को पक्षकारों के आपस में विवाद सुलझा लेने के बाद ही रद्द किया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दीवानी लेन-देन से उत्पन्न आपराधिक मामलों को तब रद्द किया जाना चाहिए, जब पक्षकार आपस में अपने सभी विवादों को सुलझा लें।

इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि यह न्यायालय इस स्थिति को दोहराता है कि आपराधिक मामले जो मुख्य रूप से दीवानी प्रकृति के हैं, विशेष रूप से वाणिज्यिक लेन-देन से उत्पन्न या वैवाहिक संबंध या पारिवारिक विवादों से उत्पन्न होने वाले मामलों को तब रद्द किया जाना चाहिए, जब पक्षकार आपस में अपने सभी विवादों को सुलझा लें।

वर्तमान मामले में विवाद मुख्य रूप से दीवानी विवाद की ओर इशारा करता था। एफआईआर और आरोप पत्र तरफ आरोपी व्यक्तियों और दूसरी तरफ बैंक द्वारा लिए गए ऋण लेनदेन से संबंधित विवाद से संबंधित थे। बैंक की शिकायत के आधार पर CBI ने भारतीय दंड संहिता 1860 (IPC) की धारा 120-बी के साथ 420, 409, 467, 468 और 471 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 13(1)(डी) और 13(2) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए एफआईआर दर्ज की। आरोप पत्र भी दाखिल किया गया। बेशक, बैंक और आरोपी व्यक्तियों ने मामले को सुलझा लिया।

बैंक द्वारा समान मासिक किस्तों (EMI) या गिरवी रखी गई संपत्तियों की बिक्री के माध्यम से प्राप्त पहले के भुगतान के अलावा, उधारकर्ताओं ने OTS के तहत 3,80,00,000/- रुपये की राशि का भुगतान किया। OTS के तहत राशि प्राप्त होने के बाद, बैंक ने ऋण खाता बंद करने का भी निर्णय लिया।

हाईकोर्ट का निर्णय दरकिनार करते हुए न्यायालय ने अपीलकर्ताओं के विरुद्ध लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए यह उचित मामला पाया, क्योंकि उसने पाया कि आपराधिक कार्यवाही में अत्यधिक और प्रमुख रूप से नागरिक भावना थी, जहां गलत निजी या व्यक्तिगत था और पक्षों ने अपने पूरे विवाद को सुलझा लिया था।

ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2012) के तीन जजों के निर्णय का हवाला देते हुए न्यायालय ने निम्नलिखित टिप्पणी की,“यह माना गया कि कुछ अपराध ऐसे हैं, जो अत्यधिक और प्रमुख रूप से नागरिक भावना रखते हैं, जो नागरिक, व्यापारिक, वाणिज्यिक, वित्तीय, साझेदारी या इस तरह के लेन-देन या विवाह से उत्पन्न अपराध, विशेष रूप से दहेज आदि से संबंधित या पारिवारिक विवाद से उत्पन्न होते हैं, जहां गलत मूल रूप से पीड़ित के लिए होता है। अपराधी और पीड़ित ने अपने बीच के सभी विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया, हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक कार्यवाही रद्द करना उचित होगा, भले ही अपराधों को समझौता योग्य न बनाया गया हो।”

न्यायालय ने कहा कि जब पीड़ित/बैंक के साथ पूर्ण और अंतिम समझौते के बाद दोषसिद्धि की संभावना बहुत कम है तो अभियुक्त के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा।

न्यायालय ने कहा,

“इसके अलावा, यह भी ध्यान देने योग्य है कि DRT के समक्ष कार्यवाही में पक्षों के बीच समझौते को देखते हुए दोषसिद्धि की संभावना बहुत कम है। हमारे विचार में आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से अभियुक्त को बहुत अधिक उत्पीड़न और पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ेगा।”

न्यायालय ने कहा,

“परिणामस्वरूप, हम पाते हैं कि यह एक उपयुक्त मामला था, जिसमें हाईकोर्ट को धारा 482 सीआरपीसी के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करना चाहिए था। आपराधिक कार्यवाही रद्द करना चाहिए था।”

तदनुसार, अपील को अनुमति दी गई और विवादित निर्णय रद्द कर दिया गया। लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द की जाती है।केस टाइटल: के. भारती देवी और अन्य बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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