भारतीय कृषि में बड़ा बदलाव: जैविक विकल्पों के साथ वैज्ञानिक खेती पर जोर
मिट्टी की सेहत, लागत में कमी और पर्यावरण संरक्षण बने खेती के नए केंद्र — जैव एवं नीम आधारित कीटनाशकों के उपयोग में 62 गुना से अधिक वृद्धि
NTN REPORT// भारतीय कृषि व्यवस्था में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। अब किसानों का ध्यान केवल अधिक से अधिक उत्पादन हासिल करने तक सीमित नहीं रह गया है। मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना, फसल को सुरक्षित रखना, खेती की लागत कम करना, रासायनिक अवशेषों को घटाना और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय भी खेती के केंद्र में आ गए हैं। यही कारण है कि देश में किसान जैव-कीटनाशकों, जैव उर्वरकों, नीम आधारित उत्पादों, कंपोस्ट, हरी खाद और प्राकृतिक खेती जैसे विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

हालांकि कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खेती का भविष्य पूरी तरह रासायनिक या पूरी तरह जैविक खेती में नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि दोनों के वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग से ऐसी कृषि प्रणाली विकसित की जाए, जिसमें अनावश्यक रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम हो और उत्पादन के साथ मिट्टी, पर्यावरण तथा किसान की आय का भी ध्यान रखा जा सके।
जैव और नीम आधारित कीटनाशकों का उपयोग 62 गुना बढ़ा
पौध संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1994-95 में देश में जैव एवं नीम आधारित कीटनाशकों का उपयोग महज 123 मीट्रिक टन था। यह मात्रा बढ़कर वर्ष 2024-25 में 7,649 मीट्रिक टन तकनीकी ग्रेड तक पहुंच गई।
करीब 62 गुना से अधिक की यह वृद्धि बताती है कि किसान अब पौध संरक्षण के लिए जैव आधारित तकनीकों को पहले की तुलना में अधिक महत्व दे रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं। इनमें कीटनाशकों के प्रति कीटों में बढ़ता प्रतिरोध, लाभकारी कीटों और परागण करने वाले जीवों का संरक्षण, मिट्टी की सेहत तथा खाद्य उत्पादों में रासायनिक अवशेषों को लेकर बढ़ती जागरूकता प्रमुख हैं।
जैविक खेती का दायरा भी लगातार बढ़ रहा
राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम के वर्ष 2024-25 के आंकड़े भी देश में जैविक खेती के बढ़ते दायरे की तस्वीर पेश करते हैं। इस अवधि में करीब 39.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जैविक प्रमाणीकरण के दायरे में पहुंच चुका था।
इसमें लगभग 22.5 लाख हेक्टेयर प्रमाणित जैविक क्षेत्र शामिल है, जबकि करीब 17.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक प्रमाणीकरण की प्रक्रिया चल रही है।
इसी अवधि में देश में लगभग 46.99 लाख मीट्रिक टन जैविक उत्पादन दर्ज किया गया। भारत ने 3.68 लाख टन से अधिक जैविक उत्पादों का निर्यात भी किया, जिससे करीब 5,394 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा अर्जित हुई।
ये आंकड़े बताते हैं कि जैविक खेती केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि किसानों के लिए बेहतर बाजार, निर्यात के अवसर और अतिरिक्त आय का संभावित जरिया भी बन रही है।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय मिशन
केंद्र सरकार ने नवंबर 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को मंजूरी दी थी। इस मिशन के लिए 2,481 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में मिशन के तहत 18,893 किसान समूहों के माध्यम से लगभग 10.32 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को जोड़ा गया। इस पहल में करीब 20.93 लाख किसान शामिल हुए।
मिशन का प्रमुख उद्देश्य स्थानीय संसाधनों, पशुधन आधारित इनपुट और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर किसानों की खेती की लागत कम करना तथा अधिक टिकाऊ कृषि व्यवस्था तैयार करना है।
ट्राइकोडर्मा से लेकर नीम आधारित उत्पादों तक बढ़ा इस्तेमाल
विशेषज्ञों के अनुसार जैविक पौध संरक्षण में कई ऐसे सूक्ष्मजीव और जैविक एजेंट हैं, जिनका उपयोग फसल रोगों और कीटों के प्रबंधन में किया जा रहा है।
ट्राइकोडर्मा जैसे लाभकारी कवक मिट्टी और बीज से पैदा होने वाले कई रोगों के नियंत्रण में उपयोगी माने जाते हैं। वहीं बैसिलस और स्यूडोमोनास जैसे सूक्ष्मजीव पौधों की जड़ों के आसपास सक्रिय होकर रोग फैलाने वाले कारकों को नियंत्रित करने के साथ पौधों की वृद्धि में भी मदद कर सकते हैं।
इसी तरह ब्यूवेरिया बैसियाना और मेटाराइजियम जैसे जैविक एजेंट कई हानिकारक कीटों के प्रबंधन में उपयोग किए जाते हैं। नीम और अजादिरैक्टिन आधारित उत्पाद भी चूसक तथा पत्ती खाने वाले कीटों के नियंत्रण में उपयोगी माने जाते हैं।
जैव उर्वरकों की मांग भी बढ़ी
पोषण प्रबंधन के क्षेत्र में भी जैव आधारित विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु और माइकोराइजा जैसे जैव उर्वरक मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता और पौधों के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इसके अलावा वर्मी कंपोस्ट, सामान्य कंपोस्ट और हरी खाद मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने तथा उसकी भौतिक और जैविक गुणवत्ता सुधारने में मदद करते हैं।
वैज्ञानिक खेती ही भविष्य का रास्ता
कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि जैविक उत्पाद प्रभावी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें किसी चमत्कारी समाधान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जीवित सूक्ष्मजीवों पर आधारित उत्पादों को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए उचित नमी, तापमान और पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है।
इसीलिए जैविक उपायों का उपयोग विशेष रूप से रोकथाम और समेकित प्रबंधन की रणनीति के तहत अधिक प्रभावी माना जाता है।
विशेषज्ञ किसानों को समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन मॉडल अपनाने की सलाह देते हैं। इसमें स्वस्थ बीज, रोगरोधी किस्मों का चयन, फसल चक्र, खेत की स्वच्छता, संतुलित पोषण, जैविक नियंत्रण और आवश्यकता पड़ने पर सीमित एवं वैज्ञानिक तरीके से रासायनिक नियंत्रण शामिल है।
हर जैविक उत्पाद अच्छी गुणवत्ता का नहीं
विशेषज्ञों ने किसानों को बाजार में उपलब्ध जैविक उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर भी सावधान रहने की सलाह दी है। बाजार में उपलब्ध हर उत्पाद समान गुणवत्ता का नहीं हो सकता।
उत्पाद खरीदते समय किसान को उसका पंजीकरण, बैच नंबर, निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि, भंडारण संबंधी निर्देश और लेबल पर दिए गए उपयोग के निर्देश जरूर जांचने चाहिए।
जैविक उत्पादों को तेज धूप और अत्यधिक तापमान से बचाकर रखना भी जरूरी है। अनुचित भंडारण से उत्पाद में मौजूद जीवित सूक्ष्मजीवों की प्रभावशीलता कम हो सकती है और अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते।
‘कम रसायन’ नहीं, ‘सही विज्ञान’ बने खेती का मंत्र
विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य की खेती का मंत्र केवल ‘कम रसायन’ नहीं बल्कि ‘सही विज्ञान’ होना चाहिए। उनका मानना है कि जैविक और सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों को वैज्ञानिक तरीके से समेकित प्रबंधन प्रणाली में शामिल किया जाए तो खेती को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक खेती में किसी एक पद्धति को हर समस्या का समाधान मानने के बजाय फसल और खेत की वास्तविक स्थिति के आधार पर निर्णय लेना अधिक महत्वपूर्ण है। सबसे पहले फसल की समस्या की सही पहचान हो, उसके बाद गुणवत्ता वाले उत्पाद का चयन किया जाए और सही समय एवं सही मात्रा में उसका इस्तेमाल किया जाए।
किसान के लिए सबसे जरूरी चार बातें
- समस्या की सही पहचान
- गुणवत्ता वाले उत्पाद का चयन
- सही समय और सही तरीके से उपयोग
- वैज्ञानिक सलाह के आधार पर निर्णय
भारतीय कृषि अब केवल उत्पादन बढ़ाने की दौड़ तक सीमित नहीं है। मिट्टी की सेहत, उत्पादन लागत, पर्यावरण संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और किसान की आय जैसे मुद्दे भी खेती की दिशा तय कर रहे हैं। जैव-कीटनाशकों और जैव उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल से लेकर जैविक और प्राकृतिक खेती के बढ़ते क्षेत्र तक, कई संकेत बताते हैं कि भारतीय कृषि एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।
हालांकि विशेषज्ञों का जोर पूर्ण रूप से रासायनिक या पूर्ण रूप से जैविक खेती के बजाय वैज्ञानिक, संतुलित और समेकित कृषि प्रणाली पर है। यदि किसान फसल की समस्या को सही ढंग से पहचानकर गुणवत्ता वाले जैविक एवं रासायनिक साधनों का जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल करें, तो उत्पादन, लागत, मिट्टी की सेहत और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।