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राजनीति

आरक्षण में क्रीमी लेयर और सब-कोटा पर तेज हुई बहस, किरोड़ी लाल मीणा से मांझी-राजभर तक उठी वंचितों को हिस्सेदारी देने की मांग!

आरक्षण में क्रीमी लेयर और सब-कोटा पर तेज हुई बहस, किरोड़ी लाल मीणा से मांझी-राजभर तक उठी वंचितों को हिस्सेदारी देने की मांग!

NTN REPORT// नई दिल्ली/जयपुर। देश में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण को लेकर एक बार फिर क्रीमी लेयर और सब-कोटा की बहस तेज हो गई है। राजस्थान के कैबिनेट मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा से लेकर बिहार के हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रमुख जीतन राम मांझी और उत्तर प्रदेश के सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर तक कई नेता आरक्षण का लाभ समाज के सबसे वंचित तबकों तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।

प्रतीकात्मक एआई तस्वीर

किरोड़ी लाल मीणा बोले- सबसे वंचित व्यक्ति को भी मिले मौका

राजस्थान में मीणा समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है। दौसा के नांगल प्यारीवास स्थित ‘मीणा हाईकोर्ट’ के मंच से डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने आरक्षण में क्रीमी लेयर को लेकर अपनी राय स्पष्ट की।

उन्होंने कहा कि क्रीमी लेयर के मुद्दे पर वह सुप्रीम कोर्ट की भावना के साथ हैं। अपने उदाहरण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वह डॉक्टर बने, उनके भाई आईआरएस और आईएएस बने और वह स्वयं मंत्री बने। लेकिन उनके गांव में एक व्यक्ति करीब 30 वर्षों से पहाड़ खोदकर मजदूरी कर अपना पेट पाल रहा है और उसके बच्चे भी उसी काम में लगे हैं।

किरोड़ी लाल मीणा का तर्क है कि यदि किसी परिवार को आरक्षण का लाभ मिलने के बावजूद अगली पीढ़ियों में सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ने का अवसर मिल गया है, तो समाज के उन लोगों तक भी अवसर पहुंचना चाहिए जो आज भी बेहद पिछड़ी स्थिति में हैं।

जीतन राम मांझी ने उठाया आरक्षण के असमान लाभ का सवाल

बिहार में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी लंबे समय से आरक्षण के भीतर असमान लाभ का मुद्दा उठाते रहे हैं।

मांझी का कहना है कि आरक्षण का लाभ अनुसूचित जाति समाज की कुछ अपेक्षाकृत मजबूत और जागरूक जातियों तक अधिक पहुंचा है, जबकि मुसहर और भुइयां जैसे अत्यंत वंचित समुदाय आज भी बुनियादी सुविधाओं और अवसरों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

उनकी मांग है कि आरक्षण की व्यवस्था का लाभ समाज के उन वर्गों तक भी सुनिश्चित किया जाए, जो दशकों बाद भी इसके प्रत्यक्ष लाभ से दूर हैं।

ओपी राजभर की मांग- अति-पिछड़ों और अत्यंत पिछड़ों को मिले अलग हिस्सा

उत्तर प्रदेश के मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर भी आरक्षण के भीतर वर्गीकरण की पैरवी करते रहे हैं।

राजभर का तर्क है कि केवल आरक्षण की कुल व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। इसके भीतर भी सामाजिक रूप से अत्यंत पिछड़े और अति-पिछड़े समुदायों की अलग पहचान जरूरी है, ताकि अपेक्षाकृत मजबूत वर्गों के बीच ही आरक्षण का लाभ सीमित न रह जाए।

उनका कहना है कि ओबीसी और एससी आरक्षण में त्रिस्तरीय बंटवारे जैसी व्यवस्था के जरिए सबसे निचले पायदान पर खड़े समुदायों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है।

संजय निषाद बोले- आरक्षण आर्थिक नहीं, सामाजिक आधार पर मिला

उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद ने भी आरक्षण के वर्तमान स्वरूप में बदलाव की आवश्यकता का मुद्दा उठाया है।

उनका कहना है कि आरक्षण की मूल व्यवस्था समुदाय और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर की गई थी, न कि आर्थिक आधार पर। लेकिन समय के साथ ऐसी स्थिति भी सामने आई है, जहां आरक्षण प्राप्त वर्गों में कुछ लोग शिक्षा और बड़े पदों तक पहुंच गए, जबकि उसी समुदाय के दूसरे लोग अब भी अवसरों से वंचित हैं।

संजय निषाद का तर्क है कि जो लोग आरक्षण का लाभ लेकर सांसद, विधायक अथवा बड़े पदों तक पहुंच चुके हैं, उन्हें सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर अगली पीढ़ी के लिए आरक्षण का लाभ छोड़ने पर भी विचार करना चाहिए।

चिराग पासवान सब-कैटेगरी के विरोध में

वहीं एनडीए के प्रमुख घटक दल लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान आरक्षण के भीतर दलितों के किसी भी प्रकार के बंटवारे का विरोध कर चुके हैं।

चिराग पासवान का कहना है कि संविधान में आरक्षण का आधार सामाजिक पिछड़ापन रहा है, आर्थिक स्थिति या अन्य कोई आधार नहीं। उनका मानना है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण में किसी प्रकार का विभाजन सामाजिक न्याय की मूल भावना को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, चिराग पासवान ने यह भी कहा है कि वह अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अधिकारों और हितों का संरक्षण करने के साथ-साथ सामान्य वर्ग और ऊंची जातियों से आने वाले लोगों की आवाज भी मजबूती से उठाएंगे।

इसी बीच उनकी पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य महेश कुमार पांडेय ने पार्टी से इस्तीफा देते हुए कहा कि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों और सवर्णों के खिलाफ कथित बयानबाजी से सहमत नहीं हैं।

जमीनी हकीकत क्या कहती है?

आरक्षण में क्रीमी लेयर और सब-कैटेगरी की बहस के पीछे सबसे बड़ा सवाल यही है कि आरक्षण का वास्तविक लाभ समाज के कितने लोगों तक पहुंचा है।

विभिन्न अध्ययनों और सरकारी स्तर पर की गई कवायदों में आरक्षित वर्गों के भीतर लाभ के असमान वितरण का मुद्दा सामने आता रहा है। ओबीसी में आरक्षण के लाभ के असमान वितरण का अध्ययन करने के लिए केंद्र सरकार ने न्यायमूर्ति जी. रोहिणी की अध्यक्षता में आयोग गठित किया था।

आयोग का उद्देश्य ओबीसी के भीतर आरक्षण के लाभ के वितरण की स्थिति का अध्ययन करना और जरूरत पड़ने पर वर्गीकरण की संभावनाओं पर विचार करना था।

इसी तरह एससी और एसटी वर्गों के भीतर भी यह सवाल उठता रहा है कि क्या आरक्षण का लाभ सभी समुदायों तक समान रूप से पहुंच रहा है या कुछ समुदाय अपेक्षाकृत अधिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने खोला सब-कैटेगरी का रास्ता

आरक्षण के भीतर वर्गीकरण की बहस को सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिला।

‘पंजाब सरकार बनाम देविंदर सिंह’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने 6:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य सरकारें अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण यानी सब-कैटेगरी कर सकती हैं, ताकि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक भी पहुंचाया जा सके जो अपेक्षाकृत अधिक वंचित हैं।

फैसले ने राज्यों के लिए एससी वर्ग के भीतर आरक्षण के लाभ के समान वितरण को लेकर नीति बनाने की संभावना को मजबूत किया।

इसी फैसले में न्यायालय की ओर से एससी वर्ग में क्रीमी लेयर की पहचान करने और आरक्षण के लाभ को वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।

हालांकि, क्रीमी लेयर की अवधारणा और उसे एससी/एसटी आरक्षण में किस रूप में लागू किया जाए, यह अब भी व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस का विषय है।

भाजपा और कांग्रेस की रणनीतिक चुप्पी?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सब-कैटेगरी और क्रीमी लेयर का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील बन गया है।

भाजपा और कांग्रेस जैसी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों के लिए यह विषय बेहद चुनौतीपूर्ण है। एक तरफ आरक्षण के भीतर सबसे वंचित समुदायों को अधिक हिस्सेदारी देने की मांग है, तो दूसरी तरफ अनुसूचित जाति और जनजाति के भीतर किसी भी प्रकार के विभाजन के विरोध की मजबूत राजनीतिक आवाज भी मौजूद है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो किसी भी बड़े दल के लिए इस मुद्दे पर स्पष्ट पक्ष लेना आसान नहीं है। सब-कैटेगरी के समर्थन से उन समुदायों में असंतोष पैदा हो सकता है जिन्हें लगता है कि मौजूदा व्यवस्था में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल रहा है। वहीं इसके विरोध से उन अति-वंचित समुदायों के बीच नाराजगी पैदा होने की आशंका है जो लंबे समय से आरक्षण के समान लाभ की मांग कर रहे हैं।

यही वजह है कि यह मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए बेहद संवेदनशील बना हुआ है।

आरक्षण के भीतर नई सामाजिक बहस

पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब आरक्षण की बहस केवल ‘आरक्षण बनाम आरक्षण विरोध’ तक सीमित नहीं रह गई है। बहस का एक नया केंद्र यह बन गया है कि आरक्षण के भीतर भी लाभ का वितरण किस तरह हो।

एक पक्ष का कहना है कि आरक्षण सामाजिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक वंचना को दूर करने का संवैधानिक साधन है और इसमें किसी प्रकार का वर्गीकरण दलित एवं आदिवासी समाज को कमजोर कर सकता है।

दूसरा पक्ष मानता है कि यदि आरक्षण का लाभ एक ही वर्ग या कुछ समुदायों तक सीमित हो जाता है और सबसे वंचित समुदाय लगातार पीछे रह जाते हैं, तो आरक्षण के भीतर भी न्यायपूर्ण वितरण की व्यवस्था जरूरी है।

असली सवाल- आरक्षण का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचे?

क्रीमी लेयर और सब-कोटा की पूरी बहस का केंद्र आखिरकार एक ही सवाल पर आकर टिकता है—आरक्षण का लाभ उस व्यक्ति तक कैसे पहुंचे जो आज भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से सबसे पीछे है?

किरोड़ी लाल मीणा का पहाड़ खोदकर मजदूरी करने वाले व्यक्ति का उदाहरण हो, जीतन राम मांझी द्वारा मुसहर और भुइयां समुदायों की स्थिति का उल्लेख हो या ओपी राजभर की अति-पिछड़ों को अलग हिस्सेदारी देने की मांग—सभी तर्क आरक्षण के लाभ के असमान वितरण की ओर संकेत करते हैं।

दूसरी ओर चिराग पासवान जैसे नेता चेतावनी देते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति के भीतर किसी भी प्रकार का विभाजन सामाजिक एकजुटता और संवैधानिक उद्देश्य को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए आने वाले समय में आरक्षण की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं होगा कि आरक्षण कितना है, बल्कि यह भी होगा कि उस आरक्षण का लाभ किसे और कितनी बार मिल रहा है।

आरक्षण में क्रीमी लेयर और सब-कैटेगरी की बहस सामाजिक न्याय, समान अवसर और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के तीनों पहलुओं से जुड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राज्यों के लिए एससी वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण की संवैधानिक गुंजाइश स्पष्ट की है, लेकिन इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को लेकर बहस अभी जारी है।

एक तरफ आरक्षण प्राप्त वर्गों की एकता बनाए रखने की चिंता है, तो दूसरी तरफ उन समुदायों को वास्तविक हिस्सेदारी दिलाने का सवाल है जो लंबे समय से आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद पीछे रह गए हैं। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकारें, राजनीतिक दल और समाज इस संवेदनशील विषय पर किस तरह संतुलित रास्ता निकालते हैं।

नोट: इस समाचार में नेताओं के विचार और राजनीतिक विश्लेषण उनके सार्वजनिक बयानों/दावों के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं। आरक्षण से जुड़े संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों में समय-समय पर बदलाव संभव है।

यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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