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भारत

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण की अनुमति देने वाले फैसले पर पुनर्विचार करने से इनकार किया

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जातियों (एससी) का उप-वर्गीकरण एससी श्रेणियों के भीतर अधिक पिछड़े लोगों के लिए अलग कोटा देने के लिए अनुमेय है।

1 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की 7-जजों की संविधान पीठ ने 6:1 बहुमत से कहा कि राज्य एससी श्रेणियों के बीच अधिक पिछड़े लोगों की पहचान कर सकते हैं। कोटा के भीतर अलग कोटा देने के लिए उन्हें उप-वर्गीकृत कर सकते हैं (पंजाब राज्य और अन्य बनाम दविंदर सिंह)।

इसके बाद फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। कोर्ट ने यह कहते हुए फैसले की पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया कि इसमें कोई त्रुटि नहीं है।

पीठ द्वारा चैंबर में पारित आदेश में कहा गया

“पुनर्विचार याचिकाओं का अवलोकन करने के पश्चात अभिलेखों में कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती। सुप्रीम कोर्ट नियम 2013 के आदेश XLVII नियम 1 के अंतर्गत पुनर्विचार के लिए कोई मामला स्थापित नहीं हुआ है। इसलिए पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज किया जाता है।”

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह फैसला सुनाया।

जस्टिस बेला त्रिवेदी ने अपनी एकमात्र असहमति में कहा कि अनुसूचित जातियों को उप-वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।

बहुमत में छह जजों में से चार ने अनुसूचित जातियों से “क्रीमी लेयर” को बाहर करने की आवश्यकता के बारे में विस्तृत टिप्पणियां कीं और कहा कि सरकार को उनकी पहचान करने के लिए कदम उठाने चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उप-वर्गीकरण की अनुमति देते समय, राज्य किसी उप-वर्ग के लिए 100% आरक्षण निर्धारित नहीं कर सकता। साथ ही, राज्य को उप-वर्ग के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के संबंध में अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर उप-वर्गीकरण को उचित ठहराना होगा।

7 जजों की संविधान पीठ मुख्य रूप से दो पहलुओं पर विचार कर रही थी: (1) क्या आरक्षित जातियों के साथ उप-वर्गीकरण की अनुमति दी जानी चाहिए, और (2) ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (2005) 1 एससीसी 394 में दिए गए निर्णय की सत्यता, जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद 341 के तहत अधिसूचित ‘अनुसूचित जातियां’ (एससी) एक समरूप समूह बनाती हैं। उन्हें आगे उप-वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।

सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस बी.आर. गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले की तीन दिनों तक सुनवाई करने के बाद इस साल 8 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इस मुद्दे के संदर्भ में क्या कारण था?

वर्ष 2020 में पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामले में 5 जजों की पीठ द्वारा 7 जजों की पीठ को यह मामला भेजा गया था। 5 जजों की पीठ ने पाया कि ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (2005) 1 एससीसी 394 में समन्वय पीठ के फैसले, जिसमें कहा गया कि उप-वर्गीकरण अनुमेय नहीं था, पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। संदर्भित पीठ ने तर्क दिया कि ‘ई.वी. चिन्नैया’ ने इंदिरा साहनी बनाम यूओआई के फैसले को सही ढंग से लागू नहीं किया।

यह संदर्भ पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवाओं में आरक्षण) अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) की वैधता से संबंधित मामले में हुआ था। प्रावधान में यह निर्धारित किया गया कि अनुसूचित जातियों के लिए सीधी भर्ती में आरक्षित कोटे की पचास प्रतिशत रिक्तियां अनुसूचित जातियों के उम्मीदवारों में से पहली वरीयता प्रदान करके, उनकी उपलब्धता के अधीन, बाल्मीकि और मजहबी सिखों को दी जाएंगी।

2010 में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की खंडपीठ ने ई.वी. चिन्नैया मामले में जज एन. संतोष हेगड़े, एस.एन. वरियावा, बी.पी. सिंह, एच.के. सेमा, एस.बी. सिन्हा की पीठ ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 341(1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश में सभी जातियां एक ही वर्ग की हैं। उन्हें आगे विभाजित नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 341(1) के तहत भारत के राष्ट्रपति किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में कुछ समूहों को आधिकारिक तौर पर अनुसूचित जाति के रूप में नामित कर सकते हैं।

राज्यों के लिए अनुसूचित जातियों का उक्त नामकरण राज्यपाल के परामर्श से किया जाना चाहिए और फिर सार्वजनिक रूप से अधिसूचित किया जाना चाहिए। यह नामकरण जातियों, नस्लों, जनजातियों या उनके उप-समूहों की श्रेणियों के बीच किया जा सकता है। इसमें आगे कहा गया कि संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 41 (राज्य लोक सेवाएं; राज्य लोक सेवा आयोग) या सूची III की प्रविष्टि 25 (शिक्षा) से संबंधित कोई भी कानून संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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