NTN REPORT// वॉशिंगटन। अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को हुए मध्यावधि चुनाव (मिडटर्म इलेक्शन) के नतीजों ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को चुनाव में करारा झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों सीनेट और प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लिया है। इस अप्रत्याशित राजनीतिक उलटफेर ने ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब राष्ट्रपति को अपने कार्यकाल के शेष दो वर्षों में कई महत्वपूर्ण फैसलों के लिए विपक्ष का सामना करना पड़ेगा।

चुनाव परिणामों को ट्रंप की नीतियों के प्रति जनता की नाराजगी और उनके नेतृत्व की लोकप्रियता की बड़ी परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। महंगाई, ईरान के साथ युद्ध, व्यापार शुल्क (टैरिफ) और प्रशासनिक फैसलों को लेकर मतदाताओं की नाराजगी ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित किया।
सीनेट में डेमोक्रेट्स ने सात सीटें छीनकर बदला सत्ता का समीकरण
अमेरिकी संसद के 100 सदस्यीय उच्च सदन सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बहुमत हासिल किया है। चुनाव में डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन पार्टी के कब्जे वाली सात महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज की। इनमें टेक्सास, आयोवा, कंसास, ओहायो, मेन, नॉर्थ कैरोलिना और साउथ कैरोलिना जैसे राज्य शामिल हैं।
प्राप्त चुनावी आंकड़ों के अनुसार, सीनेट में डेमोक्रेटिक खेमे की ताकत 54 सीटों तक पहुंच गई, जबकि रिपब्लिकन पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई। डेमोक्रेट्स के साथ मतदान करने वाले दो निर्दलीय सदस्यों को भी इस संख्या में शामिल किया गया है।
सीनेट की कुल 100 सीटों में से इस चुनाव में 35 सीटों पर मतदान हुआ था। इन नतीजों ने अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन पार्टी के लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक प्रभाव को बड़ा झटका दिया है।
प्रतिनिधि सभा में भी डेमोक्रेट्स का दबदबा, बहुमत का आंकड़ा पार
अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी डेमोक्रेटिक पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया है।
प्राप्त शुरुआती नतीजों के अनुसार, 435 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स ने 228 सीटें जीतकर बहुमत के लिए जरूरी 218 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया। वहीं रिपब्लिकन पार्टी के खाते में 139 सीटें आईं। खबर लिखे जाने तक कई सीटों के परिणाम घोषित होना बाकी थे।
दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप प्रशासन के सामने अब विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने की बड़ी चुनौती होगी।
टेक्सास में ऐतिहासिक उलटफेर, दशकों बाद डेमोक्रेट्स की वापसी
अमेरिका के पारंपरिक रिपब्लिकन गढ़ माने जाने वाले टेक्सास में इस बार चुनावी नतीजों ने सभी को चौंका दिया। यहां डेमोक्रेटिक पार्टी ने बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल की।
डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जेम्स टालारिको ने सीनेट चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन को पराजित किया। इस जीत के साथ 1988 के बाद पहली बार टेक्सास से किसी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार ने अमेरिकी सीनेट का चुनाव जीता।
वहीं गवर्नर चुनाव में जीना हिनोजोसा की जीत को भी राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। उनकी जीत के साथ टेक्सास को पहली लैटिना महिला गवर्नर मिलने का रास्ता साफ हुआ।
कंसास में 94 साल बाद डेमोक्रेटिक सीनेटर की वापसी
कंसास में भी इस बार ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव देखने को मिला। रिपब्लिकन पार्टी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले इस राज्य में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार और पादरी एडम हैमिल्टन ने रिपब्लिकन सीनेटर रोजर मार्शल को हराकर जीत दर्ज की।
इस जीत के साथ 1932 के बाद पहली बार कंसास से डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार अमेरिकी सीनेट के लिए निर्वाचित हुआ। लगभग 94 वर्षों बाद मिली इस सफलता को राज्य की राजनीति में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
चुनाव प्रचार के दौरान महंगाई, ईरान युद्ध, टैरिफ नीतियों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे।
अमेरिका को मिला पहला मुस्लिम सीनेटर
मिशिगन से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल एल-सय्यद ने सीनेट चुनाव में जीत दर्ज कर अमेरिकी राजनीति में नया इतिहास रचा।
42 वर्षीय एल-सय्यद ने रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स को हराया। उनकी जीत को अमेरिकी सीनेट में मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधित्व की दृष्टि से ऐतिहासिक माना जा रहा है।
मिस्र के अप्रवासी परिवार में जन्मे एल-सय्यद सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं, आम परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार और राजनीति में बड़ी कंपनियों के प्रभाव को कम करने जैसे मुद्दों पर जोर दिया।
क्रिस पप्पास की जीत, अमेरिकी सीनेट में LGBTQ+ समुदाय का ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व
न्यू हैम्पशायर से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार क्रिस पप्पास ने रिपब्लिकन उम्मीदवार और पूर्व सीनेटर जॉन ई. सुनुनू को हराकर जीत दर्ज की।
इस जीत के साथ पप्पास अमेरिकी सीनेट के लिए निर्वाचित होने वाले पहले खुले तौर पर समलैंगिक पुरुष बन गए हैं। इससे पहले वह तीन बार अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सदस्य रह चुके हैं।
उनकी जीत को अमेरिकी राजनीति में LGBTQ+ समुदाय के प्रतिनिधित्व की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिका को मिली पहली अश्वेत महिला गवर्नर
जॉर्जिया में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कीशा लांस बॉटम्स की जीत ने भी अमेरिकी राजनीति में नया इतिहास रच दिया है।
उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार और कारोबारी रिक जैक्सन को हराकर राज्य की पहली महिला गवर्नर बनने का गौरव हासिल किया। इसके साथ ही वह अमेरिका में किसी राज्य की गवर्नर बनने वाली पहली अश्वेत महिला बन गई हैं।
इससे पहले वह 2018 से 2022 तक अटलांटा की मेयर रह चुकी हैं। उनके चुनाव प्रचार में महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और आम परिवारों को आर्थिक राहत देने जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
ट्रंप बोले- मेरी वजह से नहीं हारी रिपब्लिकन पार्टी
चुनाव में मिली करारी हार के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक विफलता मानने से इनकार कर दिया है।
एक लाइव फोन इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि वह चुनाव परिणामों को अपने खिलाफ जनादेश के रूप में नहीं देखते। उन्होंने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के पिछले दो वर्षों को अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाज के लिहाज से ऐतिहासिक रूप से सफल बताया।
हालांकि, ट्रंप ने स्वीकार किया कि ईरान के साथ युद्ध का भी रिपब्लिकन पार्टी की हार में योगदान रहा है। उन्होंने पार्टी के उम्मीदवारों पर मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने में असफल रहने का आरोप लगाया।
ट्रंप का कहना था कि यदि वह स्वयं चुनाव मैदान में होते तो बड़ी संख्या में मतदाता मतदान करने पहुंचते। उनके इस बयान को हार के बाद पार्टी के भीतर जिम्मेदारी तय करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
आखिर किन वजहों से ट्रंप की पार्टी को मिली करारी हार?
चुनाव परिणामों के पीछे कई राजनीतिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय कारण माने जा रहे हैं। मतदाताओं ने इस बार सरकार की नीतियों और रोजमर्रा की समस्याओं को अधिक महत्व दिया।
1. महंगाई और बढ़ती कीमतें: अमेरिका में जीवनयापन की बढ़ती लागत और रोजमर्रा की वस्तुओं की महंगाई ने आम परिवारों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बनाया। इससे सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी।
2. ईरान के साथ युद्ध: ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष और युद्ध पर होने वाले भारी खर्च को लेकर अमेरिकी नागरिकों के बीच असंतोष देखने को मिला।
3. टैरिफ नीतियों का प्रभाव: ट्रंप प्रशासन की व्यापार शुल्क संबंधी नीतियों को लेकर व्यापारिक क्षेत्रों और आम उपभोक्ताओं में चिंता बढ़ी। इन नीतियों का असर अर्थव्यवस्था और वस्तुओं की कीमतों पर पड़ने का मुद्दा चुनाव में प्रमुख रहा।
4. प्रशासनिक फैसलों पर सवाल: सरकार के कामकाज, प्रशासनिक निर्णयों और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों ने भी रिपब्लिकन पार्टी की छवि को प्रभावित किया।
5. युवाओं और मध्यमवर्ग की नाराजगी: युवा और मध्यमवर्गीय मतदाताओं के बीच आर्थिक समस्याओं तथा सरकारी नीतियों को लेकर असंतोष चुनाव परिणामों में दिखाई दिया।
ट्रंप प्रशासन के सामने अब बढ़ेंगी राजनीतिक चुनौतियां
कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए आगामी दो वर्षों का कार्यकाल पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
डेमोक्रेटिक पार्टी अब सरकार के विधायी प्रस्तावों को रोकने, प्रशासनिक नीतियों पर सवाल उठाने और विभिन्न सरकारी विभागों के कामकाज की जांच कराने की मजबूत स्थिति में होगी।
इसके अलावा महत्वपूर्ण नियुक्तियों और सरकारी खर्च से जुड़े मामलों में भी ट्रंप प्रशासन को विपक्ष की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
सरकार के कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए ट्रंप को डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ बातचीत और राजनीतिक समझौते का रास्ता अपनाना पड़ सकता है।
हालांकि, राष्ट्रपति के पास विधेयकों को वीटो करने का संवैधानिक अधिकार बना रहेगा। ट्रंप ने विपक्ष को जीत की बधाई देते हुए कुछ मुद्दों पर मिलकर काम करने की इच्छा जताई है, लेकिन अपनी नीतियों से समझौता नहीं करने के संकेत भी दिए हैं।
भारत के लिए क्या मायने रखते हैं अमेरिकी चुनाव के नतीजे?
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत का प्रभाव केवल अमेरिका की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रह सकता। इसके भारत-अमेरिका संबंधों, व्यापार, वीजा और रणनीतिक सहयोग पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है।
एच-1बी वीजा पर मिल सकती है राहत: ट्रंप प्रशासन की ओर से एच-1बी वीजा पर लगाए गए एक लाख डॉलर शुल्क और सख्त नियमों को लेकर डेमोक्रेटिक सांसद विरोध कर सकते हैं। इससे भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी तकनीकी कंपनियों को राहत मिलने की संभावना बन सकती है।
भारतीय सामान पर टैरिफ का मुद्दा उठेगा: भारत से अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले सामान पर लगाए गए शुल्क को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी सवाल उठा सकती है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत में नए समीकरण बन सकते हैं।
रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर दबाव: भारत की रूस से तेल खरीद नीति को लेकर अमेरिकी दबाव में बदलाव की संभावना पर भी नजर रहेगी। हालांकि, इस संबंध में तत्काल किसी बड़े नीतिगत बदलाव का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।
रक्षा सहयोग पर ज्यादा असर की संभावना नहीं: भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग लंबे समय से दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इसलिए अमेरिकी संसद में सत्ता परिवर्तन के बावजूद इन क्षेत्रों में सहयोग जारी रहने की संभावना है।
हालांकि, यह स्पष्ट है कि अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत से भारत के लिए कुछ नीतिगत मुद्दों पर बातचीत के नए अवसर पैदा हो सकते हैं, लेकिन तत्काल राहत की गारंटी नहीं है।
जनवरी 2029 तक राष्ट्रपति रहेंगे ट्रंप, लेकिन फैसलों में बढ़ेगी विपक्ष की भूमिका
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है। ऐसे में मिडटर्म चुनाव के नतीजों से राष्ट्रपति पद में तत्काल कोई बदलाव नहीं होगा, लेकिन संसद में बदले राजनीतिक समीकरण उनके शेष कार्यकाल को प्रभावित करेंगे।
डेमोक्रेटिक पार्टी के दोनों सदनों में बहुमत के साथ अब अमेरिकी राजनीति में सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ने की संभावना है। ट्रंप को अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पहले से अधिक रणनीतिक और समझौतापरक रवैया अपनाना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के परिणामों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में भी महंगाई, युद्ध, व्यापार और आम नागरिकों की आर्थिक समस्याएं सत्ता की राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं। ट्रंप के लिए यह परिणाम केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि शेष राष्ट्रपति कार्यकाल की राजनीतिक दिशा तय करने वाली बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
NTN REPORT | सच्ची खबर आप तक