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संपादकीय

हवस की वो कैसी आग रही होगी कि… एक 13 साल की बच्ची से जबरदस्ती करने वाले उन 30 से 32 पापियों को उसकी गिड़गिड़ाहट भी नहीं सुनाई दी! , जब एक मासूम की चीख समाज तक नहीं पहुंचती… तब हम सब कहीं न कहीं जिम्मेदार होते हैं!

बेटियों की सुरक्षा केवल कानून की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जागरूकता, सतर्कता और संवेदनशीलता ही ऐसे अपराधों को रोकने का सबसे बड़ा हथियार है।

NTN REPORT// एक 13 साल की बच्ची से 5 दिनों तक 30 लोगों ने रेप किया ! प्राप्त जानकारी अनुसार राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक रिक्शा चालक ने 13 साल की बच्ची को घर छोड़ने के बहाने एक होटल वाले को बेच दिया….! इस होटल वाले ने उसे कुछ ग्राहकों को बेचा!… फिर ऐसा करते करते कुल तीन होटलों में 5 दिनों तक उसे कुल 30 से 32 लोगों को बेचा गया.. ! अचानक पुलिस रेड में जब वो मिली तो बदहवाश थी!… 30 से 32 लोगों ने एक 13 साल की मासूम के साथ रेप किया!… सोचो वो कितना गिड़गिड़ाई होगी… रोई होगी… एक के बाद एक अलग अलग होटलों में उसे जबरदस्ती डरा धमका कर ले जाया गया होगा… सिर्फ चंद पैसों के लिए….! हवस की वो कैसी आग रही होगी कि… एक 13 साल की बच्ची से जबरदस्ती करने वालों को उसकी गिड़गिड़ाहट भी नहीं सुनाई दी होगी…. इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली यह घटना अब तक की सबसे शर्मनाक घटनाओं में यह घटना दर्ज हो चुकी है !

प्रतीकात्मक तस्वीर

हर बार जब किसी मासूम बच्ची के साथ अमानवीय घटना की खबर सामने आती है, तो कुछ दिन तक समाज आक्रोश व्यक्त करता है, दोषियों को कठोर सजा देने की मांग करता है और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वहीं रह जाता है—क्या हमारी बेटियां वास्तव में सुरक्षित हैं?

एक बच्ची केवल अपने परिवार की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। जिस समाज में लोग किसी अनजान बच्ची को असहाय देखकर भी आंखें फेर लेते हैं, जहां संदिग्ध गतिविधियों को देखकर भी कोई पुलिस या प्रशासन को सूचना नहीं देता, वहां अपराधियों का हौसला बढ़ना स्वाभाविक हो जाता है।

आज आवश्यकता केवल कानून को और कठोर बनाने की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को मजबूत करने की भी है। बच्चों को यह सिखाना होगा कि किसी भी अनजान व्यक्ति पर आंख बंद करके भरोसा न करें। माता-पिता को भी अपने बच्चों से खुलकर संवाद करना चाहिए, ताकि वे किसी भी परेशानी या खतरे की स्थिति में बिना डरे अपनी बात कह सकें।

स्कूल, छात्रावास, धार्मिक संस्थान, सामाजिक संगठन और सार्वजनिक स्थान—हर जगह बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। किसी भी संस्था की प्रतिष्ठा, किसी मासूम की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती। यदि कहीं भी बच्चों के साथ दुर्व्यवहार, शोषण या संदिग्ध गतिविधि की जानकारी मिले, तो उसे छिपाने के बजाय तत्काल संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना ही सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी है।

यह भी उतना ही आवश्यक है कि अपराध करने वालों के साथ-साथ ऐसे लोगों पर भी कानूनी कार्रवाई हो, जो किसी भी कारण से ऐसे अपराधों को छिपाने, अपराधियों को संरक्षण देने या पीड़ित परिवार पर समझौते का दबाव बनाने का प्रयास करते हैं। अपराध पर मौन रहना भी कहीं न कहीं अपराध को बढ़ावा देना है।

समाज तभी सुरक्षित बनेगा, जब हर नागरिक यह संकल्प ले कि किसी भी बच्चे के साथ अन्याय होते देख वह मूकदर्शक नहीं बनेगा। जागरूक नागरिक, संवेदनशील परिवार, जिम्मेदार संस्थाएं और त्वरित कानून व्यवस्था—इन्हीं चार स्तंभों पर बच्चों की सुरक्षा का भविष्य टिका है।

आइए संकल्प लें कि हम अपनी बेटियों को केवल सपने देखने की आजादी ही नहीं, बल्कि सुरक्षित बचपन और निर्भय भविष्य भी देंगे। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि उसके बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा से होती है।

“बेटियों की सुरक्षा किसी एक परिवार का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है। यदि हम आज जागरूक नहीं हुए, तो कल बहुत देर हो सकती है।”

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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