भारत में क्यों बिक रहा 112 देशों में प्रतिबंधित कीटनाशक? मोनोक्रोटोफॉस पर उठे गंभीर सवाल!
एग्रो-केमिकल उद्योग, सरकारी नीतियों और किसानों की सुरक्षा के बीच फंसा मोनोक्रोटोफॉस का विवाद
NTN REPORT// नई दिल्ली। भारत में एक बार फिर खतरनाक कीटनाशकों को लेकर बहस तेज हो गई है। मोनोक्रोटोफॉस नामक कीटनाशक को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब दुनिया के 112 देश इसे प्रतिबंधित कर चुके हैं, तो भारत में इसके इस्तेमाल और बिक्री को लेकर विवाद क्यों बना हुआ है।

मोनोक्रोटोफॉस को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अत्यधिक खतरनाक श्रेणी में रखा है। आरोप है कि सख्त प्रतिबंधों के बावजूद यह अलग-अलग रास्तों से भारतीय कृषि बाजार तक पहुंच रहा है।
नर्व गैस तकनीक से खेतों तक पहुंचा जहरीला रसायन
मोनोक्रोटोफॉस का इतिहास द्वितीय विश्व युद्ध के दौर से जुड़ा बताया जाता है। उस समय वैज्ञानिकों ने इंसानों के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाली नर्व गैस पर शोध किया था। बाद में इसी तकनीक का इस्तेमाल कृषि कीटनाशक बनाने में किया गया।
1965 में स्विट्जरलैंड की कंपनी सिबा एजी और अमेरिकी कंपनी शेल केमिकल ने मिलकर मोनोक्रोटोफॉस विकसित किया। इसे बाद में ‘अजोड्रिन’ और ‘नुवाक्रॉन’ जैसे नामों से बाजार में उतारा गया।
यह एक सिस्टमेटिक कीटनाशक है, जिसे पौधे अपने अंदर सोख लेते हैं और फसल खाने वाले कीड़ों पर असर डालता है।
हरित क्रांति के दौर में भारत में बढ़ा इस्तेमाल
1970 और 1980 के दशक में जब भारत में कृषि उत्पादन बढ़ाने पर जोर था, तब मोनोक्रोटोफॉस जैसे रसायनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू हुआ।
भारत में भी इसके उत्पादन की तकनीक विकसित हुई और कई कंपनियों ने इसे बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह किसानों के बीच सस्ता और तेजी से असर करने वाले कीटनाशक के रूप में लोकप्रिय हो गया।
इंसानों और पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक
WHO ने मोनोक्रोटोफॉस को Class Ib यानी अत्यधिक खतरनाक श्रेणी में रखा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह ऑर्गेनोफॉस्फेट रसायन शरीर के नर्वस सिस्टम पर सीधा असर करता है। इसके संपर्क में आने पर सांस लेने में परेशानी, तंत्रिका तंत्र पर असर और गंभीर स्थिति में मौत तक हो सकती है।
इसके अलावा यह मधुमक्खियों, पक्षियों और अन्य मित्र कीटों के लिए भी बेहद नुकसानदायक माना जाता है।
छपरा मिड-डे मील हादसे ने हिला दिया था देश
16 जुलाई 2013 को बिहार के सारण जिले के गंडामन गांव में सरकारी स्कूल के मिड-डे मील खाने के बाद 23 बच्चों की मौत हो गई थी।
जांच में सामने आया कि खाना पकाने वाला तेल गलती से मोनोक्रोटोफॉस के खाली डिब्बे में रखा गया था। जहरीले रसायन के संपर्क से बच्चों की जान चली गई।
यवतमाल में किसानों की मौत का मामला
2017 में महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कपास किसानों ने फसलों पर कीटनाशक का छिड़काव किया। आरोप है कि बिना सुरक्षा उपकरणों के लगातार संपर्क में आने से कई किसान प्रभावित हुए।
इस घटना में कई किसानों और खेत मजदूरों की मौत हुई, जबकि बड़ी संख्या में लोग अस्पताल पहुंचे।
पर्यावरण पर भी पड़ा असर
मोनोक्रोटोफॉस के इस्तेमाल से पक्षियों को नुकसान पहुंचने की कई घटनाएं सामने आई हैं। अर्जेंटीना में इसके छिड़काव के बाद हजारों प्रवासी पक्षियों की मौत का मामला भी चर्चा में रहा।
प्रतिबंध के बावजूद उठे सवाल
भारत में सब्जियों पर मोनोक्रोटोफॉस के इस्तेमाल को लंबे समय से गैर-कानूनी बताया गया है। इसके उपयोग को कुछ सीमित फसलों तक ही मंजूरी दी गई थी।
लेकिन ग्रामीण बाजारों में इसकी उपलब्धता और कम कीमत के कारण इसके गलत इस्तेमाल की शिकायतें सामने आती रही हैं।
सरकार के फैसलों पर विवाद
2020 में कृषि मंत्रालय ने मोनोक्रोटोफॉस समेत 27 खतरनाक कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा था।
इसके बाद उद्योग जगत की आपत्तियों के बाद समीक्षा प्रक्रिया शुरू हुई। बाद में कई कीटनाशकों को प्रतिबंध सूची से बाहर कर दिया गया।
आलोचकों का आरोप है कि बार-बार कमेटियों के गठन और समीक्षा के नाम पर सख्त कार्रवाई टलती रही।
अक्टूबर 2024 में प्रतिबंध, फिर भी जारी बहस
बाद में मोनोक्रोटोफॉस पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन सवाल यह है कि इसके अन्य फॉर्मूलेशन और उत्पादन को लेकर स्थिति कितनी स्पष्ट है।
आरोप है कि प्रतिबंध के बावजूद कुछ रास्तों से इसका उत्पादन या बिक्री जारी रह सकती है।
संसद में भी उठा मामला
20 मार्च 2026 को राज्यसभा में मोनोक्रोटोफॉस को लेकर सवाल उठाया गया।
सरकार ने बताया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए गए हैं कि प्रतिबंध के बाद इसका नया निर्माण न हो और कंपनियां अपने पंजीकरण प्रमाण पत्र वापस करें।
सरकार ने यह भी कहा कि प्रतिबंधित कीटनाशकों की निगरानी के लिए देश में हजारों निरीक्षक तैनात हैं और कानून के तहत अवैध निर्माण व बिक्री अपराध है।
बड़ा सवाल: किसान की सुरक्षा या सस्ता विकल्प?
मोनोक्रोटोफॉस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सस्ते कृषि विकल्पों के नाम पर किसानों और उपभोक्ताओं की सेहत से समझौता किया जा सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित और किफायती विकल्प विकसित करना ही लंबे समय का समाधान हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।