सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई पूरी, 9 जजों की संविधान पीठ ने फैसला रखा सुरक्षित
NTN REPORT// नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से चल रहे बहुचर्चित सबरीमाला मामले की सुनवाई गुरुवार को पूरी हो गई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने 16 दिनों तक चली विस्तृत बहस के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।

यह सुनवाई केवल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके जरिए धर्म, संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और न्यायिक हस्तक्षेप जैसे कई बड़े संवैधानिक प्रश्नों पर बहस हुई।
16 दिनों तक चली सुनवाई
संविधान पीठ ने पांच जजों की पूर्व पीठ के फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई की। इस दौरान अदालत ने विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनीं और धार्मिक प्रथाओं तथा मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर गंभीर विचार-विमर्श किया।
सुनवाई पूरी होने के बाद पीठ ने कहा कि वह मामले में उठाए गए संवैधानिक और विधिक प्रश्नों पर विस्तार से निर्णय देगी।
किन संवैधानिक सवालों पर होगा फैसला
संविधान पीठ इस मामले में कई महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक बिंदुओं पर निर्णय सुनाएगी। इनमें प्रमुख रूप से निम्न प्रश्न शामिल हैं—
1. समीक्षा याचिका में संदर्भित करने की शक्ति
क्या न्यायालय के पास समीक्षा याचिका की सुनवाई के दौरान किसी विधिक प्रश्न को बड़ी संविधान पीठ के समक्ष भेजने की शक्ति है?
2. धार्मिक प्रथाओं को चुनौती देने का अधिकार
क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उस संप्रदाय की प्रथाओं को चुनौती दे सकता है?
3. धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा
संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक प्रथाओं के संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा और उसकी सीमाएं क्या होंगी?
4. ‘नैतिकता’ शब्द की संवैधानिक व्याख्या
अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त ‘नैतिकता’ शब्द का अर्थ क्या है और क्या इसमें ‘संवैधानिक नैतिकता’ भी शामिल होगी?
5. धर्म की स्वतंत्रता का दायरा
संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत नागरिकों को प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की सीमा क्या है?
6. व्यक्तिगत अधिकार बनाम धार्मिक संप्रदाय
अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकार और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे तय होगा?
7. क्या धार्मिक अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं?
क्या धार्मिक संप्रदायों को अनुच्छेद 26 के तहत मिले अधिकार केवल सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तक सीमित हैं, या वे संविधान के भाग-3 के अन्य मौलिक अधिकारों के भी अधीन होंगे?
8. “हिंदुओं के वर्ग” का अर्थ
अनुच्छेद 25(2)(b) में प्रयुक्त “हिंदुओं के वर्ग” (Sections of Hindus) अभिव्यक्ति की संवैधानिक व्याख्या क्या होगी?
सात प्रमुख सवालों पर केंद्रित रही बहस
सुनवाई के दौरान अदालत ने सात प्रमुख संवैधानिक प्रश्न तय किए थे। इन सवालों के जरिए अदालत ने यह समझने की कोशिश की कि धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।
बहस का मुख्य केंद्र यह रहा कि क्या अदालत किसी धार्मिक परंपरा में हस्तक्षेप कर सकती है, और यदि कर सकती है तो उसकी संवैधानिक सीमा क्या होगी।
‘धर्म बनाम कानून’ की बड़ी बहस बना मामला
सबरीमाला विवाद अब केवल एक मंदिर या परंपरा तक सीमित नहीं माना जा रहा है। यह मामला देश में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार, संवैधानिक नैतिकता और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर बड़ी बहस का रूप ले चुका है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान पीठ का फैसला भविष्य में कई धार्मिक और सामाजिक मामलों के लिए मिसाल साबित हो सकता है।
क्या है सबरीमाला विवाद
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर यह विवाद वर्षों से चल रहा है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था।
इसके बाद फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिनकी सुनवाई अब 9 जजों की बड़ी संविधान पीठ ने पूरी की है।
फैसले पर पूरे देश की नजर
अब पूरे देश की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि यह निर्णय केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि देश में धार्मिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन तय करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाएगा।
यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।