बंगाल में हार के बाद टीएमसी की पहली बड़ी परीक्षा, धरने में कम मौजूदगी से उठे एकजुटता पर सवाल
कोलकाता में विरोध प्रदर्शन के जरिए वापसी की कोशिश
NTN REPORT// पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में हार के बाद टीएमसी अब विपक्ष की भूमिका में खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रही है. लेकिन पार्टी की यह कोशिश फिलहाल कमजोर पड़ती नजर आ रही है. बुधवार को विधानसभा परिसर में आयोजित टीएमसी के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में विधायकों की कम मौजूदगी ने पार्टी की एकजुटता और संगठनात्मक स्थिति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

विधानसभा परिसर में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के पास टीएमसी विधायकों ने चुनाव बाद हिंसा और हॉकरों के खिलाफ चलाए जा रहे अतिक्रमण विरोधी अभियान के विरोध में धरना प्रदर्शन किया. हालांकि, पार्टी के 80 विधायकों में से केवल 35 विधायक ही इस कार्यक्रम में शामिल हुए. इतनी कम उपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में अंदरूनी असंतोष और खींचतान की चर्चाओं को तेज कर दिया है.
कालीघाट बैठक में नेताओं ने जताई थी चिंता
धरने से ठीक एक दिन पहले कोलकाता के कालीघाट में टीएमसी नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी. सूत्रों के मुताबिक बैठक में कई विधायकों ने साफ कहा कि केवल बंद कमरों में रणनीति बनाने से पार्टी अपनी खोई हुई जमीन वापस नहीं पा सकेगी. नेताओं ने सुझाव दिया कि पार्टी को फिर से सड़क पर उतरकर जनता के बीच सक्रिय होना होगा.
बताया जा रहा है कि बैठक में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी भी मौजूद थे. बैठक के दौरान कई नेताओं ने चुनावी हार के बाद पार्टी नेतृत्व के रवैये पर चिंता जताई और कहा कि टीएमसी पहले की तरह जनता के मुद्दों पर आक्रामक नजर नहीं आ रही है.
कुछ विधायकों ने यह भी कहा कि टीएमसी की पहचान हमेशा जन आंदोलनों और सड़क पर संघर्ष की राजनीति से रही है, इसलिए पार्टी को फिर उसी आंदोलनकारी शैली में लौटना होगा.
आंदोलन की राजनीति से बनी थी टीएमसी की पहचान
टीएमसी का राजनीतिक इतिहास लंबे जन आंदोलनों से जुड़ा रहा है. सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों से लेकर वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ सड़क संघर्ष तक, पार्टी ने अपनी राजनीतिक ताकत जनता के बीच सक्रिय रहकर ही बनाई थी.
इसी वजह से सत्ता से बाहर होने के बाद आयोजित इस पहले बड़े धरना प्रदर्शन को बेहद अहम माना जा रहा था. लेकिन कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विधायकों की गैरमौजूदगी ने यह संकेत दिया कि पार्टी अभी विपक्ष की भूमिका में पूरी तरह सहज नहीं हो पाई है.
धरने में शामिल रहे ये प्रमुख चेहरे
धरने में शामिल प्रमुख नेताओं में सोवांदेब चट्टोपाध्याय, नयना बंदोपाध्याय, कुनाल घोष और रीताब्रता बनर्जी जैसे नेता मौजूद रहे। टीएमसी ने इस प्रदर्शन के जरिए चुनाव बाद हिंसा, बुलडोजर कार्रवाई और हॉकरों को हटाने के अभियान को मुख्य मुद्दा बनाया. पार्टी का आरोप है कि नई सरकार के आने के बाद विपक्षी कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर दबाव बनाया जा रहा है और गरीबों के रोजगार को प्रभावित करने वाली कार्रवाई की जा रही है.
सोवांदेब चट्टोपाध्याय ने किया मतभेद से इनकार
टीएमसी विधायक दल के वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष पद के संभावित दावेदार माने जा रहे सोवांदेब चट्टोपाध्याय ने पार्टी के भीतर किसी तरह के मतभेद से इनकार किया है.
उन्होंने कहा कि कई विधायक चुनाव बाद हिंसा प्रभावित इलाकों में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त थे, इसलिए वे कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके. उन्होंने यह भी कहा कि धरने का कार्यक्रम केवल एक दिन के नोटिस पर तय किया गया था, जिसके कारण दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले विधायकों के लिए समय पर पहुंचना मुश्किल रहा.
सोवांदेब चट्टोपाध्याय ने कहा, “करीब 35 विधायक आज के कार्यक्रम में मौजूद थे. कई विधायक चुनाव बाद हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ काम कर रहे हैं. कार्यक्रम एक दिन के नोटिस पर रखा गया था, इसलिए दूर के क्षेत्रों से आने वाले विधायकों के लिए पहुंचना कठिन था.”
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में बड़ा संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मामला केवल विधायकों की संख्या का नहीं, बल्कि उससे निकलने वाले राजनीतिक संदेश का भी है. लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली किसी भी पार्टी के लिए विपक्ष की भूमिका में खुद को ढालना आसान नहीं होता.
विशेषज्ञों के अनुसार टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक आत्मविश्वास को दोबारा मजबूत करना है. चुनावी हार के बाद कार्यकर्ताओं और नेताओं का मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक माना जाता है. ऐसे समय में नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है कि वह संगठन को एकजुट रखे और जमीनी स्तर पर संघर्ष का माहौल बनाए.
लेकिन यदि पार्टी के भीतर ही यह धारणा बनने लगे कि नेतृत्व जनता के मुद्दों पर पर्याप्त आक्रामक नहीं है, तो इससे संगठनात्मक कमजोरी और बढ़ सकती है.
विपक्ष की भूमिका में खुद को साबित करने की चुनौती
सूत्रों के मुताबिक कालीघाट बैठक में कई नेताओं ने यह राय रखी कि केवल राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर पार्टी को आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभानी होगी. नेताओं का मानना था कि जनता के बीच लगातार सक्रियता बढ़ाए बिना पार्टी की वापसी मुश्किल होगी.
बुधवार का प्रदर्शन इसलिए भी प्रतीकात्मक रूप से अहम माना गया क्योंकि यह सत्ता से बाहर होने के बाद टीएमसी की पहली संगठित सड़क कार्रवाई थी. हालांकि कम उपस्थिति ने विपक्ष के तौर पर पार्टी की तैयारी और आंतरिक स्थिति को लेकर चर्चाओं को और तेज कर दिया है.
अब आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि टीएमसी खुद को एक संघर्षशील विपक्षी दल के रूप में कितनी तेजी से स्थापित कर पाती है और क्या वह अपनी पुरानी आंदोलनकारी शैली में वापसी कर पाएगी या नहीं.
डिस्क्लेमर: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।