नाबालिग रेप पीड़िता के गर्भपात पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अंतिम निर्णय माता-पिता का, डॉक्टर नहीं थोप सकते राय
NTN NEWS REPORT// नई दिल्ली, 1 मई 2026।
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग रेप पीड़िता के गर्भपात से जुड़े एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में अंतिम फैसला पीड़िता और उसके माता-पिता का होगा, न कि डॉक्टरों का। कोर्ट ने कहा कि बच्ची के अधिकार सर्वोपरि हैं और किसी भी महिला या नाबालिग पर अनचाहा गर्भ नहीं थोपा जा सकता।

AIIMS की क्यूरेटिव याचिका खारिज, काउंसलिंग पर जोर
कोर्ट ने AIIMS द्वारा दाखिल क्यूरेटिव याचिका को खारिज करते हुए निर्देश दिया कि डॉक्टर पीड़िता और उसके माता-पिता को सभी मेडिकल पहलुओं और जोखिमों की जानकारी दें। यदि वे निर्णय से संतुष्ट नहीं होते, तो उन्हें फिर से अदालत आने की छूट होगी।
कोर्ट ने साफ कहा कि AIIMS सरकार का एक अंग है, इसलिए उसे अदालत के आदेशों का पालन करना होगा, न कि स्वतंत्र रूप से निर्णय थोपना।
30 हफ्ते की गर्भावस्था पर डॉक्टरों की चिंता
सुनवाई के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि 30 सप्ताह की गर्भावस्था में गर्भपात अत्यंत जोखिम भरा होता है।
- भ्रूण लगभग पूरी तरह विकसित हो चुका है
- समय से पहले जन्म लेने पर बच्चे में गंभीर विकृतियों की आशंका
- मां के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा
डॉक्टरों ने यह भी कहा कि इस स्थिति में ‘फीटिसाइड’ या बड़ी सर्जरी ही विकल्प बचता है, जो जोखिमपूर्ण है।
CJI की सख्त टिप्पणी: “क्या 15 साल की बच्ची को मां बनने के लिए मजबूर करेंगे?”
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि:
- यह एक अनचाहा गर्भ है
- हर गुजरता पल बच्ची के लिए मानसिक यातना जैसा है
- क्या हम एक 15 साल की बच्ची को जबरन मां बनने के लिए मजबूर कर सकते हैं?
उन्होंने कहा कि यह मामला “भ्रूण बनाम पीड़िता” का है, जिसमें पीड़िता के अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बच्ची के मानसिक और भविष्य पर असर को प्राथमिकता
कोर्ट ने कहा कि:
- पीड़िता पहले ही गहरे मानसिक आघात से गुजर चुकी है
- गर्भ जारी रखने से उसका पूरा भविष्य प्रभावित हो सकता है
- यह उम्र पढ़ाई और सपनों की है, न कि मातृत्व का बोझ उठाने की
कोर्ट ने यह भी कहा कि देश में पहले से ही लाखों बच्चे अनाथ हैं, इसलिए पीड़िता पर अतिरिक्त बोझ डालना उचित नहीं है।
ASG की दलील और कोर्ट का जवाब
एएसजी ऐश्वर्य भाटी ने तर्क दिया कि अगर 4 सप्ताह और मिल जाएं तो बच्चा पूरी तरह विकसित हो सकता है और उसे गोद दिया जा सकता है।
इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि:
- यह तर्क पीड़िता की पीड़ा को नजरअंदाज करता है
- किसी भी महिला या बच्ची पर अनचाहा गर्भ नहीं थोपा जा सकता
कानून और 24 हफ्ते की सीमा पर टिप्पणी
सुनवाई में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून की 24 सप्ताह की सीमा पर भी चर्चा हुई। कोर्ट ने कहा:
- यह सीमा मेडिकल आधार पर तय है
- लेकिन विशेष परिस्थितियों में अदालत हस्तक्षेप कर सकती है
- बाल दुष्कर्म पीड़िताओं के लिए कानून में विशेष प्रावधान की जरूरत है
कोर्ट का स्पष्ट निर्देश
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
- डॉक्टर केवल इलाज और सलाह देंगे
- अंतिम निर्णय पीड़िता और उसके माता-पिता का होगा
- राज्य या डॉक्टर किसी पर फैसला नहीं थोप सकते
- यदि पीड़िता गर्भपात चाहती है, तो उसे अनुमति दी जानी चाहिए
अंतिम संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि संवेदनशील परिस्थितियों में मानवता, सहानुभूति और पीड़िता के अधिकार सर्वोच्च हैं। अदालत ने यह भी कहा कि बलात्कार जैसे अपराधों के खिलाफ कानून को और सख्त बनाने की जरूरत है, ताकि पीड़िताओं को ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।