
चयन सूची से स्वतः नियुक्ति का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटा
NTN NEWS REPORT// नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी उम्मीदवार को केवल इस आधार पर नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता कि चयनित अभ्यर्थी ने जॉइन नहीं किया या प्री-अपॉइंटमेंट औपचारिकताएं पूरी नहीं कीं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में रिक्त पद को उसी चयन सूची से भरना अनिवार्य नहीं है, बल्कि संबंधित भर्ती नियमों के अनुसार ही आगे की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कर्नाटक सरकार की अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उत्तरदाता को कर्नाटक प्रशासनिक सेवा में असिस्टेंट कमिश्नर पद पर नियुक्ति के लिए विचार करने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट का अहम अवलोकन: चयन सूची ‘वेस्टेड राइट’ नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चयन सूची में नाम आने मात्र से उम्मीदवार को नियुक्ति का स्थायी या वैधानिक अधिकार (वेस्टेड राइट) प्राप्त नहीं हो जाता। चयन सूची केवल यह सुनिश्चित करती है कि अभ्यर्थी को नियमों के तहत नियुक्ति के लिए विचार किया जा सकता है, लेकिन वह नियुक्ति की मांग नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा,
“यदि चयनित उम्मीदवार ने जॉइन नहीं किया, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि नीचे के उम्मीदवार को स्वतः उस पद पर नियुक्ति का अधिकार मिल जाए, जब तक कि संबंधित नियम ऐसा प्रावधान न करें।”
मामला: 2011 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा विवाद
यह विवाद वर्ष 2011 की भर्ती प्रक्रिया से संबंधित है, जिसमें कर्नाटक गजेटेड प्रोबेशनर्स (ग्रुप ‘ए’ और ‘बी’) के 362 पदों के लिए चयन किया गया था। उत्तरदाता, जो एक पूर्व सैनिक हैं, को वर्ष 2022 में असिस्टेंट कमिश्नर (कमर्शियल टैक्स) पद पर नियुक्त किया गया था।
इसी चयन प्रक्रिया में एक अन्य उम्मीदवार को कर्नाटक प्रशासनिक सेवा में असिस्टेंट कमिश्नर पद पर चयनित किया गया था, लेकिन उसने मेडिकल जांच और पुलिस सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं की और पद ग्रहण भी नहीं किया।
इसके बाद उत्तरदाता ने दावा किया कि वह मेरिट सूची में अगला उम्मीदवार है और उसने उस पद के लिए वरीयता भी दी थी, इसलिए उसे उस रिक्त पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार और ट्रिब्यूनल का रुख
राज्य सरकार ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि वर्ष 1997 के भर्ती नियमों में न तो वेटिंग लिस्ट का कोई प्रावधान है और न ही ऐसी रिक्ति को उसी चयन सूची से भरने की अनुमति दी गई है।
कर्नाटक राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने भी राज्य सरकार के निर्णय को सही ठहराया और उत्तरदाता की याचिका को खारिज कर दिया।
हालांकि, कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए उत्तरदाता के पक्ष में फैसला दिया और राज्य सरकार को नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1997 के भर्ती नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे यह माना जाए कि चयनित उम्मीदवार के जॉइन नहीं करने पर अगला उम्मीदवार स्वतः उस पद का हकदार हो जाता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई पद रिक्त रह जाता है, तो उसे नई भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से भरा जाना चाहिए, न कि पुरानी चयन सूची को विस्तारित करके।
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और राज्य सरकार के निर्णय को वैध ठहराया।