
आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी छूट लेने के बावजूद मेरिट से सामान्य सीट पर दावा कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
हाईकोर्ट का फैसला रद्द; कहा– पात्रता में छूट का मतलब मेरिट में छूट नहीं, नियमों में रोक न हो तो ‘ओपन कैटेगरी’ में चयन वैध
NTN NEWS REPORT// नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि आरक्षित वर्ग के वे उम्मीदवार जिन्होंने क्वालिफाइंग परीक्षा में निर्धारित छूट का लाभ उठाया हो, उन्हें सामान्य श्रेणी (ओपन कैटेगरी) की सीटों पर विचार से वंचित नहीं किया जा सकता, यदि वे अंतिम चयन में अधिक मेरिट हासिल करते हैं और भर्ती नियम इसकी अनुमति देते हैं।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ का फैसला रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा था कि जिन अभ्यर्थियों ने पात्रता परीक्षा में छूट का लाभ लिया है, वे सामान्य श्रेणी में समायोजित नहीं हो सकते।
क्या था मामला
विवाद महाराष्ट्र में ‘शिक्षा का अधिकार’ ढांचे के तहत शिक्षक भर्ती से जुड़ा था। भर्ती प्रक्रिया में पहले ‘शिक्षक पात्रता परीक्षा’ (TET) और फिर ‘शिक्षक अभिरुचि एवं बुद्धिमत्ता परीक्षण’ (TAIT) आयोजित किया गया, जिसके आधार पर अंतिम मेरिट सूची तैयार हुई।
- सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए TET में 60% अंक अनिवार्य थे।
- आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को 5% की छूट दी गई थी, यानी वे 55% अंकों के साथ भी पात्र माने गए।
कई आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने TET में छूट का लाभ लिया, लेकिन TAIT में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए सामान्य वर्ग के अंतिम चयनित उम्मीदवार से भी अधिक अंक प्राप्त किए। इसके बावजूद उन्हें ओपन कैटेगरी की मेरिट सूची में शामिल नहीं किया गया।
हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
जस्टिस आलोक अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि यह पूरी तरह भर्ती नियमों और अधिसूचना पर निर्भर करता है कि आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार ओपन कैटेगरी में जा सकता है या नहीं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“अपीलकर्ता, जो सामान्य वर्ग के अंतिम चयनित उम्मीदवार से अधिक मेधावी हैं, उन्हें भर्ती नियमों या अधिसूचना में किसी स्पष्ट रोक के अभाव में सामान्य वर्ग के तहत विचार से बाहर नहीं किया जा सकता। पात्रता में दी गई छूट मेरिट को प्रभावित नहीं करती।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि 13 फरवरी 2013 के सरकारी प्रस्ताव के तहत बने नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था, जो छूट लेने वाले आरक्षित उम्मीदवारों को ओपन कैटेगरी में जाने से रोकता हो। इसलिए उन्हें सामान्य श्रेणी में शामिल करने से इनकार करना अनुचित था।
पूर्व फैसलों का हवाला
कोर्ट ने अपने हालिया फैसलों — यूनियन ऑफ इंडिया बनाम साजिब रॉय (2025) और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम जी. किरण (2026) — का उल्लेख किया, जहां भर्ती नियमों में स्पष्ट रोक होने के कारण श्रेणी परिवर्तन की अनुमति नहीं दी गई थी।
साथ ही, प्रदीप कुमार बनाम गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली (2019) मामले को मौजूदा प्रकरण से अलग बताया। कोर्ट ने कहा कि उस मामले में उम्मीदवार आवश्यक पात्रता मानदंड ही पूरा नहीं कर पाए थे, जबकि वर्तमान मामले में अपीलकर्ताओं ने वैध छूट के आधार पर पात्रता हासिल की थी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किए:
- क्वालिफाइंग परीक्षा में दी गई छूट से केवल विचार-क्षेत्र (Zone of Consideration) में प्रवेश मिलता है; यह अंतिम मेरिट में छूट नहीं मानी जाएगी।
- ऐसी छूट समान अवसर (Level Playing Field) प्रदान करती है; अंतिम चयन पूरी तरह आपसी मेरिट के आधार पर होगा।
- यदि कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार आवश्यक पात्रता मानदंड ही पूरा नहीं करता, तो उसे ओपन कैटेगरी में जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
- श्रेणी परिवर्तन की अनुमति भर्ती नियमों या अधिसूचना पर निर्भर करेगी।
- यदि नियम इस विषय पर मौन हों या स्पष्ट रोक न हो, तो ओपन कैटेगरी में चयन वैध होगा।
कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन अपीलकर्ताओं ने सामान्य श्रेणी के अंतिम चयनित उम्मीदवार से 30 अंक अधिक प्राप्त किए हैं, उन्हें ओपन कैटेगरी की मेरिट सूची में शामिल किया जाए। इसके साथ ही अपील स्वीकार कर ली गई। मामले का शीर्षक: छाया एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य