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भारतसुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट

सबरीमाला पुनर्विचार पर सुप्रीम कोर्ट में नई सुनवाई: 9 जजों की बेंच गठित, ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ बनाम समानता पर गहन बहस

NTN NEWS REPORT// नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर वर्ष 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई मंगलवार से फिर शुरू हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई में शीर्ष अदालत ने इस व्यापक संवैधानिक प्रश्न पर विचार के लिए 9 जजों की बेंच गठित करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है।

फाइल फोटो, सोर्स सोशल मीडिया

सुनवाई के दौरान सीधे सबरीमाला मामले पर बहस शुरू नहीं हुई, बल्कि अदालत में धार्मिक स्वतंत्रता, आस्था, संप्रदायों की पहचान और संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 की व्याख्या पर विस्तृत चर्चा हुई।


2018 का फैसला क्या था?

यह मामला सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी से जुड़ा है।

वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से इस प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित किया था। अदालत ने कहा था कि यह परंपरा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) की मूल भावना के खिलाफ है।


केंद्र सरकार का पक्ष: आस्था और संप्रदाय की पहचान

सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि:

  • सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध किसी भी प्रकार की हीनता या भेदभाव की सोच पर आधारित नहीं है।
  • यह परंपरा भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप से जुड़ी है।
  • किसी संप्रदाय की ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय धार्मिक संरचना बहुलतावादी है और ‘धर्म’ को एक समान इकाई के रूप में नहीं देखा जा सकता।


हिंदू धर्म की बहुलता पर विस्तृत दलील

तुषार मेहता ने कहा कि हिंदू धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। इसमें:

  • 4 वेद
  • 4 उपवेद
  • 6 वेदांग
  • 4 उपांग (धर्मशास्त्र, पुराण आदि)
  • 18 महापुराण और 18 उपपुराण
  • न्याय और मीमांसा शास्त्र

जैसी व्यापक परंपराएं शामिल हैं।

उन्होंने चार्वाक दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में नास्तिकों को भी मान्यता प्राप्त है। जैन और बौद्ध परंपराओं पर भी चर्चा हुई। इस दौरान पीठ ने सवाल किया कि यदि परलोक में विश्वास नहीं है तो पुनर्जन्म की अवधारणा कैसे स्थापित होती है।


अदालत की टिप्पणी और दार्शनिक विमर्श

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने ‘pursuit of happiness’ के विचार को चार्वाक दर्शन से जोड़ते हुए टिप्पणी की कि यह अस्तित्ववादी सोच भारत की प्राचीन परंपरा में भी मिलती है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि बौद्ध धर्म में महानिर्वाण की अवधारणा है, जहां मुक्ति के बाद पुनर्जन्म नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय धार्मिक संरचना पश्चिमी अवधारणाओं से अलग है और अनुच्छेद 25-26 को भारतीय संदर्भ में समझा जाना चाहिए।


अन्य धर्मों और संप्रदायों का उदाहरण

दलीलों के दौरान इस्लाम, ईसाई और सिख धर्म के विभिन्न संप्रदायों का उदाहरण दिया गया।

  • इस्लाम में सुन्नी, शिया जैसे मत
  • ईसाई धर्म में विभिन्न चर्च परंपराएं
  • गुरु आधारित परंपराएं और तीर्थ

तुषार मेहता ने कहा कि सबरीमाला को एक विशिष्ट धार्मिक संप्रदाय के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए, जिसकी अपनी परंपराएं और आचार हैं।


अब आगे क्या?

9 जजों की बेंच इस बात पर विचार करेगी कि:

  • ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ की परिभाषा क्या हो?
  • धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए?
  • क्या न्यायपालिका को किसी संप्रदाय की आस्था आधारित प्रथा में हस्तक्षेप करना चाहिए?

यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े अन्य विवादों पर भी प्रभाव डाल सकता है।


(यह मामला भारतीय संवैधानिक इतिहास में धर्म, आस्था और समानता के संतुलन को परिभाषित करने वाला एक महत्वपूर्ण अध्याय बन सकता है।)

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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