
सिर्फ झगड़ा करना IPC 498A या दहेज उत्पीड़न नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने सास-ससुर के खिलाफ कार्यवाही रद्द की
NTN NEWS REPORT// नई दिल्ली, 10 मार्च 2026। सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल “झगड़ा करना” अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A या दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने महिला के सास-ससुर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
क्या था मामला
महिला ने अपनी FIR में आरोप लगाया था कि उसके पति, सास-ससुर और ननद ने दहेज की मांग को लेकर उसके साथ क्रूरता और उत्पीड़न किया। शिकायत में एक BMW कार सहित अन्य कीमती सामान की मांग का भी उल्लेख था।
आरोपों में यह भी कहा गया कि सास-ससुर उससे झगड़ा करते थे। हालांकि, FIR में उनके खिलाफ किसी विशेष घटना, तारीख या अलग-अलग भूमिका का स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया था।
पटना हाईकोर्ट का फैसला
मामला जब पटना हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने ननद के खिलाफ चल रही कार्यवाही यह कहते हुए रद्द कर दी कि उसके खिलाफ आरोप सामान्य और अस्पष्ट प्रकृति के हैं।
हालांकि, सास-ससुर को समान राहत देने से हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया। कोर्ट का मत था कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मामला बनता है। इसके बाद सास-ससुर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से पलटते हुए कहा कि जब FIR में ननद और सास-ससुर के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रकृति में एक जैसे हैं, तो अलग-अलग मापदंड लागू करना उचित नहीं है।
अदालत ने कहा कि:
- FIR की तुलनात्मक जांच से स्पष्ट है कि आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं।
- अपीलकर्ताओं (सास-ससुर) के खिलाफ किसी विशेष घटना, तारीख या अलग भूमिका का उल्लेख नहीं है।
- केवल यह आरोप कि वे झगड़ा करते थे, IPC की धारा 341, 323, 498A और 34 या दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत अपराध का आधार नहीं बन सकता।
हाईकोर्ट की त्रुटि बताई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने समान परिस्थितियों में अलग-अलग मानदंड अपनाकर गलती की। यदि ननद के खिलाफ आरोपों को सामान्य मानकर कार्यवाही रद्द की गई, तो सास-ससुर को भी उसी आधार पर राहत मिलनी चाहिए थी।
अपील स्वीकार, पति पर कार्यवाही जारी
अदालत ने सास-ससुर की अपील स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल अपीलकर्ताओं तक सीमित है और पति के खिलाफ चल रही कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रहेगी।
केस शीर्षक: Dr. Sushil Kumar Purbey & Anr. vs. The State of Bihar & Ors.