ममता के खिलाफ उसी चक्रव्यूह का इस्तेमाल! ‘साम, दाम, दंड, भेद’ ने कैसे तोड़ी तृणमूल कांग्रेस की कमर?
NTN REPORT// पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया है। कभी राज्य की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) आज गंभीर आंतरिक संकट से जूझती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर शुरू हुई बगावत अब खुले शक्ति प्रदर्शन में बदल चुकी है और हालात ऐसे बन गए हैं कि पार्टी नेतृत्व पर ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर पड़ती नजर आ रही है।

2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद टीएमसी के भीतर असंतोष तेजी से बढ़ा। अब पार्टी के कई विधायक खुलकर नेतृत्व परिवर्तन की मांग के साथ सामने आ गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस रणनीति का इस्तेमाल कभी ममता बनर्जी ने अपने विरोधियों को कमजोर करने के लिए किया था, आज वही रणनीति उनके खिलाफ इस्तेमाल होती दिखाई दे रही है।
क्या है पूरा विवाद?
पार्टी नेतृत्व की ओर से विधानसभा में सोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, असिमा पात्रा को डिप्टी लीडर और फरहाद हकीम को चीफ व्हिप बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।
लेकिन इसी बीच बागी गुट ने अलग शक्ति प्रदर्शन करते हुए दावा किया कि उनके पास 80 में से 60 विधायकों का समर्थन है। बागी नेताओं ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष घोषित करने की मांग कर दी। साथ ही जावेद अहमद खान, शबीना यास्मीन और संदीपन साह जैसे नेताओं को प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपे जाने का भी दावा किया गया।
इस घटनाक्रम ने साफ संकेत दिया कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर संघर्ष चल रहा है।
‘साम, दाम, दंड, भेद’ से समझिए टीएमसी का संकट
भारतीय राजनीति और चाणक्य नीति में वर्णित चार प्रमुख रणनीतियां—साम, दाम, दंड और भेद—इस पूरे घटनाक्रम को समझने का महत्वपूर्ण आधार बन गई हैं।
1. साम: नेतृत्व पर भरोसा कमजोर करने की रणनीति
‘साम’ का अर्थ होता है समझाकर, मनाकर या माहौल बनाकर अपने पक्ष में करना।
2011 में जब ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा सरकार को सत्ता से हटाया था, तब उन्होंने “परिवर्तन” के नारे के जरिए जनता और विपक्षी कार्यकर्ताओं को अपने पक्ष में आकर्षित किया था। इससे वामपंथी राजनीति का मनोबल कमजोर हुआ और कई नेता टीएमसी में शामिल हो गए।
अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। पार्टी के भीतर एक वर्ग यह मानने लगा कि वर्तमान नेतृत्व के तहत टीएमसी का भविष्य सुरक्षित नहीं है। इसी धारणा ने असंतुष्ट नेताओं को एक मंच पर लाने में बड़ी भूमिका निभाई।
2. दाम: राजनीतिक भविष्य और सत्ता का समीकरण
राजनीति में ‘दाम’ का मतलब केवल धन नहीं, बल्कि राजनीतिक सुरक्षा, पद और भविष्य की संभावनाओं से भी होता है।
सत्ता परिवर्तन की संभावना बनने पर अक्सर नेता अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने की कोशिश करते हैं। टीएमसी के भीतर भी कई विधायक और नेता नए राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुटे दिखाई दिए।
विश्लेषकों का मानना है कि यही कारण रहा कि बड़ी संख्या में विधायक बागी गुट के साथ खड़े होते दिखाई दिए।
3. दंड: जांच एजेंसियों और कानूनी दबाव का असर
राजनीतिक संकट के बीच केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता भी चर्चा का विषय बनी हुई है।
कई पुराने मामलों की जांच तेज होने और विभिन्न नेताओं पर कानूनी दबाव बढ़ने से पार्टी के भीतर असहजता बढ़ी है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि ऐसे हालात में कई नेता अपने राजनीतिक विकल्प तलाशने लगते हैं।
इसी वजह से टीएमसी के कई नेताओं के रुख में अचानक बदलाव देखने को मिला।
4. भेद: पार्टी के अंदर की दरार बनी सबसे बड़ा हथियार
चाणक्य नीति में ‘भेद’ को सबसे प्रभावी रणनीति माना जाता है।
टीएमसी के भीतर पिछले कुछ वर्षों से दो धड़े स्पष्ट रूप से दिखाई देते रहे हैं। एक धड़ा ममता बनर्जी के पुराने भरोसेमंद नेताओं का रहा, जबकि दूसरा धड़ा अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में उभरती नई पीढ़ी का माना जाता रहा।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इसी आंतरिक खींचतान ने पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। जब नेतृत्व को लेकर मतभेद सार्वजनिक होने लगे तो विरोधी गुटों को पार्टी के भीतर सेंध लगाने का अवसर मिल गया।
अभिषेक बनर्जी फैक्टर क्यों बना विवाद की जड़?
टीएमसी के अंदर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। कई वरिष्ठ नेताओं को लगता था कि निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका कम होती जा रही है।
यही असंतोष धीरे-धीरे एक बड़े संगठनात्मक संकट में बदल गया। पार्टी के भीतर ‘पुराने बनाम नए नेतृत्व’ की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी और अंततः यह बगावत का रूप लेती दिखाई दी।
क्या ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है?
ममता बनर्जी के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती खड़ी है—
- पार्टी को टूटने से बचाना।
- संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना।
राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बन गई हैं कि उनके लिए किसी एक पक्ष का चयन करना भी आसान नहीं है। एक तरफ पार्टी का संगठनात्मक अस्तित्व है तो दूसरी तरफ अभिषेक बनर्जी का नेतृत्व।
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
2011 में ममता बनर्जी ने 34 वर्षों से सत्ता में काबिज वाम मोर्चे को सत्ता से बाहर कर बंगाल की राजनीति बदल दी थी। उस समय जिस राजनीतिक रणनीति का इस्तेमाल विपक्ष को कमजोर करने के लिए किया गया था, आज उसी तरह की रणनीतियों का सामना टीएमसी को करना पड़ रहा है।
यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में यह चर्चा तेज हो गई है कि इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है।
तृणमूल कांग्रेस का मौजूदा संकट केवल नेतृत्व परिवर्तन का मामला नहीं है, बल्कि यह संगठनात्मक असंतोष, राजनीतिक महत्वाकांक्षा, सत्ता समीकरण और आंतरिक गुटबाजी का संयुक्त परिणाम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि ममता बनर्जी इस चुनौती से उबर पाती हैं या फिर बंगाल की राजनीति एक नए अध्याय की ओर बढ़ रही है।
(नोट: यह विश्लेषण उपलब्ध राजनीतिक घटनाक्रमों और दावों पर आधारित है। विभिन्न पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक हो सकती है।) यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।