मिडिल ईस्ट में बढ़ता युद्ध संकट: भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे पांच बड़े खतरे, तेल से लेकर शेयर बाजार तक बढ़ सकती है मुश्किल
अमेरिका-ईरान तनाव गहराने से होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट की आशंका, कच्चे तेल की आपूर्ति, महंगाई और आर्थिक स्थिरता पर पड़ सकता है व्यापक असर।
NTN REPORT// नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया घटनाक्रम के बाद क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बनने की आशंका गहरा गई है। इस तनाव का सबसे बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है, जिसका सीधा प्रभाव भारत जैसी ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिल सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बाधित होती है तो भारत को कच्चे तेल, गैस, महंगाई, आयात बिल और शेयर बाजार जैसे कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट से तेल और गैस आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। भारत के लिए भी यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है। देश के कच्चे तेल और एलएनजी आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। यदि युद्ध के कारण इस मार्ग में बाधा आती है तो भारत में तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे ईंधन उपलब्धता पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से आयात बिल पर बढ़ेगा दबाव
भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। यदि मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से कच्चा तेल महंगा होता है तो भारत का विदेशी मुद्रा व्यय बढ़ सकता है। इससे चालू खाता घाटा बढ़ने और रुपये पर दबाव बनने की आशंका भी जताई जा रही है।
पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों में राहत की उम्मीद कमजोर
यदि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है तो घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में राहत मिलने की संभावना कम हो सकती है। तेल विपणन कंपनियों पर बढ़ने वाले लागत दबाव का असर आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है, जिससे ईंधन महंगा होने का जोखिम बना रहेगा।
महंगाई पर पड़ सकता है सीधा असर
तेल की कीमतें बढ़ने से परिवहन लागत में वृद्धि होती है, जिसका प्रभाव खाद्यान्न, उपभोक्ता वस्तुओं और अन्य आवश्यक सामानों की कीमतों पर भी पड़ता है। इसके अलावा आयात महंगा होने से कई उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। ऐसे में देश में महंगाई बढ़ने का खतरा भी गहरा सकता है, जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है।
शेयर बाजार और विदेशी निवेश पर भी पड़ सकता है प्रभाव
वैश्विक तनाव बढ़ने की स्थिति में निवेशक आमतौर पर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। इसका असर शेयर बाजारों पर बिकवाली के रूप में दिखाई दे सकता है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में कमी, बाजार में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की चिंता बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
भारत के लिए रणनीतिक सतर्कता जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने बीते वर्षों में ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाकर अपनी निर्भरता को कुछ हद तक संतुलित किया है, लेकिन मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक जारी रहने वाला तनाव फिर भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। ऐसे में सरकार के लिए ऊर्जा सुरक्षा, वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
अस्वीकरण: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।