
परिसीमन बिल पर सरकार की बड़ी तैयारी: DMK-TMC से शुरू हुई बातचीत, मानसून सत्र में पेश हो सकता है अहम विधेयक
नई दिल्ली: परिसीमन बिल को लेकर सरकार ने तेज की राजनीतिक कवायद
NTN REPORT// केंद्र सरकार संसद के आगामी मानसून सत्र में परिसीमन (Delimitation) से जुड़ा महत्वपूर्ण विधेयक लाने की तैयारी कर रही है। इस बार सरकार पिछली बार की तरह सीधे बिल पेश करने के बजाय पहले सभी प्रमुख क्षेत्रीय दलों को विश्वास में लेने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी और तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके से बातचीत शुरू होने की जानकारी सामने आई है।

सूत्रों के अनुसार, सरकार चाहती है कि संसद में बिल पेश होने से पहले व्यापक राजनीतिक सहमति बनाई जाए, ताकि इस संवेदनशील विषय पर अनावश्यक टकराव और विरोध की स्थिति न बने।
क्यों बदली सरकार की रणनीति?
परिसीमन का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और क्षेत्रीय असंतुलन की बहस का केंद्र रहा है। पिछली बार जब इस विषय पर चर्चा तेज हुई थी, तब दक्षिण भारत के कई राज्यों और क्षेत्रीय दलों ने कड़ा विरोध जताया था।
इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार इस बार पहले चरण में संवाद और सहमति निर्माण पर जोर दे रही है। माना जा रहा है कि मानसून सत्र से पहले विभिन्न दलों के साथ कई दौर की बैठकें आयोजित की जा सकती हैं।

TMC का क्या है रुख?
सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद सरकार के प्रस्ताव को सुनने और चर्चा में भाग लेने के लिए तैयार हैं। पार्टी ने फिलहाल किसी प्रकार का सार्वजनिक विरोध नहीं किया है।
हालांकि, पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में TMC का रुख फिलहाल “वेट एंड वॉच” की स्थिति में माना जा रहा है।
DMK क्या सोच रही है?
तमिलनाडु की सत्तारूढ़ DMK ने भी अभी तक कोई अंतिम रुख स्पष्ट नहीं किया है। पार्टी सरकार के प्रस्तावित नए ड्राफ्ट का इंतजार कर रही है। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि जैसे ही सरकार लिखित प्रस्ताव या विधेयक का मसौदा सार्वजनिक करेगी, उसके बाद DMK अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया दे सकती है।
क्या होता है परिसीमन?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। देश में जनसंख्या के बदलाव, शहरीकरण, पलायन और क्षेत्रीय जनसंख्या संतुलन को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और प्रतिनिधित्व तय किया जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो किसी क्षेत्र में जनसंख्या बढ़ने या घटने के अनुसार सीटों की संख्या और उनके क्षेत्रफल का पुनर्गठन ही परिसीमन कहलाता है।
क्यों है यह मुद्दा इतना विवादित?
विवाद का मुख्य कारण उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच जनसंख्या वृद्धि की दर में अंतर है।
दक्षिण भारत की चिंता
तमिलनाडु, केरला और कर्नाटक जैसे राज्यों ने पिछले कई दशकों में जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू किया है। परिणामस्वरूप इन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही। इन राज्यों को आशंका है कि यदि भविष्य में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया गया, तो संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है।
उत्तर भारत की स्थिति
वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक रही है। ऐसी स्थिति में जनसंख्या आधारित परिसीमन होने पर इन राज्यों की लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव और अधिक बढ़ जाएगा। यही कारण है कि परिसीमन का विषय केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और संघीय संतुलन का भी मुद्दा बन गया है।
सरकार की प्राथमिकता क्या है?
सरकार का उद्देश्य अधिकतम राजनीतिक सहमति के साथ आगे बढ़ना है। माना जा रहा है कि:
- पहले विधेयक का प्रारूप तैयार किया जाएगा।
- प्रमुख राजनीतिक दलों को ड्राफ्ट दिखाया जाएगा।
- सुझाव और आपत्तियां ली जाएंगी।
- उसके बाद संसद में विधेयक पेश किया जाएगा।
सरकार का मानना है कि व्यापक समर्थन मिलने पर विधेयक पारित कराने में आसानी होगी।
आगे क्या हो सकता है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अगले कुछ सप्ताह इस मुद्दे के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि सरकार और क्षेत्रीय दलों के बीच सहमति बन जाती है तो मानसून सत्र में परिसीमन बिल पेश किया जा सकता है। लेकिन यदि राज्यों की आशंकाओं का समाधान नहीं हुआ तो यह विषय फिर बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले सकता है। फिलहाल सभी दलों की नजर सरकार के प्रस्तावित नए ड्राफ्ट पर टिकी हुई है।
भारत में अब तक कितनी बार हुआ परिसीमन?
स्वतंत्र भारत में अब तक चार बार परिसीमन किया जा चुका है:
| वर्ष | परिसीमन आयोग |
|---|---|
| 1952 | पहला परिसीमन |
| 1963 | दूसरा परिसीमन |
| 1973 | तीसरा परिसीमन |
| 2002 | चौथा परिसीमन |
2002 के परिसीमन के बाद निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव किया गया था, लेकिन लोकसभा सीटों की कुल संख्या 543 ही बनी रही।

मानसून सत्र कब शुरू हो सकता है?
संसद का मानसून सत्र सामान्यतः जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होकर अगस्त के मध्य तक चलता है।
पिछले वर्ष संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक चला था। इस वर्ष भी लगभग इसी अवधि में सत्र बुलाए जाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि अंतिम कार्यक्रम केंद्र सरकार की अधिसूचना के बाद ही स्पष्ट होगा।
परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। केंद्र सरकार इस बार क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति अपना रही है। TMC और DMK जैसे दलों के साथ शुरू हुई बातचीत इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आने वाले दिनों में सरकार का नया ड्राफ्ट और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया इस पूरे मुद्दे की दिशा तय करेगी।
यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।