ईरान युद्ध का वैश्विक असर: यूरोप के 21 देशों में महंगाई का विस्फोट, ग्रोथ रेट भी सुस्त
तेल-गैस संकट से यूरोप में महंगाई का बड़ा झटका
NTN NEWS REPORT// ईरान से जुड़े युद्ध के असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर साफ नजर आने लगे हैं। तेल और गैस की सप्लाई बाधित होने के कारण यूरोप के 21 देशों में अप्रैल महीने में महंगाई दर में तेज उछाल दर्ज किया गया है। ऊर्जा कीमतों में भारी बढ़ोतरी इसके पीछे की मुख्य वजह मानी जा रही है।

एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोजोन में महंगाई दर मार्च के 2.6% से बढ़कर अप्रैल में 3% तक पहुंच गई। इसमें सबसे बड़ा योगदान एनर्जी सेक्टर का रहा, जहां कीमतों में करीब 10.9% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना संकट की जड़
इस वैश्विक संकट की सबसे बड़ी वजह होर्मुज स्ट्रेट का बाधित होना है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की कुल तेल सप्लाई का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। इसके प्रभावित होने से वैश्विक ईंधन सप्लाई पर गहरा असर पड़ा है।
इसका असर सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत, पाकिस्तान, ब्रिटेन, श्रीलंका और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है।
तेल की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल
यूरोस्टेट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है, जो युद्ध शुरू होने से पहले करीब 73 डॉलर प्रति बैरल थी। इस तेज उछाल ने ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है और इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है।
ग्रोथ रेट में गिरावट से बढ़ी चिंता
महंगाई के साथ-साथ यूरोजोन की आर्थिक ग्रोथ भी कमजोर पड़ी है। साल की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर केवल 0.1% रही, जो बेहद धीमी मानी जा रही है।
यह संकेत देता है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक गतिविधियां दबाव में हैं और युद्ध का असर लंबे समय तक जारी रह सकता है।
स्टैगफ्लेशन का खतरा मंडराया
बढ़ती महंगाई और धीमी ग्रोथ के इस खतरनाक मिश्रण को अर्थशास्त्र में ‘स्टैगफ्लेशन’ कहा जाता है। यह स्थिति नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
यूरोपियन सेंट्रल बैंक जैसे केंद्रीय बैंकों के सामने अब मुश्किल विकल्प हैं—
- ब्याज दरें बढ़ाकर महंगाई नियंत्रित करें, जिससे ग्रोथ और धीमी हो सकती है
- या ग्रोथ को सपोर्ट दें, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है
ईरान से जुड़े इस युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय संघर्ष भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल सकते हैं। ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर दुनिया के लिए यह एक चेतावनी है कि भू-राजनीतिक तनाव का असर सीधे आम लोगों की जेब तक पहुंचता है।