NTN REPORT// नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर नागपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव एवं शस्त्र पूजन कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सामाजिक, सांस्कृतिक और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति, नई पीढ़ी को संस्कार देने, स्वदेशी अपनाने, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के महत्व पर जोर दिया। अपने संबोधन में उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश के घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल सत्ता परिवर्तन से किसी देश की परिस्थितियां नहीं बदलतीं।

सत्ता परिवर्तन से नहीं बदलती परिस्थितियां: मोहन भागवत
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि किसी भी आंदोलन का उद्देश्य समाज की समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए। आंदोलनों के माध्यम से यदि समाज में वैमनस्य, विभाजन और अस्थिरता बढ़ती है, तो इससे समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता।
उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश के घटनाक्रमों का संदर्भ देते हुए सत्ता परिवर्तन की राजनीति पर सवाल उठाए। भागवत ने कहा कि केवल सरकार या व्यवस्था बदलने से परिस्थितियां अपने आप नहीं बदल जातीं।
उन्होंने कहा, “वे कहते हैं कि रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बदलेगी. लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं है. पहले नहीं हुआ, आज भी नहीं होगा.”
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में पश्चिमी विचारधाराओं के प्रभाव का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, ऐसी विचारधाराओं का प्रभाव बढ़ रहा है, जो सामाजिक व्यवस्था, शिष्टाचार और सांस्कृतिक मूल्यों के सामने नई चुनौतियां खड़ी करती हैं। उन्होंने समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता पर बल दिया।
युवाओं में नशे की बढ़ती लत पर जताई चिंता
मोहन भागवत ने युवाओं में बढ़ती नशे की लत को गंभीर सामाजिक समस्या बताया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को नशे के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक करना समय की जरूरत है। इसके लिए परिवार और समाज को मिलकर प्रयास करना होगा।
उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों को केवल शिक्षा तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार, नैतिक मूल्यों और सही-गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता भी प्रदान करें।
संघ प्रमुख के संबोधन का यह पक्ष परिवारों और समाज की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है। युवाओं को नशे से दूर रखने, उनमें जिम्मेदारी की भावना विकसित करने और सकारात्मक जीवनशैली के प्रति प्रेरित करने के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत पर उन्होंने जोर दिया।
राजनारायण बसु और हिंदू मेले का किया उल्लेख
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने बंगाल के विचारक राजनारायण बसु का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राजनारायण बसु ने स्वदेशी मेलों के माध्यम से लोगों को अपनी संस्कृति, परंपराओं और पहचान के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया था। इसी क्रम में उन्होंने हिंदू मेले की शुरुआत का भी जिक्र किया।
भागवत के अनुसार, ऐसे प्रयासों का उद्देश्य समाज में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाना और लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ना था।
उन्होंने स्वदेशी अपनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके संबोधन में स्वदेशी का विषय केवल वस्तुओं के उपयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे देश की सांस्कृतिक पहचान, आत्मनिर्भरता और सामाजिक चेतना से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।
संत रविदास के योगदान को किया याद, सामाजिक समरसता पर जोर
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में संत रविदास के योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों और अत्याचारों के दौर में समाज के भीतर भय का वातावरण था। ऐसे कठिन समय में संत रविदास ने स्वधर्म के प्रति निष्ठा, भक्ति और सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
उन्होंने संत रविदास के विचारों का उल्लेख करते हुए समाज में आपसी सद्भाव और एकजुटता की आवश्यकता पर बल दिया।
भागवत के संबोधन में सामाजिक समरसता का विषय महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने भारतीय समाज की विविधताओं के बीच एकता बनाए रखने और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
भारत की विविधता ही उसकी पहचान, एकजुट होकर आगे बढ़ने का आह्वान
संघ प्रमुख ने भारत की विविधतापूर्ण सामाजिक संरचना का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अलग-अलग पंथ, प्रांत, जातियां, भाषाएं, खानपान और रीति-रिवाज हैं। इसके बावजूद भारत की एकता सर्वोपरि है।
उन्होंने भारत माता के सर्वोच्च स्थान का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को एकजुट होकर आगे बढ़ना है। भारत अतीत में भी एकता के बल पर आगे बढ़ा है और भविष्य में भी इसी भावना के साथ प्रगति करता रहेगा।
उन्होंने भारतीय समाज को अपनी विविधताओं का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाए रखने का संदेश दिया।
भारत की पहचान और संस्कृति के आधार पर संगठन का दावा
मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 100 वर्षों से भारत को उसकी अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं के आधार पर संगठित एवं मजबूत बनाने के लिए कार्य कर रहा है।
उन्होंने संघ की यात्रा का उल्लेख करते हुए सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकजुटता और राष्ट्रीय भावना को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, भारत की परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता समाज को संगठित करने में अहम भूमिका निभाती है।
संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संगठन की सौ वर्ष की यात्रा और उसके विचारों को प्रस्तुत करने के महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा गया।
1925 में विजयादशमी के दिन हुई थी RSS की स्थापना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण विजयादशमी का पर्व संघ के लिए विशेष महत्व रखता है।
संघ की परंपरा के अनुसार, विजयादशमी के अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें शस्त्र पूजन, स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण और पथ संचलन जैसे आयोजन शामिल होते हैं।
शताब्दी वर्ष के अवसर पर नागपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव में मोहन भागवत का संबोधन सामाजिक चुनौतियों, सांस्कृतिक पहचान, स्वदेशी, युवाओं के चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों पर केंद्रित रहा।
निष्कर्ष
RSS के शताब्दी वर्ष पर नागपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव में मोहन भागवत ने समाज और राष्ट्र के सामने मौजूद विभिन्न चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने युवाओं को नशे से दूर रखने, नई पीढ़ी में संस्कार विकसित करने, स्वदेशी को प्रोत्साहित करने और सामाजिक समरसता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि किसी देश की परिस्थितियों में स्थायी बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि समस्याओं के वास्तविक समाधान से आता है।
अस्वीकरण: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।