
देवउठनी एकादशी विशेष: भगवान विष्णु के जागरण से गूंजा देश, अब शुरू होंगे सभी शुभ कार्य
चार महीने बाद देव जागे, मांगलिक कार्यों को मिली हरी झंडी
NTN NEWS REPORT// कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के पावन अवसर पर आज पूरे प्रदेश और देशभर के मंदिरों में भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा से जागे, और उनके साथ ही शुभ कार्यों का शुभारंभ हो गया।
मंदिरों में घंटियों की गूंज, तुलसी चौरे पर दीपों की ज्योति और घर-आंगन में “उठो देव, जागो देव” की गूंज ने वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
क्या है देवउठनी एकादशी का महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार माह बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को ब्रह्म मुहूर्त में जागते हैं।
इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जिसमें विवाह, गृहप्रवेश, उपनयन जैसे शुभ संस्कार वर्जित रहते हैं।
देवउठनी एकादशी का आगमन होते ही शुभ कार्यों की शुरुआत होती है, इसीलिए इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है।
इस तरह करें पूजा-अर्चना
1️⃣ प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु और तुलसी माता की पूजा करें।
2️⃣ आंगन में गेरू और गोबर से मंडप बनाएं, उसमें तुलसी चौरा सजाएं।
3️⃣ भगवान को गन्ना, दीप, फल और शुद्ध जल अर्पित करें।
4️⃣ “उठो देव, जागो देव, तुलसी विवाह रचाओ देव” बोलकर आरती करें।
5️⃣ शाम को तुलसी विवाह का आयोजन करें — जो भगवान विष्णु और तुलसी माता के दिव्य मिलन का प्रतीक है।
इस दिन के व्रत और पूजा के फल
📿 धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत रखने से जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं।
🏡 तुलसी विवाह कराने से वैवाहिक जीवन में सौहार्द, समृद्धि और स्थायित्व आता है।
🙏 जो व्यक्ति इस दिन भगवान विष्णु और तुलसी माता का पूजन करता है, उसे अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।
आस्था और उल्लास का संगम
देवउठनी एकादशी के साथ ही विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, उपनयन जैसे शुभ अवसरों की बुकिंग का दौर भी शुरू हो गया है।
जांजगीर-चांपा समेत प्रदेशभर के मंदिरों में भव्य सजावट की गई है। भक्तों ने सुबह से ही विशेष भोग और दीपदान कर भगवान श्रीहरि के जागरण का उत्सव मनाया।
तुलसी चौरा के पास महिलाओं ने पारंपरिक गीत गाए —“उठो देव जागो देव, तुलसी विवाह रचाओ देव…”
इन गीतों की मधुर धुन ने वातावरण को पूर्णतः भक्तिमय बना दिया।
आचार्य का मत
स्थानीय पंडित आचार्य रामजी त्रिपाठी बताते हैं — “देवउठनी एकादशी वह क्षण है जब प्रकृति और आध्यात्मिक ऊर्जा दोनों जागृत होती हैं। इस दिन का व्रत मनुष्य को आलस्य से मुक्ति और जीवन में नई प्रेरणा देता है।”
देवउठनी एकादशी केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आस्था, नवप्रारंभ और शुभ संकल्प का प्रतीक है। जब भगवान जागते हैं, तो हमारी आत्मा भी जागती है — नई उमंग, नई ऊर्जा और नए अवसरों के साथ। इस एकादशी पर किया गया एक दीपक न केवल देवता को जागृत करता है, बल्कि हमारे भीतर के विश्वास को भी रोशन करता है।