
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणीः “व्हाट्सएप या सोशल मीडिया के ज़रिए नोटिस नहीं भेजा जा सकता”
नोटिस की विधिक प्रक्रिया में डिजिटल माध्यमों का उपयोग अस्वीकार्य, अदालत ने पुलिस को दिए निर्देश
NTN NEWS REPORT// 1 नवंबर 2025। सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम ज़मानत से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि व्हाट्सएप, ट्विटर या किसी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के ज़रिए कानूनी नोटिस नहीं भेजा जा सकता। अदालत ने कहा कि नोटिस की विधिक प्रक्रिया औपचारिक और वैधानिक रूप से पूरी की जानी चाहिए।

यह टिप्पणी जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने उस समय की, जब एक याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि उन्होंने शिकायतकर्ता को नोटिस व्हाट्सएप के ज़रिए भेजा है क्योंकि उनसे सीधा संपर्क संभव नहीं हो पा रहा था।
मामला क्या है
यह मामला मनोज कुमार मोहंती बनाम ओडिशा राज्य एवं अन्य (एसएलपी [सीआरएल] संख्या एस/2025) से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 64(2)(एफ), 351(2), 296 और 3(5) के तहत दंडनीय अपराध करने का आरोप है। मामला एक बलात्कार के आरोप से संबंधित है।
ओडिशा हाईकोर्ट ने पहले इस मामले में अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया था। आरोपों के अनुसार, याचिकाकर्ता पीड़िता का पिता है, और पीड़िता की मां के साथ पारिवारिक विवाद एवं कई मुकदमे चल रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि उसे झूठे आरोपों में फंसाया गया है और मां ने पीड़िता को “बलि का बकरा” बनाया है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या हुआ
सुनवाई के दौरान जब अदालत ने पूछा कि क्या शिकायतकर्ता-पीड़िता को नोटिस भेजा गया है, तो याचिकाकर्ता के वकील ने कहा — “शिकायतकर्ता से संपर्क नहीं हो पा रहा है, इसलिए हमने व्हाट्सएप के माध्यम से नोटिस भेजा है।”
इस पर जस्टिस अरविंद कुमार ने स्पष्ट कहा —“नहीं, नहीं। व्हाट्सएप या ट्विटर नहीं। जाकर नोटिस भेजो।”
वकील ने जवाब दिया कि — “वह हमारे व्हाट्सएप संदेशों का जवाब नहीं दे रही है। जांच अधिकारी ने भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट से निर्देश मिलने तक वे नोटिस स्वीकार नहीं करेंगे।”
अदालत का निर्देश : सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मौखिक रूप से निर्देश दिया कि संबंधित पुलिस अधिकारी पीड़िता को दो सप्ताह के भीतर नोटिस की सेवा सुनिश्चित करें। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि इस अवधि में याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए, यानी अंतरिम संरक्षण जारी रहेगा।
कानूनी दृष्टिकोण से अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के वर्षों में डिजिटल माध्यमों से कानूनी नोटिस या समन भेजने की प्रथा बढ़ी है। अदालत के इस स्पष्ट रुख से यह संकेत मिला है कि विधिक नोटिस की सेवा केवल विधिवत, प्रत्यक्ष और वैधानिक माध्यमों से ही मान्य होगी।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में कानूनी प्रक्रियाओं में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगी। अदालत ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को नोटिस सेवा के वैधानिक माध्यम के रूप में अस्वीकार कर यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में औपचारिकता और प्रक्रिया की शुद्धता सर्वोपरि है।