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जांजगीर-चांपास्थानीय समाचार / शहर की खबरें

जिला अस्पताल जांजगीर की बदहाल व्यवस्था पर बड़ा सवाल: लाखों की तनख्वाह, लेकिन शाम की ओपीडी से डॉक्टर गायब! आगजनी से लेकर अनियमितताओं तक, आखिर कब तय होगी जवाबदेही?

कई डॉक्टरों की ड्यूटी, लेकिन शाम की ओपीडी में पहुंचे सिर्फ गिने-चुने चिकित्सक; मरीज परेशान, जिम्मेदार बेबस, व्यवस्था सवालों के घेरे में!

NTN REPORT//  जिला अस्पताल जांजगीर एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। करोड़ों रुपये खर्च कर स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के सरकारी दावों के बीच जिला अस्पताल की वास्तविक तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है। शुक्रवार शाम जिला अस्पताल की ओपीडी में जो दृश्य देखने को मिला, उसने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी।जानकारी के अनुसार शाम की ओपीडी में कई चिकित्सकों की ड्यूटी निर्धारित रहती है, लेकिन मौके पर केवल दो से चार डॉक्टर ही मौजूद दिखाई दिए। अधिकांश चिकित्सकों की कुर्सियां खाली रहीं, जबकि मरीज डॉक्टरों के इंतजार में बैठे रहे। यह कोई एक दिन की स्थिति नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था का हिस्सा बताई जा रही है।

मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि शाम की ओपीडी अब केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है। डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण कई मरीजों को बिना उपचार लौटना पड़ता है या मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।


सरकार करोड़ों खर्च कर रही, लेकिन जनता को नहीं मिल रहा पूरा लाभ

राज्य सरकार लगातार स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर निवेश कर रही है। जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज से जोड़ा गया है, आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं और जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) मद से बड़ी संख्या में विशेषज्ञ एवं सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की नियुक्तियां भी की गई हैं।

सूत्रों के अनुसार इन विशेषज्ञ चिकित्सकों को आकर्षक वेतन दिया जा रहा है, जिसकी राशि लाखों रुपये प्रतिमाह तक पहुंचती है। सवाल यह है कि जब सरकार इतनी बड़ी राशि खर्च कर रही है, तब मरीजों को विशेषज्ञ सेवाएं समय पर क्यों नहीं मिल पा रही हैं?


बिलासपुर से अप-डाउन, अस्पताल में केवल औपचारिक उपस्थिति!

सूत्रों के मुताबिक कुछ चिकित्सक रोजाना बिलासपुर से जांजगीर आते-जाते हैं। आरोप है कि उनकी सुबह 9 बजे से ड्यूटी निर्धारित होने के बावजूद वे कई बार 10:30 या 11 बजे अस्पताल पहुंचते हैं और दोपहर एक बजे के आसपास वापस रवाना हो जाते हैं।

यदि यह स्थिति सही है तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि शाम की ओपीडी की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है? मरीजों को इलाज कौन देगा? क्या सरकारी सेवा केवल कुछ घंटों तक सीमित रह गई है?

सिविल सर्जन ने भी जताई बेबसी

जब इस पूरे मामले में जिला अस्पताल के सिविल सर्जन से चर्चा की गई तो उन्होंने कथित तौर पर स्वीकार किया कि कुछ डॉक्टर बिलासपुर से आना जाना करते है उन्हें समझाइस दी जाएगी उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पहले से इस स्थिति की जानकारी है और उचित कार्रवाई की जाएगी शाम की ओपीडी की व्यवस्था सुधारने का प्रयास किया जाएगा।

विवादों से पुराना नाता: जिला अस्पताल में पहले भी उठ चुके हैं गंभीर सवाल

जिला अस्पताल जांजगीर का नाम पहली बार विवादों में नहीं आया है। पिछले कुछ वर्षों में यहां कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिन्होंने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए हैं।


रहस्यमयी आगजनी आज भी बनी हुई है पहेली

जिला अस्पताल में हुई भीषण आगजनी की घटना आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। उस घटना ने पूरे जिले को झकझोर दिया था।

आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि—

  • आग लगने का वास्तविक कारण क्या था?
  • अस्पताल की कौन-कौन सी सामग्री आग में नष्ट हुई?
  • कितने रुपये का नुकसान हुआ?
  • इस घटना के लिए जिम्मेदार कौन था?
  • जांच रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकला?
  • दोषियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई?
प्रतीकात्मक एआई तस्वीर

यदि आग वार्डों तक पहुंच जाती तो बड़ी जनहानि भी हो सकती थी। सौभाग्य से ऐसी स्थिति नहीं बनी, लेकिन इतने गंभीर मामले में भी यदि जवाबदेही तय नहीं होती तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।


कोरोना काल में भी उठे थे गंभीर सवाल

कोरोना महामारी के दौरान वेंटिलेटर, चिकित्सा संसाधनों के उपयोग और अस्पताल प्रबंधन को लेकर भी कई सवाल उठे थे। उस समय भी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहीं।


दवाइयों और व्यवस्थाओं को लेकर भी मिलती रही शिकायतें

जिला अस्पताल में समय-समय पर मरीजों को दवाइयों की उपलब्धता, उपचार व्यवस्था, चिकित्सकों की उपस्थिति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। आए दिन मशीन खराबी की शिकायतें आते रहती है , हर बार सुधार के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में अपेक्षित परिवर्तन दिखाई नहीं देता।


करोड़ों की व्यवस्था, लेकिन मरीज अब भी परेशान

सरकार का उद्देश्य जिला अस्पतालों को निजी अस्पतालों के बराबर सुविधायुक्त बनाना है। इसके लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। मेडिकल कॉलेज, आधुनिक मशीनें, विशेषज्ञ डॉक्टर, नई नियुक्तियां और लगातार बजट उपलब्ध कराया जा रहा है।

लेकिन यदि डॉक्टर समय पर अस्पताल नहीं पहुंचेंगे, शाम की ओपीडी खाली रहेगी और अनुशासनहीनता पर कार्रवाई नहीं होगी तो इन सभी सुविधाओं का लाभ आखिर आम जनता तक कैसे पहुंचेगा?


जनता पूछ रही है—आखिर जवाबदेही किसकी?

जिले के नागरिकों का कहना है कि—

  • क्या शाम की ओपीडी केवल कागजों में संचालित हो रही है?
  • क्या डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति की निगरानी होती है?
  • क्या अस्पताल में बायोमेट्रिक उपस्थिति का प्रभावी पालन कराया जा रहा है?
  • यदि डॉक्टर समय पर नहीं आते तो उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई होती है?
  • लाखों रुपये वेतन लेने वाले चिकित्सकों से पूर्ण सेवाएं क्यों नहीं ली जा रहीं?
  • आखिर मरीजों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?

जिम्मेदार अधिकारियों से बड़ी कार्रवाई की उम्मीद

जनता की अपेक्षा है कि जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और राज्य शासन इस पूरे मामले का गंभीरता से संज्ञान लें। यदि कहीं भी ड्यूटी में लापरवाही, अनुशासनहीनता या सेवा नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए, ताकि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर आम जनता का विश्वास कायम रह सके।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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