
निर्माण स्थलों पर भर्राशाही: क्या जांजगीर-चांपा में गुणवत्ता से समझौता बनता जा रहा है नियम?
NTN NEWS REPORT// जांजगीर-चांपा जिले में इन दिनों विभिन्न विभागों के अंतर्गत चल रहे निर्माण कार्य चर्चा के केंद्र में हैं। नगर पालिका, पीडब्ल्यूडी, आरईएस, हाउसिंग बोर्ड, सिंचाई विभाग और अन्य कई विभागों की परियोजनाओं में जिस प्रकार की अनियमितताओं की शिकायतें सामने आ रही हैं, वह केवल एक भवन या एक विभाग तक सीमित मामला नहीं लगता, बल्कि यह व्यवस्था की उस कमजोरी की ओर संकेत करता है जहां नियम तो हैं, लेकिन पालन सुनिश्चित करने की इच्छाशक्ति कमजोर पड़ती दिख रही है।
नियम क्या कहते हैं?

सरकारी निर्माण कार्यों में स्पष्ट प्रावधान होता है कि परियोजना की लागत और प्रकृति के अनुसार निर्माण स्थल पर योग्य तकनीकी स्टाफ—विशेषकर सिविल इंजीनियर—की तैनाती अनिवार्य है।
- निर्धारित राशि से ऊपर के कार्यों में साइट इंजीनियर, सुपरवाइजर और क्वालिटी कंट्रोल स्टाफ रखना होता है।
- नियमित साइट निरीक्षण, माप पुस्तिका का सत्यापन और सामग्री की गुणवत्ता जांच अनिवार्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
इन नियमों का उद्देश्य केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक धन से बनने वाली संरचनाएं टिकाऊ, सुरक्षित और मानकों के अनुरूप हों।
जमीनी हकीकत क्या है?
जिले के कई निर्माण स्थलों पर यह आरोप लग रहे हैं कि ठेकेदारों द्वारा नियमानुसार इंजीनियरों की नियुक्ति नहीं की जा रही। कई जगह कार्य मिस्त्री और मजदूरों के भरोसे चल रहा है। विभागीय इंजीनियरों की उपस्थिति सीमित समय तक ही देखी जाती है।
यदि किसी बहुमंजिला या महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन का निर्माण बिना निरंतर तकनीकी निगरानी के किया जा रहा है, तो यह केवल प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित जोखिम को आमंत्रण देना है।
भर्राशाही की जड़ कहां है?
निर्माण कार्यों में भर्राशाही (भ्रष्टाचार और मनमानी) का आरोप नया नहीं है, लेकिन जब नई-नई इमारतें कुछ वर्षों में ही जर्जर होने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अक्सर देखा गया है कि:
- लागत कम दिखाकर गुणवत्ता में समझौता किया जाता है।
- आवश्यक इंजीनियरों की नियुक्ति कागजों में दिखाकर वास्तविकता में खर्च बचाया जाता है।
- निरीक्षण प्रक्रिया को औपचारिकता तक सीमित कर दिया जाता है।
परिणामस्वरूप, दो से पांच वर्ष के भीतर मरम्मत और रखरखाव के नाम पर फिर से करोड़ों रुपये का बजट मांगा जाता है। यह सीधा-सीधा सार्वजनिक धन का दोहरा नुकसान है।
जिम्मेदारी किसकी?
यह केवल ठेकेदारों की जवाबदेही का प्रश्न नहीं है।
- विभागीय इंजीनियरों की निगरानी जिम्मेदारी है।
- वरिष्ठ अधिकारियों का दायित्व है कि वे पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करें।
- जिला प्रशासन की भूमिका है कि वह समय-समय पर स्वतंत्र जांच और सरप्राइज निरीक्षण कराए।
यदि किसी निर्माण स्थल पर नियमानुसार इंजीनियर तैनात नहीं हैं, तो यह स्पष्ट उल्लंघन है और इस पर त्वरित दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे वह निविदा निरस्तीकरण हो, ब्लैकलिस्टिंग हो या वित्तीय दंड।
समाधान क्या हो?
स्थिति को सुधारने के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं:
- स्वतंत्र गुणवत्ता जांच टीम का गठन – प्रमुख परियोजनाओं की तृतीय-पक्ष (थर्ड पार्टी) ऑडिट अनिवार्य की जाए।
- साइट पर इंजीनियरों की अनिवार्य उपस्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड – बायोमेट्रिक या जियो-टैग आधारित उपस्थिति प्रणाली लागू हो।
- सार्वजनिक निगरानी तंत्र – निर्माण स्थल पर लागत, समयसीमा और जिम्मेदार अधिकारियों की जानकारी बोर्ड पर प्रदर्शित की जाए।
- दोषियों पर उदाहरणात्मक कार्रवाई – ताकि भविष्य में मनमानी की पुनरावृत्ति न हो।
जनता का धन, जनता की अपेक्षा
सरकारी भवन केवल ईंट और सीमेंट का ढांचा नहीं होते, वे जनता की उम्मीदों का प्रतीक होते हैं। अस्पताल, पुस्तकालय, शैक्षणिक संस्थान और प्रशासनिक भवन—इनकी मजबूती सीधे तौर पर जनहित से जुड़ी है।
यदि प्रारंभिक निर्माण चरण में गुणवत्ता पर कठोर निगरानी रखी जाए, तो न केवल भवनों की आयु बढ़ेगी बल्कि जनता का भरोसा भी मजबूत होगा।
अब समय है कि जांजगीर-चांपा में निर्माण कार्यों को लेकर गंभीर मंथन हो। क्या हम भर्राशाही को व्यवस्था का हिस्सा मानकर चुप रहेंगे, या फिर पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में ठोस पहल करेंगे?
यह प्रश्न केवल प्रशासन के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है।