पहली शादी छिपाकर सात साल तक साथ रहा दंपती, रिश्ते में दरार के बाद लगा दुष्कर्म का आरोप; सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया आरोपों से मुक्त
NTN REPORT// नई दिल्ली। आपसी सहमति से बने लंबे संबंधों के टूटने के बाद लगाए गए दुष्कर्म के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से संबंध बने हों और वे लंबे समय तक साथ रहे हों, तो केवल रिश्ता खराब होने या समाप्त हो जाने के आधार पर पहले के सहमति से बने शारीरिक संबंधों को पीछे से दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता। हालांकि, यदि किसी महिला की सहमति वास्तविक धोखे, दबाव या छल से प्राप्त की गई हो, तो ऐसे मामलों में कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

यह मामला केरल के संतोष कुमार एन.पी. से जुड़ा है, जिसमें आरोप था कि उन्होंने अपनी पहली शादी और पारिवारिक स्थिति छिपाकर दूसरी महिला से विवाह किया और उसके साथ वर्षों तक पति-पत्नी की तरह रहे। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने 30 अक्टूबर 2026 को महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया।
क्या था पूरा मामला?
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला पहले से विवाहित थी और बाद में उसका तलाक हो चुका था। इसके बाद उसकी मुलाकात संतोष कुमार एन.पी. से हुई। महिला का आरोप था कि संतोष कुमार ने स्वयं को अविवाहित बताते हुए वर्ष 1996 में मैसूर (मैसुरु) के एक मंदिर में उससे विवाह किया।
महिला का कहना था कि उसे विश्वास दिलाया गया था कि वह उसकी कानूनी पत्नी है। इसी विश्वास के आधार पर दोनों के बीच वैवाहिक संबंध बने और वे वर्ष 1996 से 2003 तक लगभग सात वर्षों तक साथ रहे।
महिला ने आरोप लगाया कि संतोष कुमार पहले से विवाहित थे और उनके दो बच्चे भी थे, लेकिन उन्होंने यह महत्वपूर्ण तथ्य उससे छिपाया था। महिला के अनुसार, यदि उसे पहले विवाह की जानकारी होती तो वह इस रिश्ते में आगे नहीं बढ़ती।
पहली शादी की जानकारी मिलने के बाद भी सात साल तक साथ रहने का तथ्य बना अहम
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आया कि महिला को संतोष कुमार की पहली शादी की जानकारी कब हुई थी।
अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के अनुसार, महिला को कथित विवाह के कुछ महीनों के भीतर ही आरोपी के भाई ने बता दिया था कि संतोष कुमार पहले से विवाहित हैं और उनके बच्चे भी हैं।
इसके बावजूद महिला उनके साथ रहती रही। दोनों के बीच वर्ष 2003 तक संबंध जारी रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी तथ्य को विशेष महत्व दिया। अदालत ने कहा कि जब महिला को पहले विवाह की जानकारी मिल चुकी थी और इसके बावजूद वह वर्षों तक साथ रही, तो यह मानना कठिन है कि वह लगातार स्वयं को आरोपी की कानूनी पत्नी समझती रही।
अदालत ने पूरे रिश्ते की परिस्थितियों को एक साथ देखने पर जोर दिया, न कि केवल रिश्ते के अंत में लगाए गए आरोपों के आधार पर निष्कर्ष निकालने पर।
रिश्ता टूटने के बाद दर्ज हुई घरेलू हिंसा और आपराधिक शिकायत
मामले के अनुसार, वर्ष 2003 में दोनों का साथ समाप्त हो गया। इसके बाद महिला ने वर्ष 2008 में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई, जिसे वर्ष 2009 में खारिज कर दिया गया।
इसके बाद महिला ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत निजी शिकायत दर्ज कराई। पहली शिकायत अभियोजन पक्ष की अनुपस्थिति के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में दूसरी शिकायत के आधार पर पुलिस को जांच के निर्देश दिए गए और प्राथमिकी दर्ज हुई।
इस मामले में दुष्कर्म, धोखाधड़ी, महिला को वैध विवाह का विश्वास दिलाने और पहले से विवाहित रहते हुए दूसरा विवाह करने से संबंधित आरोप लगाए गए।
आरोपी ने इन आरोपों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया और मुकदमे का सामना करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं होने का तर्क देते हुए आरोपमुक्त करने की मांग की।
ट्रायल कोर्ट और केरल हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत
आरोपी ने निचली अदालत में आरोपमुक्त किए जाने की याचिका दायर की थी, लेकिन 9 जनवरी 2015 को ट्रायल कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद उसने केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी। 21 मई 2025 को हाईकोर्ट ने भी उसे राहत देने से इनकार कर दिया।
इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने 18 जुलाई 2025 को मामले की सुनवाई के दौरान मुकदमे की कार्यवाही पर रोक लगाई थी।
अंततः 30 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के आदेशों को निरस्त करते हुए आरोपी को संबंधित आरोपों से आरोपमुक्त कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि किसी रिश्ते के समाप्त हो जाने से उसके दौरान आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को स्वतः दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी रिश्ते का मूल्यांकन उसकी पूरी अवधि और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल रिश्ते के अंत में उत्पन्न विवाद को आधार बनाकर पहले के सभी संबंधों को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
पीठ के अनुसार, यदि कोई संबंध लंबे समय तक आपसी सहमति से चलता रहा और बाद में उसमें कड़वाहट आ गई, तो केवल इसी आधार पर पहले की सहमति को अपराध में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को रिश्ता समाप्त करने का अधिकार है। हालांकि, इस अधिकार का अर्थ यह नहीं है कि वास्तविक धोखे, जबरदस्ती या यौन शोषण के मामलों को नजरअंदाज किया जाए।
बार-बार संबंध बनाने के आरोप पर भी अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एन) के तहत एक ही महिला के साथ बार-बार दुष्कर्म करने का आरोप भी लगाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत अपराध साबित करने के लिए केवल अलग-अलग समय पर शारीरिक संबंध बनने का तथ्य पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना आवश्यक है कि प्रत्येक संबंध के पीछे सहमति की वास्तविक स्थिति क्या थी और क्या उसमें भय, दबाव, जबरदस्ती या धोखे की भूमिका थी।
अदालत ने पाया कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर इस मामले में लंबे समय तक चले संबंध को बार-बार किए गए दुष्कर्म के रूप में देखने का पर्याप्त आधार नहीं था।
धोखाधड़ी और दूसरे विवाह से जुड़ी धाराओं पर भी विचार
सुप्रीम कोर्ट ने केवल दुष्कर्म के आरोपों पर ही नहीं, बल्कि भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं पर भी विचार किया।
- धारा 376: दुष्कर्म से संबंधित आरोपों के लिए आवश्यक कानूनी आधार उपलब्ध सामग्री से स्थापित नहीं हुआ।
- धारा 420: धोखाधड़ी के इस अपराध के लिए संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति के संबंध में आवश्यक बेईमान प्रलोभन का आधार नहीं मिला।
- धारा 493: महिला को छलपूर्वक वैध विवाह का विश्वास दिलाकर सहवास करने के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं हुए।
- धारा 494: पहले से जीवित वैवाहिक संबंध के दौरान दूसरे विवाह से संबंधित अपराध के आवश्यक तत्वों का पर्याप्त आधार नहीं मिला।
- धारा 495: पूर्व विवाह छिपाकर दूसरा विवाह करने के आरोप के लिए भी अदालत को मुकदमा जारी रखने योग्य पर्याप्त सामग्री नहीं मिली।
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को संबंधित आरोपों से आरोपमुक्त कर दिया।
अदालत ने महिलाओं की गरिमा और वास्तविक यौन अपराधों पर भी जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण संतुलन भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और सम्मान से जुड़ा गंभीर अपराध है। वास्तविक यौन शोषण के मामलों में पीड़िताओं को न्याय मिलना बेहद आवश्यक है।
अदालत ने यह भी कहा कि कई मामलों में सामाजिक दबाव और परिवार की प्रतिष्ठा के कारण महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से पीछे हट जाती हैं। इसलिए वास्तविक यौन अपराधों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
लेकिन दूसरी ओर, यदि किसी रिश्ते के समाप्त होने के बाद आपसी विवाद को दबाव बनाने या बदले की कार्रवाई के लिए आपराधिक मुकदमे का रूप दिया जाता है, तो न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को भी रोकना आवश्यक है।
फैसले का क्या है व्यापक कानूनी संदेश?
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि हर असफल प्रेम संबंध या लंबे समय तक चले सहमति आधारित संबंध को बाद में दुष्कर्म का मामला नहीं बनाया जा सकता।
हालांकि, इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि शादी का झूठा वादा करके, पहले से विवाहित होने की जानकारी छिपाकर या किसी महिला की सहमति को छलपूर्वक प्राप्त करके बनाए गए संबंधों में आपराधिक जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। ऐसे मामलों में प्रत्येक घटना के तथ्य, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य निर्णायक होते हैं।
इस फैसले में अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि न्यायालयों को किसी रिश्ते का मूल्यांकन समग्र परिस्थितियों के आधार पर करना चाहिए।
फैसले का सार: सुप्रीम कोर्ट ने संतोष कुमार एन.पी. को भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 420, 493, 494 और 495 के तहत लगाए गए आरोपों से आरोपमुक्त करते हुए ट्रायल कोर्ट और केरल हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों को निरस्त कर दिया।
मामला: Santhosh Kumar N.P. बनाम State-Station House Officer, Kadirur Police, Tellicherry, Kannur District एवं अन्य।
निर्णय की तारीख: 30 अक्टूबर 2026।
न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय।
न्यायिक संदर्भ: 2026 INSC 1179।
यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।