
‘जौहर करने वाली वीरांगनाओं को कायर कहना’ इतिहास के बलिदान का अपमान? स्वरा भास्कर की टिप्पणी पर उठे तीखे सवाल
NTN REPORT// अभिनेत्री स्वरा भास्कर की ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य को लेकर की गई टिप्पणी ने एक बार फिर इतिहास, महिला सम्मान और राजपूत वीरांगनाओं के बलिदान को लेकर बहस छेड़ दी है। हालिया कार्यक्रम में भास्कर ने फिल्म में दिखाए गए जौहर को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कोई बलात्कार पीड़िता जीवित रहने का निर्णय लेती है तो उसे कायर महसूस नहीं कराया जाना चाहिए। उन्होंने जौहर के दृश्य को समस्याग्रस्त बताया।

उनकी इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। आलोचकों का कहना है कि आज के सामाजिक और नैतिक मानदंडों को मध्यकालीन युद्धों की परिस्थितियों पर सीधे लागू करके जौहर करने वाली महिलाओं के साहस को ‘कायरता’ के रूप में देखना इतिहास के संदर्भ को नजरअंदाज करना है।
जौहर को समझने के लिए उस दौर की परिस्थितियों को समझना जरूरी
मध्यकालीन भारत में किलों पर होने वाले युद्ध केवल राजाओं और सैनिकों के बीच सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं थे। किसी किले के अंतिम रूप से शत्रु के कब्जे में जाने की स्थिति में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा का प्रश्न भी अत्यंत गंभीर होता था। राजपूत इतिहास की परंपरा में ऐसे चरम संकट के समय महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश कर शत्रु के हाथों बंदी बनने और संभावित अपमान से बचने की घटनाओं को ‘जौहर’ के रूप में जाना जाता है।
इसे आज की सामान्य परिस्थितियों में आत्महत्या के सामान्य उदाहरण के रूप में देखना इतिहास के उस विशेष युद्धकालीन संदर्भ को सरल बना देना होगा। वहीं, आधुनिक दृष्टिकोण से जौहर जैसी त्रासद घटनाओं पर सवाल उठाना भी संभव है। लेकिन सवाल उठाने और उन महिलाओं को अपमानजनक शब्दों से संबोधित करने में स्पष्ट अंतर है।
चित्तौड़ की धरती आज भी सुनाती है बलिदान की कहानी
राजस्थान पर्यटन विभाग भी चित्तौड़गढ़ को राजपूताना के साहस, गौरव और बलिदान की कहानियों से जुड़ा ऐतिहासिक स्थल बताता है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने अपने इतिहास में कई बड़े हमले झेले—1303 में अलाउद्दीन खिलजी, 1535 में गुजरात के बहादुर शाह और 1568 में अकबर के आक्रमण इसके प्रमुख अध्याय हैं।
चित्तौड़गढ़ के इतिहास में जौहर की घटनाएं इसी युद्ध और घेराबंदी की पृष्ठभूमि से जुड़ी हुई हैं। राजस्थान पर्यटन की आधिकारिक जानकारी में राणा कुंभा महल के संदर्भ में भी रानी पद्मिनी और अन्य महिलाओं द्वारा जौहर किए जाने की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख मिलता है।
रानी पद्मिनी से आगे है राजपूत वीरांगनाओं का इतिहास
जौहर की चर्चा अक्सर रानी पद्मिनी के नाम तक सीमित कर दी जाती है, जबकि राजपूत इतिहास में महिलाओं के साहस और त्याग की परंपरा कहीं व्यापक है। चित्तौड़ और जैसलमेर सहित राजस्थान के विभिन्न दुर्गों से जौहर की परंपरा जुड़ी हुई है। इन घटनाओं में महिलाओं ने उस समय की युद्ध परिस्थितियों में अपने सामने मौजूद बेहद कठिन विकल्पों का सामना किया।
यहां यह तथ्य भी ध्यान रखना आवश्यक है कि रानी पद्मिनी से संबंधित कई लोकप्रिय विवरण साहित्यिक परंपरा, विशेषकर मलिक मोहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’, से जुड़े हैं और उनके ऐतिहासिक विवरणों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। इसलिए इतिहास को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत करते समय प्रमाणित इतिहास और लोक-स्मृति के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
‘कायर’ शब्द पर सबसे बड़ा सवाल
विवाद का मूल प्रश्न यही है कि क्या आज की दृष्टि से मध्यकालीन परिस्थितियों में लिए गए किसी अत्यंत कठिन निर्णय को ‘कायरता’ कह देना उचित है?
जिन महिलाओं ने जौहर किया, उनके सामने परिस्थितियां सामान्य नहीं थीं। वे युद्ध, घेराबंदी और पराजय की स्थिति में थीं। इसलिए उनके निर्णय से सहमत या असहमत होने से अलग उन महिलाओं को ‘कायर’ कहकर उनका अपमान करना ऐतिहासिक संदर्भ और उनके निर्णय की परिस्थितियों को नजरअंदाज करना माना जा सकता है।
दूसरी ओर, किसी भी यौन हिंसा की पीड़िता को जीवित रहने के लिए दोषी या कम साहसी मानना भी गलत है। बलात्कार पीड़िता का जीवन उतना ही मूल्यवान है और उसे सम्मान के साथ जीने का पूरा अधिकार है। इस आधुनिक सिद्धांत और मध्यकालीन जौहर की ऐतिहासिक व्याख्या को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय दोनों को उनके अलग-अलग संदर्भों में समझना अधिक उचित होगा।
इतिहास का सम्मान जरूरी, लेकिन इतिहास की आलोचनात्मक समझ भी
स्वरा भास्कर की टिप्पणी पर असहमति जताना पूरी तरह लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इस बहस को व्यक्तिगत गाली-गलौज में बदलने के बजाय इतिहास के तथ्य और संदर्भ सामने रखने की जरूरत है।
राजपूत वीरांगनाओं के जौहर को कोई व्यक्ति आधुनिक दृष्टिकोण से स्वीकार करे या उसकी आलोचना करे, लेकिन उन महिलाओं के साहस, त्याग और उस समय की भयावह परिस्थितियों को समझे बिना उन्हें ‘कायर’ कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं करता।
इतिहास केवल राजाओं की तलवारों और युद्धों का दस्तावेज नहीं है। उस इतिहास में वे महिलाएं भी हैं जिन्होंने युद्ध की विभीषिका के बीच अपने जीवन के सबसे कठिन निर्णय लिए। उनके निर्णयों को समझने के लिए उस युग की परिस्थितियों को समझना होगा।
यही इतिहास के प्रति वास्तविक सम्मान है—न अंधा महिमामंडन, न ही संदर्भविहीन अपमान।
नोट: स्वरा भास्कर की हालिया टिप्पणी के संबंध में उपलब्ध समाचार रिपोर्टों में उनके अपने शब्दों का संदर्भ ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य और बलात्कार पीड़िताओं के जीवन के अधिकार से जुड़ा है। इसलिए उन्हें सीधे यह कहते हुए प्रस्तुत करना कि उन्होंने सभी ऐतिहासिक जौहर करने वाली महिलाओं को “कायर” कहा, मूल टिप्पणी की तुलना में व्यापक निष्कर्ष होगा।