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धर्म

पत्नी को पति के बाईं ओर स्थान देने की परंपरा के पीछे क्या है रहस्य? स्वर विज्ञान और भारतीय संस्कृति का अनोखा संबंध

भारतीय परंपरा में पत्नी को क्यों दिया जाता है ‘वामांग’ का स्थान?

NTN REPORT// भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं में पत्नी को सदैव पति के बाईं ओर स्थान देने की परंपरा रही है। विवाह संस्कार, पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक आयोजनों में भी पत्नी प्रायः पति के बाईं ओर बैठती या खड़ी दिखाई देती है। सामान्य रूप से इसे परंपरा माना जाता है, लेकिन भारतीय स्वर विज्ञान और योग शास्त्र में इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक, ऊर्जात्मक और मनोवैज्ञानिक कारण बताए गए हैं।

फाइल फोटो

स्वर विज्ञान क्या कहता है?

स्वर विज्ञान प्राचीन भारतीय योग परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसमें शरीर में प्रवाहित होने वाली प्राण ऊर्जा और श्वास की गति का अध्ययन किया जाता है। स्वर विज्ञान के अनुसार मानव शरीर में मुख्य रूप से तीन नाड़ियों का वर्णन मिलता है—

  • इड़ा नाड़ी
  • पिंगला नाड़ी
  • सुषुम्ना नाड़ी

इड़ा नाड़ी: चंद्र ऊर्जा का प्रतीक

इड़ा नाड़ी शरीर के बाएं भाग से संबंधित मानी जाती है। इसे चंद्र स्वर कहा जाता है। यह शीतलता, प्रेम, संवेदनशीलता, करुणा, मानसिक शांति और स्त्री ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है।

पिंगला नाड़ी: सूर्य ऊर्जा का स्वरूप

पिंगला नाड़ी शरीर के दाएं भाग से जुड़ी होती है। इसे सूर्य स्वर कहा जाता है, जो ऊर्जा, निर्णय क्षमता, सक्रियता और पुरुष तत्व का प्रतिनिधित्व करती है।

पत्नी को बाईं ओर रखने के पीछे ऊर्जा संतुलन का सिद्धांत

स्वर विज्ञान के अनुसार स्त्री स्वभावतः चंद्र ऊर्जा की प्रतीक मानी गई है। इसी कारण पत्नी को पति के बाईं ओर स्थान देने की परंपरा विकसित हुई। मान्यता है कि जब पत्नी पति के बाईं ओर रहती है, तब दोनों की ऊर्जाएं संतुलित रहती हैं और दांपत्य जीवन में सामंजस्य बना रहता है।

इस स्थिति में पति की इड़ा नाड़ी और पत्नी की पिंगला ऊर्जा एक संतुलित ऊर्जा चक्र का निर्माण करती है। इसे मानसिक शांति, भावनात्मक जुड़ाव और पारिवारिक सुख-शांति के लिए लाभकारी माना गया है।

विवाह संस्कारों में भी दिखती है यह परंपरा

हिंदू विवाह में सात फेरे, पूजा-पाठ और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान भी पत्नी का स्थान पति के बाईं ओर निर्धारित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच आध्यात्मिक और ऊर्जात्मक सामंजस्य का प्रतीक माना जाता है।

‘अर्धांगिनी’ और ‘वामांगिनी’ शब्दों का महत्व

भारतीय ग्रंथों में पत्नी को ‘अर्धांगिनी’ कहा गया है, जिसका अर्थ है पति का आधा अंग। वहीं ‘वामांगिनी’ शब्द यह दर्शाता है कि पत्नी पति के वाम अर्थात बाएं अंग में स्थान रखती है।

मान्यता है कि मानव शरीर में हृदय बाईं ओर स्थित होता है, इसलिए पत्नी को बाईं ओर स्थान देना प्रेम, आत्मीयता और भावनात्मक निकटता का प्रतीक माना गया है।

शिव-शक्ति सिद्धांत से भी जुड़ा है संबंध

आध्यात्मिक दृष्टि से शिव और शक्ति का सिद्धांत भी इसी संतुलन पर आधारित माना जाता है। शिव को चेतना और शक्ति को ऊर्जा का स्वरूप बताया गया है। दोनों के समन्वय से ही सृष्टि और जीवन का संचालन संभव माना जाता है।

स्वर विज्ञान इसी सिद्धांत को दांपत्य जीवन में भी आवश्यक बताता है, जहां पति और पत्नी एक-दूसरे की पूरक ऊर्जा माने जाते हैं।

आधुनिक समय में भी कायम है परंपरा

आज के समय में भले ही लोग इन परंपराओं को केवल धार्मिक रिवाज मानते हों, लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा में इनके पीछे गहरा मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार बताया गया है। स्वर विज्ञान के अनुसार पति-पत्नी की यह स्थिति केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि ऊर्जा संतुलन, पारिवारिक सामंजस्य और वैवाहिक स्थिरता का प्रतीक मानी जाती है।

डिस्क्लेमर: स्वर विज्ञान और इससे जुड़ी मान्यताएं भारतीय आध्यात्मिक एवं पारंपरिक ज्ञान पर आधारित हैं। आधुनिक विज्ञान इन सिद्धांतों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता।

यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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