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राजनीति

ममता बनर्जी के लिए 2026 की सबसे कठिन परीक्षा: शुभेंदु अधिकारी से सीधी टक्कर, SIR और हिंसा के साए में बंगाल चुनाव

NTN NEWS REPORT// पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 मुख्यमंत्री के लिए अब तक की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा बनता जा रहा है। राज्य में दो चरणों में मतदान होना है—पहला चरण 23 अप्रैल और दूसरा चरण 29 अप्रैल को। जिस तरह चुनावी माहौल में हर मोर्चे पर चुनौतियां खड़ी हुई हैं, उससे यह चुनाव ममता बनर्जी की लोकप्रियता पर जनमत संग्रह जैसा माना जा रहा है।


भवानीपुर में सीधी टक्कर, नंदीग्राम की यादें ताजा

फाइल फोटो

ममता बनर्जी 8 अप्रैल को भवानीपुर सीट से नामांकन दाखिल कर रही हैं। इसी सीट पर बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी मैदान में हैं। 2021 में नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 1,956 वोटों से हराया था। ऐसे में भवानीपुर की लड़ाई प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी है।


SIR पर सियासी संग्राम, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

चुनाव से पहले चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने सियासत गरमा दी। ममता बनर्जी ने इस प्रक्रिया को साजिश करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन रोक नहीं लग सकी।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार:

  • कुल 90.66 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए
  • यह राज्य के कुल मतदाताओं का 11.85% है
  • 60 लाख से ज्यादा मामलों को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर जांच में रखा गया
  • करीब 32.68 लाख नाम दोबारा जोड़े गए
  • 27.16 लाख नाम अपात्र घोषित कर हटाए गए

दिसंबर 2025 के ड्राफ्ट में 58.2 लाख नाम हटाए गए थे। फरवरी 2026 तक 5.46 लाख और नाम हटे। न्यायिक समीक्षा के बाद 27 लाख से अधिक नाम हटाने का अंतिम फैसला लिया गया।


किन जिलों पर सबसे ज्यादा असर?

SIR में हटाए गए नामों में से करीब 60% सिर्फ छह जिलों—मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना—से हैं। इन जिलों की 115 विधानसभा सीटों में से 93 सीटें 2021 में तृणमूल कांग्रेस के पास थीं।

नंदीग्राम में 2,826 नाम कटे, जिनमें 95.5% मुस्लिम समुदाय के बताए गए हैं। मतुआ और राजबंशी समुदायों के बीच भी असंतोष की चर्चा है, खासकर उत्तर 24 परगना और नदिया जिलों में।

ममता बनर्जी का आरोप है कि SIR के जरिए खास समुदायों को निशाना बनाया गया। उनका दावा है कि सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप और राजनीतिक दबाव के कारण ही 32 लाख से ज्यादा नाम दोबारा जोड़े जा सके।


प्रशासनिक फेरबदल और मालदा हिंसा

चुनाव आयोग ने डीजीपी से लेकर थानेदार स्तर तक व्यापक तबादले किए हैं। मुख्य सचिव, बीडीओ और सहायक निर्वाचन अधिकारियों तक को बदला गया है। आयोग का तर्क है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए यह कदम जरूरी था।

मालदा हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य प्रशासन को फटकार लगाते हुए जांच NIA को सौंप दी। अदालत ने इसे प्रशासनिक नाकामी बताया।


चुनावी मैदान में आंदोलन के चेहरे

बीजेपी और सीपीएम ने आरजी कर रेप-मर्डर केस से जुड़े आंदोलनकारी चेहरों को टिकट दिया है। पानीहाटी से रत्ना देबनाथ बीजेपी उम्मीदवार हैं, जबकि सीपीएम ने जादवपुर से बिकाश रंजन भट्टाचार्य, नॉर्थ दमदम से दिप्शिता धर और उत्तरपारा से मीनाक्षी मुखर्जी को मैदान में उतारा है।

बीजेपी महिला सुरक्षा और संदेशखाली जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस SIR और कथित मतदाता वंचना को बड़ा मुद्दा बना रही है।


कांग्रेस की अलग राह

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाली थी। बंगाल में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही है, हालांकि बिहार जैसा आंदोलन यहां नहीं दिखा।


‘जनमत संग्रह’ क्यों कहा जा रहा है यह चुनाव?

ममता बनर्जी ने एक रैली में कहा कि लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाया जाना लोकतंत्र के लिए खतरा है। उनका आरोप है कि मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यक समुदायों को जानबूझकर निशाना बनाया गया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:

  • यदि तमाम विवादों, प्रशासनिक फेरबदल और केंद्रीय एजेंसियों की जांच के बीच भी तृणमूल कांग्रेस सत्ता में लौटती है,
  • तो यह ममता बनर्जी की राजनीतिक स्वीकार्यता की बड़ी मुहर होगी।

2026 का यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की साख, संगठन क्षमता और जनाधार की अंतिम परीक्षा माना जा रहा है।

पश्चिम बंगाल की सियासत में यह मुकाबला अब व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, प्रशासनिक निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों के सवालों से जुड़ चुका है। परिणाम चाहे जो हो, 2026 का चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा तय करेगा।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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