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भारत का बड़ा लक्ष्य: 2035 तक वैश्विक बीज कारोबार में 10% हिस्सेदारी हासिल करने की तैयारी

NTN REPORT// नई दिल्ली। भारत को दुनिया के प्रमुख बीज उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल करने की दिशा में बीज उद्योग ने बड़ा लक्ष्य तय किया है। फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अनुसार, भारत की वैश्विक बीज कारोबार में हिस्सेदारी वर्तमान में करीब 1 प्रतिशत है, जिसे वर्ष 2035 तक बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए बीज अनुसंधान, नई तकनीक, निजी निवेश और नियामकीय सुधारों पर विशेष जोर देने की जरूरत बताई गई है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

2030 तक 5 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकता है भारतीय बीज बाजार

नई दिल्ली में आयोजित FSII नॉलेज डे 2026 में बीज उद्योग के भविष्य, अनुसंधान, तकनीकी विकास और किसानों तक उन्नत बीजों की पहुंच को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। यह कार्यक्रम FSII की 10वीं वार्षिक आम बैठक के दौरान आयोजित किया गया।

FSII के मुताबिक भारत का मौजूदा बीज बाजार करीब 3.6 अरब डॉलर का है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारतीय बीज बाजार का आकार 5 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है। ऐसे में भारत के लिए घरेलू बाजार के साथ-साथ वैश्विक बीज कारोबार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं।

वैज्ञानिक क्षमता और बड़ा किसान आधार भारत की ताकत

FSII के चेयरमैन एवं सवाना सीड के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अजय राणा ने कहा कि भारत के पास वैश्विक बीज बाजार में अपनी भूमिका बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक क्षमता, प्रतिभाशाली मानव संसाधन और बड़ा किसान आधार मौजूद है।

उन्होंने विशेष रूप से तिलहन और दलहन जैसी फसलों में नई और बेहतर किस्में विकसित करने के लिए निजी क्षेत्र की ओर से अनुसंधान एवं विकास पर अधिक निवेश किए जाने की आवश्यकता बताई।

बीज क्षेत्र में नियमों को सरल बनाने की मांग

अजय राणा ने बीज क्षेत्र में लागू विभिन्न सरकारी नियमों को सरल और एकरूप बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में बीजों से संबंधित एक समान और स्पष्ट नियामकीय व्यवस्था होनी चाहिए।

नई किस्मों, बीजों के नए गुणों और नई तकनीकों को मंजूरी देने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय करने की जरूरत भी बताई गई। इसके अलावा अनुसंधान करने वाली कंपनियों के बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) की बेहतर सुरक्षा पर भी जोर दिया गया।

उनके अनुसार, मजबूत बौद्धिक संपदा संरक्षण से कंपनियों को नई तकनीक और बेहतर बीज विकसित करने के लिए दीर्घकालिक निवेश का भरोसा मिलेगा।

कृषि अनुसंधान पर खर्च बढ़ाने की जरूरत

FSII ने कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास यानी आरएंडडी पर खर्च बढ़ाने की आवश्यकता भी रेखांकित की। अजय राणा के मुताबिक विकसित अर्थव्यवस्थाएं अपने सकल घरेलू उत्पाद का करीब 3 से 4 प्रतिशत अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करती हैं, जबकि भारत में यह हिस्सा अभी 1 प्रतिशत से कम है।

बीज उद्योग का मानना है कि कृषि अनुसंधान में निवेश बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन, बदलते मौसम, कीट-रोग और बढ़ती खाद्य जरूरतों के अनुरूप नई किस्में विकसित की जा सकती हैं।

खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता पर भी जोर

कार्यक्रम में भारत की खाद्य तेलों में आयात निर्भरता का मुद्दा भी उठाया गया। अजय राणा ने कहा कि सरकार और बीज उद्योग मिलकर काम करें तो अगले दशक में भारत खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति कर सकता है।

उन्होंने बताया कि बीज उद्योग द्वारा विकसित कुछ सरसों की संकर किस्में प्रति एकड़ करीब एक टन तक उत्पादन देने में सक्षम हैं। हालांकि ऐसी तकनीकों और किस्मों का व्यापक लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिए अनुसंधान, परीक्षण, उपलब्धता और तकनीकी मार्गदर्शन को मजबूत करना जरूरी होगा।

किसानों तक समय पर पहुंचनी चाहिए नई बीज तकनीक

नेशनल फार्मर्स एम्पावरमेंट इनिशिएटिव के संयोजक और प्रगतिशील किसान किशोर जायसवाल ने कहा कि किसान नई तकनीक को तब तेजी से अपनाते हैं, जब उन्हें उसका प्रत्यक्ष लाभ अपने खेत में दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि किसानों को दुनिया के अन्य देशों के किसानों की तरह नई और बेहतर बीज तकनीक समय पर उपलब्ध कराना जरूरी है। इसके लिए अनुसंधान संस्थानों, बीज कंपनियों, सरकार और किसानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।

93 प्रतिशत किसानों ने अपनाए हाइब्रिड बीज

कार्यक्रम में सब्जी उत्पादन में उन्नत बीजों के इस्तेमाल और किसानों की आय पर इसके प्रभाव को लेकर भी चर्चा हुई।

एक रिपोर्ट के अनुसार, पांच प्रमुख सब्जी उत्पादक राज्यों में किए गए सर्वेक्षण में शामिल 93 प्रतिशत किसान हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं करीब 68 प्रतिशत किसान बीज खरीदने के लिए डीलरों पर निर्भर पाए गए।

सर्वे में किसानों के लिए बीज की गुणवत्ता, उचित कीमत और समय पर उपलब्धता को सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल किया गया।

उन्नत बीजों से निवेश पर 2.7 गुना रिटर्न

सर्वे के मुताबिक इन किसानों की प्रति एकड़ औसत खेती लागत करीब 1.07 लाख रुपये रही, जबकि निवेश पर औसत रिटर्न 2.7 गुना पाया गया।

वहीं 85 प्रतिशत किसानों ने माना कि बेहतर बीजों के इस्तेमाल से उनकी फसल में खराब मौसम और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने की क्षमता बढ़ी है। यह आंकड़ा उन्नत बीज तकनीक की भूमिका को लेकर किसानों के अनुभव को दर्शाता है।

बीज उद्योग ने बताई तीन बड़ी प्राथमिकताएं

FSII ने भारत को वैश्विक बीज कारोबार में मजबूत स्थिति दिलाने के लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं सामने रखी हैं—

1. नियमों का सरलीकरण और एकरूपता
बीजों से जुड़े नियमों को आसान बनाने और पूरे देश में अधिक स्पष्ट एवं एक समान व्यवस्था विकसित करने पर जोर।

2. अनुसंधान और नई तकनीक को बढ़ावा
बीजों की नई किस्मों, विशेषकर तिलहन, दलहन और अन्य महत्वपूर्ण फसलों में अनुसंधान एवं विकास के लिए निवेश बढ़ाने की आवश्यकता।

3. बौद्धिक संपदा अधिकारों की मजबूत सुरक्षा
नई बीज तकनीक और किस्मों को विकसित करने वाली कंपनियों के बौद्धिक संपदा अधिकारों की बेहतर सुरक्षा, ताकि निजी क्षेत्र अनुसंधान में अधिक निवेश कर सके।

2035 का लक्ष्य कितना महत्वपूर्ण?

भारत का बीज उद्योग 2035 तक वैश्विक बीज कारोबार में अपनी हिस्सेदारी करीब 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। इसके लिए घरेलू बीज बाजार के विस्तार के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों का विकास, अनुसंधान में निवेश, नई तकनीकों को अपनाना, किसानों तक समय पर बीज पहुंचाना और निर्यात क्षमता बढ़ाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बीज उद्योग का कहना है कि यदि अनुसंधान, तकनीक, नियामकीय व्यवस्था और बौद्धिक संपदा संरक्षण के स्तर पर आवश्यक सुधार किए जाते हैं, तो भारत के बीज क्षेत्र को वैश्विक बाजार में विस्तार का अवसर मिल सकता है।

अस्वीकरण: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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