
जांजगीर-चांपा के ऑडिटोरियम पर सवाल: कुछ ही वर्षों में मरम्मत की नौबत, करोड़ों के खर्च के बीच निर्माण की गुणवत्ता और जवाबदेही पर उठे प्रश्न!
हैंडओवर की प्रक्रिया पर भी असमंजस, सरकारी और निजी आयोजनों की शुल्क व्यवस्था स्पष्ट करने की जरूरत; कलेक्टर के निरीक्षण के साथ जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करने की मांग
NTN REPORT// जांजगीर-चांपा। जिले में शासकीय ऑडिटोरियम के निर्माण और उसकी वर्तमान स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आ रहे हैं। निर्माण कार्य को अभी कुछ ही वर्ष हुए हैं, लेकिन अब भवन की मरम्मत और सुविधाओं को दुरुस्त करने की आवश्यकता बताई जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने कम समय में भवन की ऐसी स्थिति क्यों बनी और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है?
ऑडिटोरियम जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन में जिले के शासकीय कार्यक्रमों के साथ विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य आयोजन होते हैं। यहां जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और आम नागरिकों का आवागमन भी रहता है। ऐसे में भवन की गुणवत्ता, सुरक्षा और रखरखाव सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि निर्माण के कुछ ही वर्षों के भीतर व्यापक मरम्मत की आवश्यकता पड़ रही है, तो निर्माण कार्य की गुणवत्ता और उसके तकनीकी परीक्षण की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल, जिम्मेदारी किसकी?
किसी भी शासकीय निर्माण कार्य में निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन सुनिश्चित करना संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों का दायित्व होता है। निर्माण के दौरान सामग्री की गुणवत्ता, तकनीकी मापदंडों, कार्य की प्रगति और निर्धारित समयसीमा की निगरानी आवश्यक है।
जांजगीर-चांपा के ऑडिटोरियम की वर्तमान स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों के बीच यह स्पष्ट होना चाहिए कि भवन निर्माण में किन तकनीकी मानकों का पालन किया गया था। निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच किस अधिकारी ने की? भवन को उपयोग के लिए उपयुक्त घोषित करने से पहले कौन-कौन से परीक्षण किए गए? यदि अब मरम्मत की आवश्यकता है, तो इसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं?
यदि जांच में निर्माण संबंधी अनियमितताएं या गुणवत्ता मानकों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
हैंडओवर नहीं हुआ तो संचालन किस व्यवस्था के तहत?
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण प्रश्न भवन के हस्तांतरण को लेकर भी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, ऑडिटोरियम के हस्तांतरण की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने की पुष्टि नहीं हो पाई है। यदि भवन संबंधित विभाग अथवा नगर पालिका को विधिवत हस्तांतरित नहीं किया गया है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वर्तमान में उसका संचालन किस विभाग या एजेंसी की जिम्मेदारी में हो रहा है।
जब किसी सरकारी भवन का निर्माण पूरा होता है, तो उसके हस्तांतरण, रखरखाव, बिजली-पानी के खर्च, साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्पष्ट होना आवश्यक है। यदि हस्तांतरण की प्रक्रिया लंबित है, तो इसके कारणों और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भवन की मरम्मत पर अब करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की आवश्यकता पड़ रही है, तो निर्माण के बाद उसकी गुणवत्ता और स्थिति का आकलन किस स्तर पर किया गया था?
मरम्मत के लिए करोड़ों रुपये, पुराने निर्माण की जांच क्यों नहीं?
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, ऑडिटोरियम की व्यवस्था सुधारने और मरम्मत कार्य के लिए बड़ी धनराशि उपलब्ध कराई गई है। बताया जा रहा है कि कलेक्टर ने भवन का निरीक्षण कर आवश्यक व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के निर्देश भी दिए हैं।
हालांकि, मरम्मत के लिए धनराशि उपलब्ध कराना और व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना आवश्यक हो सकता है, लेकिन इसके साथ यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि भवन को इतनी जल्दी मरम्मत की आवश्यकता क्यों पड़ी।
क्या निर्माण कार्य के दौरान गुणवत्ता संबंधी कमियां रह गई थीं? क्या निर्माण के बाद भवन का नियमित निरीक्षण किया गया? क्या ठेकेदार की ओर से निर्धारित अवधि में दोषों को दूर करने की कोई जिम्मेदारी बनती है? क्या निर्माण की गुणवत्ता की जांच के लिए स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण कराया गया है?
इन सवालों के जवाब सामने आए बिना केवल मरम्मत कराना समस्या का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। यदि निर्माण में किसी प्रकार की लापरवाही हुई है, तो उसकी जवाबदेही तय करना भी आवश्यक है, ताकि सरकारी धन पर दोबारा अनावश्यक बोझ न पड़े।
सरकारी और निजी आयोजनों की शुल्क व्यवस्था भी स्पष्ट हो
ऑडिटोरियम में विभिन्न प्रकार के आयोजन होने की जानकारी सामने आती रही है। बताया जाता है कि निजी संस्थाओं और अन्य आयोजकों से कार्यक्रम के लिए शुल्क अथवा रसीद के माध्यम से राशि ली जाती है। वहीं, सूत्रों के अनुसार कुछ शासकीय विभागों के आयोजनों में रसीद काटे जाने की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
ऐसे में यह जानना जरूरी है कि ऑडिटोरियम में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए क्या नियम निर्धारित हैं? सरकारी विभागों, निजी संस्थाओं और अन्य आयोजकों के लिए शुल्क की क्या व्यवस्था है? क्या सभी आयोजनों का रिकॉर्ड रखा जाता है? यदि कुछ आयोजनों के लिए शुल्क नहीं लिया जाता, तो क्या उसके लिए कोई लिखित नियम या शासकीय आदेश है?
यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आयोजन से प्राप्त राशि किस मद में जमा होती है और भवन के बिजली बिल, पंखों, प्रकाश व्यवस्था, साफ-सफाई तथा रखरखाव का खर्च किस मद से वहन किया जाता है।
यदि सरकारी विभागों को नियमानुसार शुल्क में छूट दी जाती है, तो उस व्यवस्था का लिखित आधार सार्वजनिक किया जाना चाहिए। पारदर्शिता के लिए आयोजनों का विवरण, शुल्क निर्धारण के नियम और आय-व्यय का लेखा-जोखा उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है।
साफ-सफाई की जिम्मेदारी किसकी, रखरखाव का खर्च कौन उठाएगा?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ऑडिटोरियम परिसर में साफ-सफाई का कार्य नगर पालिका द्वारा कराया जाता है। हालांकि, भवन के संपूर्ण रखरखाव और अन्य खर्चों की जिम्मेदारी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं बताई जा रही है।
यदि नगर पालिका साफ-सफाई की जिम्मेदारी निभा रही है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि बिजली, पानी, मरम्मत और अन्य आवश्यक सुविधाओं का खर्च किस विभाग द्वारा वहन किया जाता है।
किसी भी सार्वजनिक भवन के संचालन में जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण होना चाहिए। यदि विभागों के बीच समन्वय का अभाव है, तो उसका सीधा असर भवन की व्यवस्था और सरकारी संसाधनों के उपयोग पर पड़ सकता है।
पीडब्ल्यूडी के अधिकारी का जवाब
इस संबंध में लोक निर्माण विभाग के एसडीओ सूर्यवंशी से चर्चा की गई। उन्होंने बताया कि उन्हें इस विषय में फिलहाल पूरी जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि संभवतः भवन के हस्तांतरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। मामले को देखकर जानकारी देने की बात भी कही गई।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग भवन के निर्माण, वर्तमान स्थिति, हस्तांतरण और मरम्मत से जुड़े सवालों पर क्या आधिकारिक जानकारी उपलब्ध कराता है।
कलेक्टर के निरीक्षण के साथ जवाबदेही तय करना भी जरूरी
जिले के कलेक्टर द्वारा ऑडिटोरियम की व्यवस्था सुधारने के लिए निरीक्षण और आवश्यक निर्देश देना महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन जनता के सामने उठ रहे सवालों का समाधान केवल मरम्मत कार्य पूरा कर देने से नहीं होगा।
यदि भवन की स्थिति वास्तव में निर्माण संबंधी खामियों के कारण खराब हुई है, तो तकनीकी जांच कराकर संबंधित ठेकेदार और अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट की जानी चाहिए। यदि किसी स्तर पर अनियमितता, लापरवाही या शासकीय धन के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
साथ ही, भवन के हस्तांतरण की स्थिति, मरम्मत पर प्रस्तावित खर्च, तकनीकी जांच की रिपोर्ट, आयोजन शुल्क की व्यवस्था और रखरखाव की जिम्मेदारी से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
जनता के धन का हिसाब देना जरूरी
सरकारी भवन केवल ईंट, सीमेंट और लोहे से बनी संरचना नहीं होते, बल्कि वे प्रशासनिक कार्यप्रणाली और सार्वजनिक धन के उपयोग की पारदर्शिता का भी प्रतीक होते हैं। विकास कार्यों के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई राशि का उपयोग निर्धारित गुणवत्ता और उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए।
जांजगीर-चांपा के ऑडिटोरियम के मामले में भी यही अपेक्षा है कि निर्माण से लेकर वर्तमान मरम्मत तक के पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा हो। यदि निर्माण में कोई कमी नहीं थी, तो मरम्मत की आवश्यकता के वास्तविक कारण स्पष्ट किए जाएं। यदि गुणवत्ता संबंधी खामियां या अनियमितताएं सामने आती हैं, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो।
अब सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन ऑडिटोरियम की मरम्मत के साथ उसके पुराने निर्माण कार्य की भी तकनीकी जांच कराएगा? क्या भवन के हस्तांतरण और संचालन की स्थिति सार्वजनिक होगी? और यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो क्या संबंधित अधिकारियों एवं ठेकेदार के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी?
इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है, ताकि सरकारी धन का सदुपयोग सुनिश्चित हो और भविष्य में किसी अन्य शासकीय भवन को इतनी जल्दी मरम्मत की आवश्यकता न पड़े।