
NTN NEWS REPORT// लखनऊ/इलाहाबाद। की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने एफआईआर की भाषा और घटनाक्रम को “फिल्मी पटकथा से प्रेरित” बताते हुए कहा कि आपराधिक मामलों में एक तयशुदा, अतिरंजित स्क्रिप्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है और ऐसे मामले “बाएं-दाएं” दर्ज किए जा रहे हैं।

यह टिप्पणी जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ ने हरदोई जिले के एक मामले में की, जहां यूपी गो-वध निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर को चुनौती दी गई थी।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “पुलिस स्क्रिप्ट से एफआईआर लिख रही है”
खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह अकेला मामला नहीं है। हाल के दिनों में भी ऐसी एफआईआर सामने आई हैं जिनमें पुलिस द्वारा लगभग एक जैसी, फिल्मी अंदाज वाली भाषा का इस्तेमाल किया गया। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रतीत होता है जैसे पुलिस के पास कोई तैयार स्क्रिप्ट है, जिसे मामूली बदलाव के साथ बार-बार प्रयोग किया जा रहा है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का दुरुपयोग और अतिरंजित एफआईआर न्याय व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, इसलिए ऐसे मामलों की गंभीरता से जांच आवश्यक है।
FIR में ‘फिल्मी अंदाज’ का उल्लेख
एफआईआर के अनुसार, पुलिस को एक अधूरे मकान में गो-वध की सूचना मिली थी। मौके पर पहुंचने पर कथित रूप से आरोपियों द्वारा फिल्मी शैली में संवाद बोले जाने का उल्लेख किया गया, जैसे—
- “पुलिस आ गई है, भागो”
- “पुलिस वाले बिना मारे पीछा नहीं छोड़ेंगे”
एफआईआर में यह भी दर्ज है कि एक सब-इंस्पेक्टर पर गोली चलाई गई, जो “कान के पास से सनसनाती हुई निकल गई।” जवाबी फायरिंग में एक आरोपी के कथित रूप से चिल्लाने— “हाय, गोली लग गई”— का भी जिक्र है।
घायल आरोपी द्वारा गो-वंश लाने की बात कबूल करने और याचिकाकर्ता को साथी बताने का उल्लेख भी एफआईआर में किया गया है, जो मौके से फरार बताया गया।
याचिकाकर्ता को राहत
अदालत ने अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया (prima facie) अपराध बनता हुआ प्रतीत नहीं होता, क्योंकि गो-वध की घटना सिद्ध नहीं हुई है। ऐसे में यूपी गो-वध निवारण अधिनियम की धाराएं तथा बीएनएस या आर्म्स एक्ट के तहत अपराध बनना संदिग्ध है।
एसएसपी से व्यक्तिगत हलफनामा तलब
अदालत ने हरदोई के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। हलफनामे में एफआईआर की कमियों और विसंगतियों पर स्पष्ट स्पष्टीकरण देने को कहा गया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो संबंधित एसएसपी को रिकॉर्ड सहित व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।
गो-वंश निजी व्यक्ति को सौंपने पर सवाल
अदालत ने पुलिस द्वारा बरामद गो-वंश को घटनास्थल से दूर रहने वाले एक निजी व्यक्ति को सौंपे जाने पर भी आपत्ति जताई। कोर्ट ने पूछा कि यह कार्रवाई किस कानूनी प्रावधान के तहत की गई।
राज्य की ओर से यह स्वीकार किया गया कि बरामदगी का कोई अलग मेमो तैयार नहीं किया गया था, जिस पर अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त की।
न्यायालय का संदेश
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि आपराधिक न्याय प्रणाली में तथ्यों की सटीकता और निष्पक्षता सर्वोपरि है। अतिरंजित और कथित रूप से फिल्मी अंदाज में लिखी गई एफआईआर न केवल जांच की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करती है।
मामले की अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर होगी।