Advertisment
देशराज्य एवं शहर

UGC के नए ‘समानता विनियम 2026’ पर उठे सवाल, सामान्य वर्ग में बढ़ी चिंता

NTN REPORT//  विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में लागू किए जा रहे समानता विनियम 2026 को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। UGC का दावा है कि यह नियम SC/ST, OBC, EWS और दिव्यांग छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से लाया गया है, लेकिन सामने आए तथ्यों और प्रावधानों के आधार पर सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के बीच गंभीर आशंकाएं उभरकर सामने आ रही हैं।

2023-24 के आंकड़े क्या कहते हैं?

UGC रिपोर्ट 2023-24 के अनुसार, देश में कुल 1153 विश्वविद्यालय, 48,291 कॉलेज और लगभग 4.20 करोड़ छात्र उच्च शिक्षा से जुड़े हैं। इसी अवधि में जातिगत भेदभाव से जुड़ी कुल शिकायतें 704 विश्वविद्यालयों और 1553 कॉलेजों से दर्ज हुईं। यदि SC/ST, OBC, EWS और दिव्यांग छात्रों की संख्या को कुल छात्रों का लगभग 50% (करीब 2.10 करोड़ छात्र) माना जाए, तो भेदभाव से संबंधित शिकायतों का प्रतिशत महज 0.0018% निकलता है। इन आंकड़ों के आधार पर सवाल उठ रहे हैं कि जब शिकायतों का अनुपात इतना कम है, तब क्या कठोर और व्यापक नियमों की वास्तव में जरूरत थी?झूठी शिकायतों पर कोई सख्ती नहीं

नए नियमों में सबसे बड़ा विवादित बिंदु यह है कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर न तो जुर्माने का प्रावधान है और न ही निलंबन जैसी कार्रवाई का। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे शिकायतों की संख्या कृत्रिम रूप से बढ़ सकती है और शिक्षकों व संस्थानों पर अनावश्यक दबाव बनेगा। आलोचकों का कहना है कि बिना प्राथमिक जांच के कार्रवाई की आशंका से शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो सकता है और शिक्षक “डर के माहौल” में काम करने को मजबूर होंगे।

9 सदस्यीय समिति पर भी सवाल

UGC के नए प्रावधानों के तहत शिकायतों की सुनवाई के लिए 9 सदस्यीय समिति का गठन किया जाएगा। इसमें संस्थान प्रमुख, 3 प्रोफेसर, 1 कर्मचारी, 2 सामान्य नागरिक और 2 विशेष आमंत्रित छात्र शामिल होंगे। हालांकि, आलोचना यह है कि 5 सीटें SC/ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं के लिए आरक्षित रखी गई हैं, जबकि सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इससे निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं और एकतरफा निर्णय की आशंका जताई जा रही है।

“समानता” की परिभाषा पर बहस

UGC का कहना है कि यह नियम समानता सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि समानता का अर्थ सभी वर्गों के लिए समान न्याय और समान प्रक्रिया होना चाहिए। यदि किसी भी वर्ग के खिलाफ भेदभाव की संभावना को बिना संतुलन के स्वीकार किया गया, तो इससे नए प्रकार का असंतुलन पैदा हो सकता है।

सामान्य वर्ग में बढ़ती चिंता

सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक संगठनों का कहना है कि:

  • छोटी-छोटी बातों को भेदभाव बताकर शिकायतें की जा सकती हैं।
  • एकतरफा कार्रवाई से करियर और प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है।
  • नियमों में संतुलन और जवाबदेही का अभाव है।

UGC के समानता विनियम 2026 का उद्देश्य भेदभाव खत्म करना है, लेकिन मौजूदा आंकड़े और प्रावधान यह संकेत देते हैं कि नियमों में पुनर्विचार और संतुलन जरूरी है। यदि सभी वर्गों की चिंताओं को समान रूप से सुना और संबोधित नहीं किया गया, तो यह नियम समानता के बजाय नए विवादों को जन्म दे सकता है। अब देखना यह होगा कि UGC इन उठते सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या नियमों में आवश्यक संशोधन किए जाते हैं या नहीं।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
Back to top button
error: Content is protected !!