
बीमा दावा खारिज करना पड़ा भारी: उपभोक्ता आयोग ने टाटा एआईए लाइफ इंश्योरेंस को 19.92 लाख भुगतान का आदेश
बीमा अवधि में मृत्यु के बावजूद दावा निरस्त करना सेवा में कमी करार 45 दिनों में भुगतान नहीं हुआ तो 7% वार्षिक ब्याज भी देना होगा
NTN NEWS REPORT// जांजगीर-चांपा। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग जांजगीर-चांपा ने एक अहम फैसले में बीमा कंपनी द्वारा बीमा दावा निरस्त किए जाने को सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार करार देते हुए टाटा एआईए लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को उपभोक्ता के पक्ष में बड़ा भुगतान करने का आदेश दिया है।
आयोग ने आदेश दिया है कि बीमा कंपनी उपभोक्ता/शिकायतकर्ता को बीमा राशि 19,92,510 रुपये (उन्नीस लाख बयानवे हजार पांच सौ दस रुपये), मुकदमे का खर्च 5,000 रुपये तथा मानसिक क्षतिपूर्ति के रूप में 20,000 रुपये का भुगतान आदेश की तिथि से 45 दिनों के भीतर करेगी। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं करने की स्थिति में आदेशित राशि पर आदेश दिनांक से भुगतान दिनांक तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
मामले का संक्षिप्त विवरण : प्रकरण के अनुसार अनिल कुमार यादव पिता सम्मेलाल, निवासी वार्ड क्रमांक 6 नया बाराद्वार, जिला सक्ती की पत्नी रम्बीका यादव ने अपने जीवनकाल में टाटा एआईए लाइफ इंश्योरेंस कंपनी से “संपूर्ण रक्षक” बीमा पॉलिसी ली थी। यह पॉलिसी दिनांक 23 अगस्त 2022 से 23 अगस्त 2023 तक प्रभावी थी, जिसमें अनिल कुमार यादव नामिनी थे। बीमा के लिए 8,838 रुपये का प्रीमियम जमा किया गया था।
बीमा अवधि के दौरान 27 जनवरी 2023 को बीमाधारक रम्बीका यादव की सीने में दर्द होने से मृत्यु हो गई। इसके पश्चात नामिनी द्वारा बीमा राशि प्राप्त करने हेतु कंपनी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया गया।
बीमा कंपनी का दावा और निरस्तीकरण : बीमा कंपनी ने 5 अगस्त 2024 को यह कहते हुए बीमा दावा निरस्त कर दिया कि बीमित महिला ने बीमा लेने से पूर्व अपने चिकित्सा इतिहास को छिपाया था और वह गर्भाशय संबंधी दर्द से पीड़ित थी। कंपनी ने प्रीमियम राशि में से 7,490 रुपये लौटाते हुए शेष बीमा राशि देने से इनकार कर दिया।
आयोग का फैसला : बीमा दावा खारिज किए जाने से आहत होकर उपभोक्ता ने जिला उपभोक्ता आयोग जांजगीर-चांपा में परिवाद प्रस्तुत किया। प्रकरण की सुनवाई अध्यक्ष प्रशांत कुंडू तथा सदस्य विशाल तिवारी और महिमा सिंह द्वारा की गई।
दोनों पक्षों के शपथ पत्र, दस्तावेजों और तर्कों का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद आयोग ने यह पाया कि बीमाधारक ने बीमा लेते समय कोई गलत जानकारी नहीं दी थी और वह बीमा लेने से पूर्व किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित नहीं थी। आयोग ने स्पष्ट रूप से माना कि बीमा कंपनी ने बिना उचित कारण के बीमा राशि देने से इनकार किया, जो सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार की श्रेणी में आता है।
कानूनी आधार : आयोग ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 35 के अंतर्गत परिवाद को स्वीकार करते हुए बीमा कंपनी के विरुद्ध उक्त आदेश पारित किया।
यह निर्णय बीमा कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से दावे निरस्त किए जाने के मामलों में उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।