NTN REPORT// नई दिल्ली। देश के प्रतिष्ठित और एलीट क्लबों को सरकारी जमीन पर मिलने वाली रियायती लीज और विशेष सुविधाओं को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। इसकी शुरुआत दिल्ली जिमखाना क्लब को केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए उस नोटिस से हुई है, जिसमें क्लब को 5 जून तक 27 एकड़ सरकारी भूमि खाली करने को कहा गया है। सरकार का तर्क है कि इस भूमि की आवश्यकता रक्षा ढांचे और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए है।

इस घटनाक्रम के बाद मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और वाराणसी सहित देश के कई प्रतिष्ठित क्लबों की लीज व्यवस्था और सरकारी जमीन पर उनके अधिकारों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। एक ओर आलोचक इन संस्थानों को मिले विशेषाधिकारों की समीक्षा की मांग कर रहे हैं, वहीं समर्थकों का कहना है कि ये क्लब खेल, रोजगार, सामाजिक गतिविधियों और देश की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
दिल्ली जिमखाना क्लब को मिला जमीन खाली करने का नोटिस
प्रधानमंत्री आवास के समीप स्थित दिल्ली जिमखाना क्लब देश के सबसे प्रतिष्ठित क्लबों में गिना जाता है। केंद्र सरकार ने क्लब को 5 जून तक 27 एकड़ भूमि खाली करने का निर्देश दिया है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार इस भूमि का उपयोग रक्षा अवसंरचना और अन्य सार्वजनिक हित की परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित है। इस कार्रवाई के बाद यह प्रश्न उठने लगा है कि राजधानी के सबसे महंगे और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थित सरकारी जमीनों का उपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए और क्या एलीट क्लबों को लंबे समय तक रियायती शर्तों पर इतनी बड़ी भूमि उपलब्ध रहनी चाहिए।
मात्र ₹1000 वार्षिक लीज पर संचालित हो रहा है क्लब
दिल्ली जिमखाना क्लब लुटियंस दिल्ली क्षेत्र में स्थित है और यह लगभग ₹1,000 वार्षिक किराए पर सरकारी भूमि की लीज का लाभ उठाता रहा है। क्लब पूर्व में भी प्रबंधन विवादों, सदस्यता प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर चर्चा में रहा है।
ताजा विवाद के बाद देशभर के कई क्लबों में चिंता का माहौल है। क्लब प्रबंधन और सदस्यों को आशंका है कि सरकार भविष्य में अन्य संस्थानों की लीज और भूमि उपयोग की भी व्यापक समीक्षा कर सकती है।
दिल्ली गोल्फ क्लब भी बहस के केंद्र में
दिल्ली जिमखाना विवाद के साथ ही दिल्ली गोल्फ क्लब का नाम भी चर्चा में आ गया है। राजधानी के मध्य स्थित लगभग 170 एकड़ सरकारी भूमि पर फैले इस क्लब की लीज वर्ष 2050 तक वैध है।
क्लब परिसर में कई ऐतिहासिक स्मारक मौजूद हैं, जिनमें से कुछ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में हैं। हालांकि इन स्मारकों तक आम नागरिकों की पहुंच सीमित होने के कारण सार्वजनिक उपयोग और विरासत संरक्षण को लेकर भी बहस जारी है।
मुंबई के प्रतिष्ठित क्लबों में बढ़ी चिंता
दिल्ली जिमखाना मामले के बाद मुंबई के कई प्रतिष्ठित जिमखानों और क्लबों पर भी सरकारी नजर बढ़ गई है। मरीन ड्राइव और मरीन लाइंस क्षेत्र के अनेक क्लबों को कलेक्टर कार्यालय से नोटिस प्राप्त हुए हैं।
राज्य सरकार की प्रस्तावित जिमखाना नीति पर चर्चा के लिए 29 मई को विभिन्न क्लबों के प्रतिनिधियों की बैठक बुलाई गई थी। अधिकारियों ने इसे नियमित समीक्षा प्रक्रिया बताया है, लेकिन बैठक के बाद कई क्लबों ने अपने लीज दस्तावेजों और रिकॉर्ड की दोबारा जांच शुरू कर दी है।
लीज शुल्क और स्टांप ड्यूटी को लेकर क्लबों की चिंता
मुंबई के क्लबों की प्रमुख चिंता लीज शुल्क में प्रतिवर्ष 4 प्रतिशत वृद्धि, लीज नवीनीकरण पर भारी स्टांप ड्यूटी और विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर है।
क्लबों का कहना है कि 30 वर्ष की लीज के नवीनीकरण पर लगभग 4 करोड़ रुपये तक की स्टांप ड्यूटी का भुगतान करना पड़ सकता है। इसके अलावा कई क्लब ऐतिहासिक इमारतों में संचालित होते हैं, जिनके रखरखाव पर पहले से ही भारी खर्च आता है।
इन मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए पारसी, हिंदू, इस्लाम, कैथोलिक और पुलिस जिमखाना सहित कई संस्थानों के प्रतिनिधियों ने संयुक्त रणनीति बनाने हेतु बैठक भी की है।
ऐतिहासिक क्लबों पर भी टिकी निगाहें
मुंबई के बॉम्बे जिमखाना, पारसी जिमखाना, हिंदू जिमखाना और इस्लाम जिमखाना लंबे समय से खेल और सामाजिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र रहे हैं। हालांकि फिलहाल इन पर किसी प्रकार की तत्काल कार्रवाई की संभावना नहीं बताई गई है, लेकिन दिल्ली जिमखाना विवाद के बाद इनकी लीज और भूमि उपयोग व्यवस्था की समीक्षा को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
इसी तरह ब्रीच कैंडी क्लब भी सरकारी भूमि पर संचालन और पुराने ट्रस्ट ढांचे से जुड़े सवालों के कारण चर्चा में बना हुआ है।
हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई के क्लब भी चर्चा में
दिल्ली जिमखाना मामले के बाद देश के अन्य बड़े शहरों के प्रतिष्ठित क्लबों का भविष्य भी बहस का विषय बन गया है।
हैदराबाद का निजाम क्लब और हैदराबाद जिमखाना, बेंगलुरु का बैंगलोर क्लब तथा चेन्नई का मद्रास क्लब दशकों पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थान हैं। इन क्लबों की सदस्यता में बड़ी संख्या में प्रभावशाली लोग शामिल हैं।
हालांकि इन संस्थानों के खिलाफ फिलहाल कोई कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन सरकारी भूमि पर संचालित क्लबों की लीज और विशेष सुविधाओं की समीक्षा की संभावना ने चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
वाराणसी का बनारस क्लब भी रहा है विवादों में
इस बहस का असर छोटे शहरों तक भी दिखाई दे रहा है। वाराणसी का 128 वर्ष पुराना बनारस क्लब पूर्व में भूमि विवादों का सामना कर चुका है।
वर्ष 2011 में प्रशासन ने क्लब को कुछ विवादित भूखंड खाली करने का आदेश दिया था। हाल के वर्षों में कुछ अधिवक्ता संगठनों ने क्लब के आसपास की भूमि को जिला न्यायालय के विस्तार के लिए उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई है।
विरासत संरक्षण बनाम विशेषाधिकार की बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में क्लब और जिमखाने केवल सामाजिक मेलजोल के केंद्र नहीं हैं, बल्कि उन्होंने खेलों के विकास और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मुंबई के कई जिमखानों ने भारतीय क्रिकेट के शुरुआती विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। इसके अलावा ये संस्थान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को रोजगार भी उपलब्ध कराते हैं।
इतिहासकार स्वप्ना लिडल का कहना है कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संस्थानों को समय के साथ बदलने और अधिक समावेशी बनने की आवश्यकता है, लेकिन उन्हें पूरी तरह समाप्त करना उचित नहीं होगा। वहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी का मानना है कि ये क्लब भारत की खेल और सामाजिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, इसलिए सुधार और पारदर्शिता के साथ इन्हें आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिल्ली जिमखाना विवाद
दिल्ली जिमखाना क्लब को जारी नोटिस ने सरकारी भूमि के उपयोग, सार्वजनिक हित, विरासत संरक्षण और विशेषाधिकारों के संतुलन को लेकर देशव्यापी चर्चा छेड़ दी है। आने वाले समय में यह बहस देश के अन्य प्रतिष्ठित क्लबों की कार्यप्रणाली, लीज व्यवस्था और सरकारी जमीनों के उपयोग से जुड़ी नीतियों को भी प्रभावित कर सकती है।
यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।