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भारत

बरसात में गायों पर बढ़ जाता है बीमारियों का खतरा, समय रहते टीकाकरण और देखभाल से बचाया जा सकता है बड़ा नुकसान

NTN REPORT// नई दिल्ली। देश के दुग्ध उत्पादन में गायों की महत्वपूर्ण भूमिका है। आंकड़ों के अनुसार देश में भैंसों की तुलना में गायों की संख्या अधिक है और दूध उत्पादन में भी गायों का बड़ा योगदान है। विशेष रूप से देसी नस्ल की गायों के दूध से तैयार होने वाला घी अपनी गुणवत्ता के कारण बाजार में ऊंचे दाम पर बिकता है। ऐसे में पशुओं का स्वस्थ रहना सीधे तौर पर पशुपालकों की आय से जुड़ा हुआ है।विशेषज्ञों के अनुसार बरसात का मौसम गायों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इस दौरान नमी, गंदगी, जलभराव और संक्रमण के कारण कई संक्रामक एवं जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। यदि समय रहते टीकाकरण, स्वच्छता और पशु चिकित्सक की सलाह का पालन किया जाए तो अधिकांश बीमारियों से बचाव संभव है।

बरसात में होने वाली प्रमुख बीमारियां और उनके लक्षण

1. गलघोंटू बुखार

इस बीमारी में गाय को सांस लेने में कठिनाई होती है तथा गले में सूजन आ जाती है। समय पर एंटीबायोटिक दवाओं और चिकित्सकीय उपचार से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। बरसात शुरू होने से पहले टीकाकरण कराना सबसे प्रभावी बचाव माना जाता है।

2. थनैला (मैस्टाइटिस)

थनों में सूजन, दर्द, दूध में छर्रे या गांठें आना तथा दूध की गुणवत्ता में गिरावट इसके प्रमुख लक्षण हैं। पशु के थनों और दूध की नियमित जांच कराते रहना तथा स्वच्छ दुग्ध दोहन अपनाना जरूरी है। आवश्यकता पड़ने पर पशु चिकित्सक दवाएं देते हैं।

3. लंगड़ा बुखार

इस रोग में पशु को 106 से 107 डिग्री तक तेज बुखार हो सकता है। पैरों में सूजन आ जाती है और पशु लंगड़ाकर चलने लगता है। समय पर टीकाकरण तथा बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना आवश्यक है।

4. मिल्क फीवर

यह बीमारी आमतौर पर प्रसव के बाद देखने को मिलती है। शरीर का तापमान कम हो जाता है और सांस लेने में परेशानी होने लगती है। विशेषज्ञ प्रसव के बाद लगभग 15 दिनों तक पूरा दूध न निकालने तथा कैल्शियम युक्त आहार और सप्लीमेंट देने की सलाह देते हैं।

5. खुरपका-मुंहपका रोग

इस बीमारी में मुंह और खुरों में दाने निकलते हैं, जो बाद में फटकर गहरे घाव का रूप ले लेते हैं। रोग के लक्षण दिखाई देते ही पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। बरसात से पहले टीकाकरण और बारिश के दौरान संक्रमित क्षेत्रों में चराई से बचाव जरूरी है।

6. प्लीहा (एंथ्रेक्स)

इस गंभीर बीमारी में तेज बुखार के साथ पेशाब और गोबर में खून आने की समस्या हो सकती है। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। समय पर टीकाकरण ही इसका सबसे प्रभावी बचाव है।

7. यक्ष्मा (टीबी)

इस रोग में पशु सुस्त रहने लगता है, सूखी खांसी आती है और कुछ मामलों में नाक से खून भी निकल सकता है। लक्षण दिखने पर तुरंत पशु चिकित्सालय में जांच एवं उपचार कराना चाहिए। पौष्टिक आहार भी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।

8. संक्रामक गर्भपात (ब्रुसेलोसिस)

गर्भधारण के पांच से छह महीने बाद योनिमुख से तरल पदार्थ निकलना, प्रसव जैसे लक्षण दिखना और बाद में गर्भपात हो जाना इसके प्रमुख संकेत हैं। पशुशाला की नियमित सफाई, डीवॉर्मिंग तथा पशु चिकित्सक की सलाह आवश्यक है। छह से आठ माह की आयु वाली मादा बछियों को ब्रुसेला का टीका लगवाना चाहिए।

9. अफारा (ब्लोट)

इस स्थिति में पशु का बायां पेट फूल जाता है और थपथपाने पर ढोलक जैसी आवाज सुनाई देती है। यह आपात स्थिति हो सकती है, इसलिए तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

बरसात में पशुपालक रखें इन बातों का विशेष ध्यान

  • समय पर सभी आवश्यक टीकाकरण कराएं।
  • पशुशाला को साफ, सूखा और जलभराव मुक्त रखें।
  • बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।
  • स्वच्छ पानी और संतुलित पौष्टिक आहार उपलब्ध कराएं।
  • नियमित रूप से डीवॉर्मिंग कराएं।
  • किसी भी असामान्य लक्षण पर स्वयं इलाज करने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।

पशुपालकों के लिए सलाह

विशेषज्ञों का कहना है कि बरसात के मौसम में थोड़ी सी लापरवाही भी पशुपालकों को आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है। समय पर टीकाकरण, स्वच्छता, संतुलित पोषण और नियमित स्वास्थ्य जांच के माध्यम से गायों को अधिकांश मौसमी बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे दूध उत्पादन और पशुओं का स्वास्थ्य दोनों बेहतर बने रहते हैं।

अस्वीकरण: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है। किसी भी बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर उपचार के लिए योग्य पशु चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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