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धर्म

17 मई से 15 जून तक रहेगा अधिक ज्येष्ठ मास, जानिए क्यों रुक जाते हैं शुभ कार्य और क्यों खास माना जाता है पुरुषोत्तम मास

NTN REPORT// सनातन परंपरा में समय को केवल तारीखों और दिनों का क्रम नहीं माना गया है, बल्कि इसे ब्रह्मांडीय संतुलन और खगोलीय गणना से जुड़ा एक गहरा विज्ञान माना जाता है. इसी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक परंपरा का सबसे विशेष उदाहरण अधिक मास है. इस वर्ष 17 मई से 15 जून तक अधिक ज्येष्ठ मास रहेगा. करीब 30 दिनों तक चलने वाला यह काल धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है, लेकिन पूजा-पाठ, तप, जप, दान और भगवान विष्णु की आराधना के लिए यह समय सबसे श्रेष्ठ माना गया है।

क्या होता है अधिक मास?

अधिक मास का आधार हिंदू पंचांग की खगोलीय गणना में छिपा हुआ है. हिंदू कैलेंडर सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति के आधार पर तैयार किया जाता है. सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का माना जाता है. इस प्रकार हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर पैदा हो जाता है.

यह अंतर लगातार बढ़ते-बढ़ते करीब तीन वर्षों में लगभग 33 दिनों तक पहुंच जाता है. पंचांग और ऋतु चक्र के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए तब एक अतिरिक्त माह जोड़ा जाता है. इसी अतिरिक्त महीने को अधिक मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है.

क्यों कहा जाता है पुरुषोत्तम मास?

पुराणों में अधिक मास से जुड़ी एक विशेष कथा का उल्लेख मिलता है. मान्यता के अनुसार जब यह अतिरिक्त महीना अस्तित्व में आया, तब किसी भी देवता ने इसे अपना महीना स्वीकार नहीं किया. सभी महीनों के अधिपति देवता थे, लेकिन इस महीने का कोई स्वामी नहीं था. अपमानित और दुखी होकर यह महीना भगवान विष्णु के पास पहुंचा.

तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया और कहा कि अब से यह सबसे श्रेष्ठ महीना कहलाएगा. साथ ही यह भी आशीर्वाद दिया कि जो व्यक्ति इस माह में भक्ति, पूजा, व्रत और दान करेगा उसे विशेष पुण्य प्राप्त होगा. तभी से अधिक मास को पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाने लगा.

क्यों नहीं किए जाते शुभ और मांगलिक कार्य?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास सांसारिक सुखों की बजाय आध्यात्मिक उन्नति के लिए निर्धारित किया गया है. यही कारण है कि इस दौरान विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे शुभ कार्यों को टालना शुभ माना जाता है.

इसके अलावा बड़े धार्मिक आयोजन और पितृ कर्म भी इस माह में नहीं किए जाते हैं. मान्यता है कि इस समय किए गए सांसारिक कार्य अपेक्षित शुभ फल नहीं देते. इसलिए लोग इस अवधि में भक्ति और साधना पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं.

अधिक मास में क्या करना माना जाता है शुभ?

शास्त्रों और पुराणों के अनुसार अधिक मास भगवान विष्णु की आराधना के लिए सबसे उत्तम समय माना गया है. इस दौरान विशेष रूप से निम्न कार्यों को शुभ बताया गया है —

  • भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा
  • जप, तप और व्रत
  • गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ
  • दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता
  • तीर्थ स्नान और सत्संग
  • आत्ममंथन और आध्यात्मिक साधना

मान्यता है कि पुरुषोत्तम मास में किए गए धार्मिक कार्यों का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है.

स्कंद पुराण में क्या कहा गया है?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार स्कंद पुराण में भगवान विष्णु ने स्वयं कहा है कि जो व्यक्ति अधिक मास में श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा, दान, व्रत और धार्मिक कार्य करता है, उसे सौ गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है. इसी वजह से यह महीना भक्ति और साधना के लिए बेहद पवित्र माना जाता है.

आत्ममंथन और भक्ति का विशेष काल

अधिक मास को केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन और आत्मचिंतन का अवसर भी माना जाता है. यह समय व्यक्ति को सांसारिक भागदौड़ से हटकर ईश्वर, साधना और आत्मशुद्धि की ओर प्रेरित करता है. इसलिए सनातन परंपरा में पुरुषोत्तम मास को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया गया है.

डिस्क्लेमर: धार्मिक मान्यताएं और जानकारियां विभिन्न ग्रंथों, पुराणों एवं पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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