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राजनीति

भोजपुर एनकाउंटर के बाद बिहार की राजनीति में नई हलचल: क्या फिर लौट रही है ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ की सियासत?

भोजपुर एनकाउंटर ने कानून-व्यवस्था से आगे बढ़कर छेड़ी राजनीतिक बहस

NTN REPORT// भोजपुर में भरत तिवारी के एनकाउंटर का मामला अब केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। इस घटना ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या राज्य में एक बार फिर अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण की स्थिति बन रही है।

भरत तिवारी, फाइल फोटो

एनकाउंटर के बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों की बैठकों, महापंचायतों की घोषणाओं और सोशल मीडिया पर चल रही तीखी बहस ने इस मामले को राजनीतिक रंग दे दिया है। अलग-अलग सामाजिक वर्ग इस घटना को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं, जबकि राजनीतिक दल भी पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

नेताओं की प्रतिक्रियाओं में भी दिखा सामाजिक विभाजन

इस मामले में नेताओं के बयान भी सामाजिक आधार पर अलग-अलग नजर आए। अगड़ी जाति से जुड़े नेताओं में मंत्री विजय कुमार सिन्हा और मिथिलेश तिवारी ने एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए सवाल उठाए। वहीं पिछड़ी जाति से जुड़े नेताओं, जिनमें दिलीप कुमार जायसवाल और पूर्व सांसद नागमणि शामिल हैं, ने भरत तिवारी की भूमिका पर सवाल खड़े किए।

इन बयानों ने राजनीतिक चर्चा को और तेज कर दिया है तथा यह संकेत दिया है कि मामला अब केवल एक पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है।

महापंचायतों की राजनीति और बढ़ा विवाद

भोजपुर एनकाउंटर के बाद अगड़ी जातियों की ओर से बिलौटी गांव में महापंचायत आयोजित की गई, जिसमें भरत तिवारी के लिए न्याय की मांग उठाई गई।

इसके जवाब में 5 जुलाई को पिछड़ी जातियों की ओर से बहुजन महापंचायत आयोजित करने की घोषणा की गई थी। इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के शामिल होने की भी घोषणा की गई थी। हालांकि बाद में इस महापंचायत को स्थगित कर दिया गया।

हालांकि कार्यक्रम स्थगित करने का आधिकारिक कारण अलग बताया गया, लेकिन राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि बिहार के मौजूदा संवेदनशील माहौल और संभावित जातीय तनाव को देखते हुए यह फैसला लिया गया। माना जा रहा है कि फिलहाल कोई भी राजनीतिक दल ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता जिससे सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका हो।

क्या लौट रही है 1990 के दशक की राजनीति?

भोजपुर एनकाउंटर के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या बिहार एक बार फिर 1990 के दशक की राजनीति की ओर बढ़ रहा है।

1990 का दशक बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति का दौर माना जाता है। उस समय सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आया था। पिछड़े और वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी, लेकिन इसके साथ कई क्षेत्रों में जातीय तनाव और सामाजिक वर्चस्व की लड़ाई भी देखने को मिली।

उस दौर में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे और उनकी राजनीति का प्रमुख आधार अगड़ा बनाम पिछड़ा का सामाजिक समीकरण था। इसी सामाजिक आधार पर राष्ट्रीय जनता दल ने लगभग 15 वर्षों तक बिहार की सत्ता पर शासन किया।

नीतीश कुमार के दौर में बदला राजनीतिक फोकस

वर्ष 2005 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की राजनीति में सामाजिक संतुलन और विकास को प्राथमिकता देने की रणनीति अपनाई गई। उन्होंने अत्यंत पिछड़ा वर्ग, महादलित, महिलाओं और अन्य सामाजिक समूहों को साथ लेकर चलने की कोशिश की।

पिछले दो दशकों में बिहार में जाति आधारित राजनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, लेकिन अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच खुला राजनीतिक टकराव पहले की तुलना में काफी कम दिखाई दिया। चुनावी रणनीतियों में जातीय समीकरण जरूर बने रहे, लेकिन राजनीतिक विमर्श में विकास, सुशासन और सामाजिक संतुलन को भी प्रमुख स्थान मिला।

सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक तेज हुई बहस

भोजपुर एनकाउंटर के बाद सोशल मीडिया पर लगातार बहस चल रही है। विभिन्न सामाजिक संगठनों की बैठकें, नेताओं के बयान और महापंचायतों की घोषणाओं ने यह संकेत दिया है कि जातीय पहचान का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में चुनावी रणनीतियों में जातीय समीकरण हमेशा अहम भूमिका निभाते रहे हैं और सभी दल अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश करते हैं।

आगे क्या होगा?

हालांकि केवल भोजपुर एनकाउंटर के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि बिहार पूरी तरह 1990 के दशक की राजनीति में लौट गया है। वर्तमान समय में रोजगार, शिक्षा, पलायन, विकास और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भोजपुर एनकाउंटर ने बिहार में जातीय राजनीति की पुरानी बहस को फिर से जीवित कर दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह मुद्दा कुछ समय बाद शांत हो जाता है या फिर 2029 के लोकसभा चुनाव और 2030 के बिहार विधानसभा चुनाव तक राज्य की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना रहता है।

डिस्क्लेमर: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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