तमिलनाडु की सत्ता बदली, दिल्ली की सियासत में नई हलचल! डीएमके को एनडीए में लाने की कोशिश में भाजपा!
तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के बाद बदले राजनीतिक समीकरण
NTN REPORT// दक्षिण भारत की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानी डीएमके सत्ता से बाहर हो चुकी है और थलापति विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार ने राज्य की कमान संभाल ली है। विजय के मुख्यमंत्री बनने के बाद सिर्फ चेन्नई ही नहीं बल्कि दिल्ली की राजनीति में भी नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं।

राज्य में सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़ते हुए विजय सरकार को समर्थन दे दिया और सरकार में शामिल हो गई। कांग्रेस के इस फैसले को एम.के.स्टालिन के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
कांग्रेस से दूरी बनाकर इंडिया ब्लॉक से अलग हुई DMK
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद डीएमके ने कांग्रेस से अपने रिश्ते खत्म कर लिए। पार्टी ने लोकसभा में कांग्रेस से अलग बैठने के लिए स्पीकर ओम बिरला को पत्र भी सौंप दिया है। इसके साथ ही डीएमके ने विपक्षी इंडिया गठबंधन से खुद को अलग करने का संकेत दे दिया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के विजय सरकार के साथ जाने से डीएमके खुद को राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग महसूस कर रही है, जिसके चलते अब नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं।
DMK पर BJP की नजर, NDA में शामिल करने की रणनीति शुरू
तमिलनाडु की बदलती राजनीति के बीच अब भाजपा ने डीएमके को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के करीब लाने की कवायद तेज कर दी है।
सूत्रों के मुताबिक बीजेपी की नजर डीएमके के 22 लोकसभा सांसदों और 8 राज्यसभा सांसदों पर है। पार्टी मानती है कि अगर डीएमके का समर्थन मिल जाता है तो संसद में कई बड़े संवैधानिक विधेयकों को पारित कराना आसान हो सकता है।
हालांकि सनातन धर्म और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर डीएमके और बीजेपी की विचारधारा पूरी तरह अलग मानी जाती है, इसलिए औपचारिक गठबंधन की संभावना फिलहाल कम दिखाई दे रही है। ऐसे में बीजेपी पर्दे के पीछे से “मुद्दों के आधार पर समर्थन” का रास्ता तलाश रही है।
दो-तिहाई बहुमत के लिए BJP का बड़ा मिशन
केंद्र की एनडीए सरकार संसद में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा मजबूत करना चाहती है। इसके पीछे कई बड़े संवैधानिक और राजनीतिक एजेंडे बताए जा रहे हैं।
बताया जा रहा है कि सरकार भविष्य में “वन नेशन-वन इलेक्शन”, परिसीमन, न्यायिक सुधार और महिला आरक्षण जैसे बड़े फैसलों को बिना किसी संवैधानिक अड़चन के लागू करना चाहती है। इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है।
वर्तमान में एनडीए के पास बहुमत तो है, लेकिन वह दो-तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े से अभी भी दूर माना जा रहा है। ऐसे में डीएमके के सांसदों का समर्थन बीजेपी के लिए बेहद अहम हो सकता है।
अटल युग की तरह फिर करीब आ सकती हैं BJP और DMK?
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि डीएमके पहले भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा रह चुकी है। ऐसे में दोनों दलों के बीच संवाद की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा रहा।
बीजेपी रणनीतिकारों का मानना है कि जैसे बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और बीआरएस समय-समय पर मुद्दों के आधार पर केंद्र सरकार का समर्थन करते रहे हैं, उसी तरह डीएमके भी संसद में रणनीतिक सहयोग दे सकती है।
पर्दे के पीछे समर्थन की तैयारी
सूत्रों के अनुसार बीजेपी फिलहाल डीएमके में टूट कराने के बजाय पूरी पार्टी का समर्थन हासिल करने पर फोकस कर रही है। पार्टी का मानना है कि सांसदों की संख्या के लिहाज से सामूहिक समर्थन ज्यादा प्रभावी रहेगा।
इसी वजह से सीधे गठबंधन की घोषणा करने के बजाय बैकडोर सपोर्ट मॉडल पर चर्चा चल रही है, ताकि वैचारिक टकराव के बावजूद संसद में सहयोग का रास्ता खुला रहे।
राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ सकता है बड़ा असर
अगर डीएमके और एनडीए के बीच किसी तरह की समझ बनती है तो इसका असर सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इससे विपक्षी एकजुटता को झटका लग सकता है और केंद्र सरकार को संसद में अपनी ताकत और बढ़ाने का मौका मिल सकता है।
हालांकि फिलहाल दोनों दलों की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन दिल्ली से चेन्नई तक चल रही सियासी हलचल ने आने वाले दिनों की राजनीति को बेहद दिलचस्प बना दिया है।
यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।