
शांति वार्ता की मेजबानी से ‘इनाम’ की उम्मीद? आर्थिक संकट में घिरा पाकिस्तान फिर पुराने फॉर्मूले पर
NTN REPORT// इस्लामाबाद: आर्थिक तंगी से जूझ रहा पाकिस्तान एक बार फिर अपने पुराने कूटनीतिक पैंतरे पर लौटता नजर आ रहा है। शहबाज सरकार को उम्मीद है कि मिडिल ईस्ट में चल रही शांति वार्ता की मेजबानी के बदले अमेरिका से उसे भारी वित्तीय मदद मिल सकती है। हालांकि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह दांव कितना सफल होगा, इस पर सवाल उठने लगे हैं।

भू-राजनीति को ‘सौदे’ में बदलने की पुरानी रणनीति
पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि उसने अपनी भौगोलिक स्थिति का इस्तेमाल कई बार रणनीतिक सौदेबाजी के लिए किया है।
- 1980 के दशक में अफगान युद्ध के दौरान
- और 2000 के शुरुआती वर्षों में आतंकवाद के खिलाफ जंग के समय
इन दोनों दौर में पाकिस्तान को अमेरिका से अरबों डॉलर की आर्थिक और सैन्य सहायता मिली। उस समय क्षेत्रीय संघर्ष उसके लिए आर्थिक राहत का जरिया बन गया था।
लेकिन 2026 के हालात पहले जैसे नहीं हैं। अब क्षेत्रीय तनाव से पाकिस्तान को आर्थिक फायदा मिलने के बजाय नुकसान उठाना पड़ रहा है।

जंग से ‘कमाई’ नहीं, अब ‘निकासी’
विशेषज्ञों के अनुसार, पहले जहां युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव से पाकिस्तान की तिजोरी भरती थी, वहीं अब वही स्थिति उसके लिए संकट बन गई है।
- विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर हो रहा है
- डॉलर भंडार दबाव में है
- पुराने कर्ज की किश्तें चुकाना मुश्किल होता जा रहा है
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स भी संकेत दे रही हैं कि केवल कूटनीतिक सक्रियता दिखाने भर से अर्थव्यवस्था नहीं संभल रही।
फोटो-ऑप से आगे नहीं बढ़ पाई कूटनीति
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई अहम बैठकें तो कीं, लेकिन उन्हें ठोस आर्थिक समझौतों में नहीं बदल पाया।
- बड़े तेल कॉन्ट्रैक्ट नहीं हो पाए
- दीर्घकालिक निवेश समझौते नहीं बन सके
- औद्योगिक और निर्यात ढांचे में ठोस सुधार नहीं हुआ
नतीजतन, जब तक वैश्विक तनाव रहा तब तक सहायता मिलती रही, लेकिन हालात सामान्य होते ही अर्थव्यवस्था फिर कमजोर पड़ गई।
‘नेशनल कैपिटल कमांड’ की मांग तेज
अब पाकिस्तान के नीति-निर्माण हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि देश को एक केंद्रीकृत आर्थिक ढांचे की जरूरत है। ‘नेशनल कैपिटल कमांड’ (NCC) जैसे प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है।
इसका उद्देश्य होगा:
- निवेश के लिए सिंगल विंडो सिस्टम
- 90 दिनों में कागजी प्रक्रिया पूरी करना
- हर कूटनीतिक मुलाकात को संभावित बिजनेस डील में बदलना
आर्थिक जानकारों ने ‘रेड अलर्ट’ जैसी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि पाकिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति को स्थायी आर्थिक मॉडल में नहीं बदल पाया, तो आने वाले समय में संकट और गहरा सकता है।
क्या फिर मिलेगा अमेरिकी सहारा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका एक बार फिर पुराने ढर्रे पर आर्थिक मदद का हाथ बढ़ाएगा, या इस बार पाकिस्तान को आत्मनिर्भर आर्थिक रास्ता तलाशना होगा?
बदलते वैश्विक समीकरणों और सख्त आर्थिक शर्तों के दौर में यह तय माना जा रहा है कि केवल रणनीतिक अहमियत के भरोसे स्थायी आर्थिक स्थिरता हासिल करना अब आसान नहीं है।
आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि पाकिस्तान की यह कूटनीतिक पहल उसे राहत दिलाती है या फिर उसे अपने आर्थिक ढांचे में बुनियादी सुधार की दिशा में कठोर कदम उठाने पड़ेंगे।