सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप पर अहम सुनवाई, पति पर पत्नी से दुष्कर्म के आरोप में मुकदमा चलेगा या नहीं?
वैवाहिक अपवाद के बावजूद रेप कानून लागू करने की गुंजाइश पर पहले होगा फैसला, इसके बाद अपवाद की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई
NTN REPORT// नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप यानी वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़े मामलों पर बुधवार को अहम सुनवाई हुई। अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह है कि जब कानून में पति को पत्नी के साथ दुष्कर्म के आरोप से संबंधित एक वैवाहिक अपवाद दिया गया है, तो क्या कुछ विशेष परिस्थितियों में उसी पति के खिलाफ रेप कानून के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है?
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह पहले कर्नाटक से जुड़े एक मामले में इस सवाल की जांच करेगी। इसके बाद मैरिटल रेप के अपवाद की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार किया जाएगा। मामलों को तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

कर्नाटक के मामले से होगी सुनवाई की शुरुआत
सुप्रीम कोर्ट सबसे पहले कर्नाटक के उस मामले पर विचार करेगा, जिसमें एक व्यक्ति पर अपनी पत्नी के साथ यौन हिंसा करने का आरोप है। पत्नी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों को देखते हुए वैवाहिक अपवाद के बावजूद पति के खिलाफ रेप कानून के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी।
उन्होंने अदालत के सामने दलील दी कि कथित तौर पर महिला के साथ बेहद गंभीर और लगातार यौन हिंसा की गई तथा उसके साथ ‘सेक्स स्लेव’ जैसा व्यवहार किए जाने का आरोप है। उनका कहना था कि वह हाई कोर्ट के फैसले का बचाव करना चाहती हैं और यह बताना चाहती हैं कि मौजूदा कानून की व्याख्या के जरिए कुछ परिस्थितियों में पति के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने दो बड़े कानूनी सवाल
इस मामले में अदालत के सामने मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—
पहला: क्या मौजूदा वैवाहिक अपवाद की संकीर्ण या सीमित व्याख्या करके कुछ विशेष परिस्थितियों में पति के खिलाफ रेप के आरोप में मुकदमा चलाया जा सकता है?
दूसरा: क्या कानून में दिया गया वैवाहिक अपवाद संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और इसलिए इसे खत्म किया जाना चाहिए?
अदालत पहले इन दोनों सवालों के बीच कानूनी संबंध और मौजूदा कानून की व्याख्या की संभावनाओं को परखेगी।
‘शादी होने से व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं होती’
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने विवाहित महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को स्वीकार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि विवाह होने से किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता समाप्त नहीं हो जाती।
हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि अदालत एक दंडात्मक कानून की समीक्षा कर रही है। इसलिए पति के खिलाफ विशेष रूप से रेप के अपराध में मुकदमा चलाने की अनुमति देने से पहले यह देखना जरूरी होगा कि कानून में मौजूद वैवाहिक अपवाद अनुचित या स्पष्ट रूप से मनमाना तो नहीं है।
वैवाहिक अपवाद हर तरह की यौन हिंसा से सुरक्षा नहीं देता
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वैवाहिक रेप का अपवाद पति को यौन हिंसा से जुड़े हर प्रकार के आपराधिक परिणाम से संरक्षण नहीं देता।
यदि यौन हिंसा के कारण गंभीर चोट या मौत जैसी स्थिति पैदा होती है, तो परिस्थितियों के अनुसार अन्य आपराधिक प्रावधान लागू हो सकते हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने ऐतिहासिक फुलमोनी मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कम उम्र की लड़की के साथ गंभीर यौन हिंसा के बाद अत्यधिक रक्तस्राव हुआ था और उसकी मौत हो गई थी।
निर्भया कांड के बाद बदला यौन अपराधों का कानून
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने 2012 के निर्भया कांड के बाद यौन अपराधों से संबंधित कानूनों में किए गए व्यापक बदलावों का भी उल्लेख किया।
निर्भया कांड के बाद रेप की कानूनी परिभाषा का दायरा बढ़ाया गया और इसे केवल एक विशेष प्रकार के शारीरिक संबंध तक सीमित नहीं रखा गया। वकीलों ने भारतीय न्याय संहिता में किए गए बदलावों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि विवाह के भीतर होने वाली विभिन्न प्रकार की यौन हिंसा के मामलों में उपलब्ध कानूनी उपायों को लेकर भी कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं।
केंद्र सरकार भी रखेगी अपना पक्ष
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार संबंधित कानूनी सवालों पर अदालत की सहायता करेगी और पहले दाखिल किए गए अपने जवाबों पर भरोसा करेगी।
अदालत ने केंद्र सरकार के जवाब की प्रतियां दो दिनों के भीतर मामले से जुड़े सभी वकीलों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
जस्टिस बागची ने कहा कि दंडात्मक कानूनों की समीक्षा करते समय अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ऐसे कानूनों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। संवैधानिक समीक्षा के दौरान कानून की मंशा, आपराधिक जवाबदेही और मौलिक अधिकारों सहित सभी पहलुओं पर विचार करना जरूरी होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट के विभाजित फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
मैरिटल रेप अपवाद की संवैधानिक वैधता का मुद्दा दिल्ली हाई कोर्ट के 11 मई 2022 के विभाजित फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
उस समय जस्टिस राजीव शकधर ने वैवाहिक अपवाद को खत्म करने के पक्ष में फैसला दिया था, जबकि जस्टिस सी. हरिशंकर ने इसे बरकरार रखने का समर्थन किया था। दोनों न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के कारण मामला आगे अपील के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि मौजूदा वैवाहिक अपवाद की व्याख्या किस सीमा तक की जा सकती है और किन परिस्थितियों में पति के खिलाफ रेप कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई संभव हो सकती है। इसके बाद अदालत इस व्यापक प्रश्न पर भी विचार करेगी कि वैवाहिक दुष्कर्म को लेकर मौजूदा कानूनी अपवाद संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं।
डिस्क्लेमर: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है। इसमें वर्णित कानूनी स्थिति और न्यायालय की कार्यवाही समय के साथ बदल सकती है। अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन होगी।