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संपादकीय

मनुवाद बनाम संविधान के बहाने कांग्रेस का नया सियासी नैरेटिव? छत्तीसगढ़ कांग्रेस की पोस्ट पर उठे सवाल!

NTN REPORT// रायपुर। छत्तीसगढ़ कांग्रेस की ओर से सोशल मीडिया पर साझा की गई एक पोस्ट ने प्रदेश की सियासत में वैचारिक बहस को फिर हवा दे दी है। पोस्ट में सवाल उठाया गया है—“मनुवाद या संविधान? भेदभाव या बराबरी?” इसके साथ देश में दो विचारधाराओं के बीच लड़ाई होने का दावा करते हुए एक पक्ष को जाति आधारित भेदभाव से और दूसरे पक्ष को संविधान, समानता एवं सम्मान से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है।

प्रतीकात्मक एआई तस्वीर

पोस्ट में राहुल गांधी की तस्वीर के साथ मनुस्मृति और भारतीय संविधान को आमने-सामने दिखाया गया है। कांग्रेस का संदेश स्पष्ट रूप से सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश करता दिखाई देता है। राहुल गांधी भी हालिया बयानों में देश में “दो विचारधाराओं की लड़ाई” की बात कह चुके हैं और सामाजिक भेदभाव के मुद्दे को इसी राजनीतिक विमर्श से जोड़ते रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है—क्या देश की राजनीति को सिर्फ दो खांचों में बांटा जा सकता है?

कांग्रेस की इस पोस्ट पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या संविधान में विश्वास रखने वाले सभी लोग कांग्रेस की विचारधारा से सहमत हैं और क्या कांग्रेस से असहमत हर व्यक्ति को मनुवाद के खांचे में रखना उचित है?

भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार देता है। ऐसे में संविधान और सामाजिक समानता की बात निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन राजनीतिक बहस को “संविधान बनाम मनुवाद” जैसे दो ध्रुवों तक सीमित कर देना क्या देश की जटिल सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं का सरलीकरण नहीं है?

क्या यह मुद्दा है या राजनीतिक ध्रुवीकरण की रणनीति?

कांग्रेस की पोस्ट में एक ओर “भेदभाव और ऊंच-नीच” तथा दूसरी ओर “समानता और सम्मान” को रखा गया है। इससे यह संदेश देने का प्रयास दिखाई देता है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई में एक तरफ कांग्रेस और दूसरी तरफ उसका वैचारिक विरोधी पक्ष है।

यहीं से दूसरा सवाल खड़ा होता है—क्या सामाजिक न्याय और समानता केवल किसी एक राजनीतिक दल की विचारधारा की संपत्ति है?

भारत में संविधान को सर्वोच्च मानने की बात केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं हो सकती। इसी तरह जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई भी किसी एक राजनीतिक दल की बपौती नहीं है।

कांग्रेस से सीधे सवाल

अगर संविधान ही मुद्दा है, तो राजनीतिक दल संविधान के हर प्रावधान और संवैधानिक संस्थाओं पर समान रूप से अपनी प्रतिबद्धता क्यों नहीं स्पष्ट करते?

क्या हर राजनीतिक विरोधी को “मनुवादी” बताकर सामाजिक न्याय की बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदलना उचित है?

क्या देश के करोड़ों नागरिकों को केवल दो विचारधाराओं के बीच चुनने के लिए प्रस्तुत करना लोकतांत्रिक विविधता को कमतर आंकना नहीं है?

कांग्रेस की यह पोस्ट निश्चित रूप से एक राजनीतिक संदेश है, लेकिन इसके साथ यह बहस भी जरूरी है कि सामाजिक समानता की लड़ाई को राजनीतिक ध्रुवीकरण का हथियार बनाने के बजाय क्या इसे वास्तविक नीतियों, शिक्षा, रोजगार और अवसरों की समानता से नहीं जोड़ा जाना चाहिए?

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के द्वारा सोशल मीडिया में किया गया पोस्ट , सोर्स सोशल मीडिया

अब सवाल जनता के सामने है—क्या यह संविधान और सामाजिक न्याय की वास्तविक लड़ाई है या फिर आगामी राजनीतिक संघर्ष के लिए तैयार किया जा रहा एक नया सियासी नैरेटिव?

नोट: यह समाचार उपलब्ध सोशल मीडिया पोस्ट एवं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें उठाए गए प्रश्न राजनीतिक विश्लेषण एवं प्रतिक्रिया के संदर्भ में हैं।

 

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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