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दो साल टूटेंगे तापमान के रिकॉर्ड! अल-नीनो से बढ़ेगी दुनिया की गर्मी, 2027 बन सकता है सबसे गर्म साल

प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा अल-नीनो, मौसम वैज्ञानिकों ने जताई बड़ी चिंता; भारत के मानसून और दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है व्यापक असर

NTN REPORT// दुनिया के मौसम को प्रभावित करने वाली एक बड़ी जलवायु घटना इस समय तेजी से मजबूत हो रही है। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, वर्ष 2026 में विकसित हो रहा अल-नीनो असाधारण रूप से शक्तिशाली हो सकता है। ब्रिटेन के मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने इसे अपने पूर्वानुमानों में अब तक देखे गए सबसे मजबूत अल-नीनो संकेतों में से एक बताया है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह घटना 19वीं सदी के बाद के सबसे शक्तिशाली अल-नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकती है। इसका असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में तापमान, बारिश, सूखा, तूफान और कृषि पर भी पड़ सकता है।

प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से काफी ऊपर

अल-नीनो के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पूर्वी और मध्य हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है। इस बार तापमान में असाधारण बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है।

ब्रिटेन के मौसम विभाग के अनुसार, सामान्य अल-नीनो में समुद्र की सतह का तापमान लगभग 1 से 2 डिग्री सेल्सियस तक सामान्य से ऊपर जा सकता है। लेकिन मौजूदा पूर्वानुमानों में यह बढ़ोतरी 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।

अमेरिकी मौसम विभाग के अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार भी अल-नीनो तेजी से मजबूत हो रहा है। जुलाई में नीनो-3.4 क्षेत्र का तापमान विचलन +1.4 डिग्री सेल्सियस और नीनो-1+2 क्षेत्र में +2.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। अमेरिकी पूर्वानुमान के मुताबिक उत्तरी गोलार्ध की 2026-27 की शरद और सर्दियों में बहुत मजबूत अल-नीनो की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक है।

क्यों महत्वपूर्ण है अल-नीनो?

अल-नीनो कोई सामान्य स्थानीय मौसम परिवर्तन नहीं है, बल्कि प्रशांत महासागर और वायुमंडल के बीच होने वाला प्राकृतिक जलवायु चक्र है। यह आम तौर पर कुछ वर्षों के अंतराल पर आता है और समुद्र के तापमान में बदलाव के साथ हवा के प्रवाह तथा वर्षा के वैश्विक पैटर्न को प्रभावित करता है।

प्रशांत महासागर का असामान्य रूप से गर्म होना वातावरण में अतिरिक्त गर्मी पहुंचाता है। इसके बाद वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव आता है, जिससे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का व्यवहार बदल सकता है। कहीं सूखा और गर्मी बढ़ सकती है तो कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है।

2026-27 में टूट सकते हैं गर्मी के रिकॉर्ड

इस मजबूत अल-नीनो का सबसे बड़ा असर वैश्विक तापमान पर देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अल-नीनो के कारण पहले से गर्म हो रही धरती का तापमान कुछ समय के लिए और बढ़ सकता है।

ब्रिटेन के मौसम विभाग ने संकेत दिया है कि अल-नीनो से वैश्विक वार्षिक तापमान में अस्थायी तेज उछाल आ सकता है और समुद्र में जमा अतिरिक्त गर्मी का प्रभाव 2027 को दुनिया का सबसे गर्म वर्ष बनाने की दिशा में ले जा सकता है।

हालांकि 2026 और 2027 में से कौन-सा वर्ष सबसे गर्म साबित होगा, इसे अभी निश्चित नहीं कहा जा सकता। वैज्ञानिक पूर्वानुमानों में 2027 को लेकर विशेष चिंता इसलिए है क्योंकि अल-नीनो का वैश्विक तापमान पर प्रभाव अक्सर घटना के चरम के बाद अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है असर

भारत के लिए अल-नीनो इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका संबंध मानसूनी वर्षा के पैटर्न से भी देखा जाता रहा है। मजबूत अल-नीनो की स्थिति में भारत में सामान्य से कमजोर मानसून का जोखिम बढ़ सकता है, हालांकि इसका प्रभाव हर वर्ष एक जैसा नहीं होता।

यदि प्रशांत महासागर में लंबे समय तक अत्यधिक गर्म परिस्थितियां बनी रहती हैं तो वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव भारत सहित एशिया के मौसम को प्रभावित कर सकता है। इसका असर वर्षा के वितरण, तापमान और कृषि गतिविधियों पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अल-नीनो का मतलब यह नहीं है कि भारत में हर जगह निश्चित रूप से कम बारिश होगी। इसके प्रभाव क्षेत्र और समय के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। कहीं कम बारिश और गर्मी बढ़ सकती है तो कहीं अत्यधिक बारिश की घटनाएं भी देखने को मिल सकती हैं।

पहले भी बन चुके हैं बड़े तापमान रिकॉर्ड

इतिहास में 1982-83, 1997-98 और 2015-16 के दौरान बेहद मजबूत अल-नीनो घटनाएं देखी गई थीं। इन घटनाओं के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में असामान्य मौसम और तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।

इस बार चिंता इसलिए अधिक है क्योंकि अल-नीनो जिस समय मजबूत हो रहा है, उस समय मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का औसत तापमान पहले ही ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर है। ऐसे में प्राकृतिक अल-नीनो गर्मी और दीर्घकालिक वैश्विक तापमान वृद्धि एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ा सकते हैं।

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग असर

मजबूत अल-नीनो का असर पूरी दुनिया में एक जैसा नहीं होता। इसके कारण अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परिस्थितियां बन सकती हैं।

  • कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक गर्मी और सूखे की स्थिति बन सकती है।
  • कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
  • समुद्री तापमान बढ़ने से समुद्री पारिस्थितिकी और मत्स्य क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।
  • कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।
  • गर्मी और बारिश के असामान्य पैटर्न से खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय पूर्वानुमानों के मुताबिक, 2026-27 का अल-नीनो वैश्विक कृषि और खाद्य बाजारों के लिए भी जोखिम बढ़ा सकता है।

वैज्ञानिकों की नजर अब 2027 पर

अमेरिकी और ब्रिटिश मौसम वैज्ञानिकों के ताजा आकलनों से स्पष्ट है कि वर्तमान अल-नीनो तेजी से मजबूत हो रहा है। अमेरिकी पूर्वानुमान मॉडल भी संकेत दे रहे हैं कि यह घटना 2026 के अंत से 2027 की शुरुआत तक प्रभावशाली रह सकती है।

ऐसे में आने वाले महीनों में दुनिया की निगाहें प्रशांत महासागर के तापमान, समुद्री हवाओं और वायुमंडलीय बदलावों पर रहेंगी। यदि मौजूदा पूर्वानुमान सही साबित होते हैं, तो 2026-27 का दौर वैश्विक तापमान और मौसम की चरम घटनाओं के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

भारत के लिए क्या मायने?

भारत में इसका सबसे बड़ा सवाल मानसून, तापमान और कृषि से जुड़ा है। हालांकि अल-नीनो के प्रभाव को लेकर अभी से किसी एक राज्य या पूरे देश के लिए निश्चित बारिश या सूखे की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा। आने वाले महीनों में मौसम विभाग और वैश्विक जलवायु संस्थानों के नए पूर्वानुमानों से स्थिति और स्पष्ट होगी।

नोट: अल-नीनो से जुड़े तापमान और मौसम के पूर्वानुमान मॉडल आधारित अनुमान हैं। इनकी तीव्रता और वास्तविक प्रभाव में समय के साथ बदलाव संभव है।

यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

Nilesh Tiwari

Editor- NTN Report 📱+91 93298 23355 📧 tnilesh2711@gmail.com
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